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जौनपुर की गलियों में बीड़ी पीता नजर आया वो नेता, जिसने दीनदयाल उपाध्याय को चुनाव हरा दियानेता जी
11 जुल॰ 2026, 8:08 am (45 दिन पहले)· 2

जौनपुर की गलियों में बीड़ी पीता नजर आया वो नेता, जिसने दीनदयाल उपाध्याय को चुनाव हरा दिया

जौनपुर के पकड़ी चौराहे पर प्रतिद्वंद्वी राजदेव सिंह को आम लोगों के बीच बीड़ी पीते देख पंडित दीनदयाल उपाध्याय समझ गए थे कि यह चुनाव उनके लिए मुश्किल होगा, और आखिरकार वही हुआ।

जौनपुर के पकड़ी चौराहे पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय की नजर जब अपने प्रतिद्वंद्वी राजदेव सिंह पर पड़ी, तो वह रिक्शा चालकों, तांगे वालों और आम जनता के बीच बैठकर बीड़ी सुलगाए उनसे बातचीत कर रहे थे। यह नजारा देखते ही पंडित जी के मुंह से बेसाख्ता निकल पड़ा, "गलती हो गई, यह चुनाव मेरे लिए बहुत मुश्किल होगा।" जनसंघ के इतिहास और जौनपुर की सियासी पृष्ठभूमि को याद करते हुए जयप्रकाश सिंह ने यह दिलचस्प किस्सा साझा किया, जिसमें बताया गया कि कैसे जमीन से जुड़े एक नेता ने कभी जनसंघ का सबसे मजबूत गढ़ रहे जौनपुर में पार्टी के अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष को ही पटखनी दे दी थी।

आजादी के बाद से जनसंघ का मजबूत किला रहा जौनपुर

जयप्रकाश सिंह के मुताबिक, आजादी के बाद से जौनपुर जनपद की सियासी जमीन जनसंघ के लिए हमेशा अनुकूल रही और इसे पार्टी का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता था। जब यहां लोकसभा के मध्यावधि चुनाव का एलान हुआ, तो यह सीट पहले से ही जनसंघ की सिटिंग सीट थी। यही वजह थी कि पार्टी ने अपने सबसे बड़े चेहरे और उस वक्त के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित दीनदयाल उपाध्याय को यहां से चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया। खास बात यह रही कि उस समय पंडित जी खुद संसद के सदस्य नहीं थे, और पार्टी के भीतर जौनपुर को उनके लिए देश की सबसे सुरक्षित सीटों में गिना जा रहा था।

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कांग्रेस के पास उतारने को कोई उम्मीदवार नहीं था

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसी कद्दावर शख्सियत के जौनपुर से चुनाव लड़ने के एलान के बाद कांग्रेस खेमे में खलबली मच गई। जयप्रकाश सिंह बताते हैं कि कांग्रेस के पास उस वक्त पंडित जी के सामने खड़ा करने लायक कोई उम्मीदवार ही नहीं था। स्थानीय स्तर के किसी भी कांग्रेसी नेता में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह दीनदयाल उपाध्याय के खिलाफ पर्चा दाखिल कर सके। कांग्रेस का नेतृत्व लगातार इसी उधेड़बुन में लगा रहा कि आखिर इतने सादगी पसंद, सिद्धांतनिष्ठ और बेजोड़ नेता के सामने किसे मैदान में उतारा जाए।

समाजवादी खेमे से बुलाकर राजदेव सिंह को थमाया गया टिकट

जयप्रकाश सिंह के मुताबिक, उस वक्त राजदेव सिंह कांग्रेस में थे ही नहीं। वह 'कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी' से जुड़े थे और उनका अपना अलग संगठन भी था। जब कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं ने पंडित जी के सामने चुनाव लड़ने से साफ इनकार कर दिया, तब पार्टी के भीतर यह रणनीति बनी कि अगर किसी तरह राजदेव सिंह को राजी कर लिया जाए, तो असली मुकाबला संभव हो सकता है। इसके बाद कांग्रेस ने खास परिस्थितियों में राजदेव सिंह को बुलाकर टिकट थमाया और उन्हें सीधे पंडित दीनदयाल उपाध्याय के खिलाफ चुनावी मैदान में उतार दिया।

पकड़ी चौराहे पर वह नजारा, जिसने पूरा समीकरण बदल दिया

जौनपुर पहुंचने के बाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय के मन में यह जानने की उत्सुकता जगी कि आखिर उनका मुकाबला किससे है, और उन्होंने खुद अपनी आंखों से यह देखने की इच्छा अपने कार्यकर्ताओं के सामने जाहिर की। जयप्रकाश सिंह बताते हैं कि जब लोग पंडित जी को लेकर निकले, तो ओलंदगंज के पकड़ी चौराहे पर एक ऐसा नजारा दिखा जिसने सबको चौंका दिया। राजदेव सिंह वहां बेहद सादगी से रिक्शा चालकों, इक्के-तांगे वालों और आम जनता के बीच सीधे जमीन पर बैठे हुए थे, उनसे खुलकर बातचीत कर रहे थे और हाथ में बीड़ी सुलगाए बैठे थे। लोगों के बीच उनकी यह जमीनी पकड़ और स्वाभाविक लोकप्रियता देखकर पंडित जी तुरंत भांप गए कि इस चुनाव में हवा का रुख किस तरफ है। उन्होंने बिना कोई देरी किए अपने करीबी साथियों से कह दिया, "गलती हो गई, यह चुनाव मेरे लिए बड़ा मुश्किल हो गया है।"

हार-जीत से इतर, हमेशा के लिए ऐतिहासिक बन गया वह चुनाव

जयप्रकाश सिंह के मुताबिक, पंडित जी की वह भविष्यवाणी आगे चलकर सच साबित हुई और उस चुनाव में कांग्रेस के राजदेव सिंह की जीत हुई। राजदेव सिंह ने चुनाव जरूर जीता, लेकिन जनसंघ के इतने बड़े पुरोधा पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जौनपुर की धरती से चुनाव लड़ना और वहां का उम्मीदवार होना, जीत-हार से परे, अपने आप में हमेशा के लिए ऐतिहासिक बन गया। यह किस्सा आज भी जौनपुर की सियासी यादों में उस दौर की एक बानगी के तौर पर दर्ज है, जब रिक्शा चालकों, तांगे वालों और आम लोगों के बीच किसी नेता की सहज मौजूदगी बड़े से बड़े प्रतिद्वंद्वी के मुकाबले भी निर्णायक साबित हो सकती थी।

सवाल-जवाब

यह किस्सा किसने सुनाया?
जनसंघ के इतिहास और जौनपुर की सियासी पृष्ठभूमि को याद करते हुए यह किस्सा जयप्रकाश सिंह ने साझा किया है।
जौनपुर में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के प्रतिद्वंद्वी कौन थे?
उनके प्रतिद्वंद्वी राजदेव सिंह थे, जिन्हें कांग्रेस ने टिकट देकर मैदान में उतारा था।
चुनाव से पहले राजदेव सिंह किस पार्टी से जुड़े थे?
राजदेव सिंह कांग्रेस में नहीं थे, बल्कि 'कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी' से जुड़े थे और उनका अपना अलग संगठन था।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने राजदेव सिंह को किस हाल में देखा था?
उन्होंने ओलंदगंज के पकड़ी चौराहे पर राजदेव सिंह को रिक्शा चालकों, तांगे वालों और आम जनता के बीच जमीन पर बैठकर बीड़ी पीते और बातचीत करते देखा था।
यह नजारा देखकर पंडित जी ने क्या कहा था?
उन्होंने अपने करीबी साथियों से कहा, "गलती हो गई, यह चुनाव मेरे लिए बड़ा मुश्किल हो गया है।"
उस चुनाव में जीत किसकी हुई?
उस चुनाव में कांग्रेस के राजदेव सिंह की जीत हुई और पंडित जी की भविष्यवाणी सच साबित हुई।
जनसंघ के लिए जौनपुर सीट इतनी अहम क्यों मानी जाती थी?
जौनपुर आजादी के बाद से जनसंघ का मजबूत गढ़ था और यह पार्टी की सिटिंग सीट भी थी, इसलिए इसे पंडित जी के लिए देश की सबसे सुरक्षित सीट माना जा रहा था।
कांग्रेस को पंडित जी के खिलाफ उम्मीदवार ढूंढने में दिक्कत क्यों हुई?
किसी भी स्थानीय कांग्रेसी नेता में दीनदयाल उपाध्याय के खिलाफ पर्चा दाखिल करने की हिम्मत नहीं थी, इसलिए पार्टी को राजदेव सिंह को खास परिस्थिति में बुलाना पड़ा।
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