अमेरिकी लोकतंत्र 2026 के मध्यावधि चुनावों के मुहाने पर खड़ा है, जहां राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और संस्थागत स्थिरता एक अभूतपूर्व तनाव से गुजर रही है। दशकों तक यह धारणा रही है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को सबसे बड़ा खतरा सीमाओं पर सक्रिय चरमपंथी संगठनों, हथियारों से लैस उग्रवादी मिलिशिया या समाज के हाशिए पर रहने वाले उपद्रवियों से होता है। हालांकि, व्यापक सामाजिक और कानूनी आंकड़ों का गहन विश्लेषण एक बेहद अलग और चौंकाने वाली हकीकत सामने रखता है। राजनीतिक आक्रामकता अब किसी सुदूर कोने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह देश के मुख्यधारा के जनमानस में अपनी जड़ें जमा चुकी है। जब समाज के पढ़े-लिखे, संपन्न और स्थिर पेशेवर राजनीति में हिंसा को एक वैध हथियार मानने लगें, तो संकट की गंभीरता कहीं अधिक गहरी हो जाती है।
हिंसक लोकलुभावनवाद और मध्यावधि चुनावों की गंभीर परीक्षा
अध्ययन और शोध के आधार पर रॉबर्ट ए. पेप ने अपनी नई किताब, 'अवर ओन वर्स्ट एनिमीज: अमेरिका इन द एज ऑफ वायलेंट पॉपुलिज्म' में इस बदलते राजनीतिक माहौल को विस्तार से रेखांकित किया है। पेप शिकागो प्रोजेक्ट ऑन सिक्योरिटी एंड थ्रेट्स (CPOST) के संस्थापक निदेशक हैं। उनका विश्लेषण बताता है कि 2026 के मध्यावधि चुनावों के करीब आते ही अमेरिकी चुनाव एक ऐसे खतरनाक मोड़ में प्रवेश कर रहे हैं जहां सरकारी ताकत, सार्वजनिक विरोध और राजनीतिक वैधता आपस में टकरा रही हैं। अधिकांश लोग अब भी राजनीतिक हिंसा को एक सामयिक घटना मानते हैं, जो भड़कती है और फिर शांत हो जाती है। पेप चेताते हैं कि यह सोच जितनी तसल्ली देने वाली लगती है, असल में उतनी ही अधिक घातक है।
पेप के अनुसार, हिंसक लोकलुभावनवाद एक ऐसा राजनीतिक वातावरण है जिसमें जनता का एक बड़ा हिस्सा सत्ता हासिल करने, उसे बचाने या उसका बचाव करने के लिए शारीरिक बल के इस्तेमाल को उचित ठहराने लगता है। यह रुझान अमेरिकी पहचान और नागरिकता के सवाल पर चल रहे गहरे सांस्कृतिक टकराव की वजह से बढ़ा है। इसके अलावा, शीर्ष नेताओं और विशिष्ट वर्ग द्वारा गढ़े जा रहे उस विमर्श ने आग में घी डालने का काम किया है, जिसमें राजनीतिक विरोधियों को साधारण प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि अस्तित्व मिटाने पर तुले दुश्मन के रूप में पेश किया जाता है। यही ढांचागत माहौल मुख्यधारा के सामान्य नागरिकों को राजनीतिक आक्रामकता में सक्रिय भागीदार बना देता है।
आगामी मध्यावधि चुनावों को लेकर चिंता का स्तर 1960 के दशक के बड़े सामाजिक आंदोलनों और उथल-पुथल के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच चुका है। घरेलू स्तर पर सुलगते तनाव और ईरान के साथ जारी युद्ध जैसी वैश्विक अस्थिरता ने राष्ट्रीय चिंताओं को और अधिक भड़का दिया है। ऐसे माहौल में चुनाव किसी भी क्षण भड़कने वाले बारूद का रूप ले सकते हैं। यह दौर इस बात की सीधी और कठिन परीक्षा है कि क्या देश की बुनियादी लोकतांत्रिक संस्थाएं बिना हिंसा के शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन कराने में अब भी सक्षम हैं या नहीं।
कैपिटल हिल हमले के कानूनी आंकड़े और मुख्यधारा की हकीकत
अमेरिका में अक्सर यह समझा जाता है कि राजनीतिक हिंसा से निपटने के लिए चरमपंथी मिलिशिया गुटों पर ध्यान केंद्रित करना ही पर्याप्त है। प्राउड बॉयज और ओथ कीपर्स जैसे संगठनों ने मीडिया की सुर्खियों पर कब्जा जमाया था, लेकिन जमीनी हकीकत इन धारणाओं से बिल्कुल उलट है। शिकागो प्रोजेक्ट ऑन सिक्योरिटी एंड थ्रेट्स द्वारा 6 जनवरी 2021 को कैपिटल हिल पर हुए हमले के बाद गिरफ्तार और आरोपित किए गए लोगों के आंकड़ों की जांच की गई। इस जांच में सामने आया कि आरोपितों में से 90 प्रतिशत का किसी भी मिलिशिया या उग्रवादी संगठन से कोई औपचारिक संबंध नहीं था।
आरोपितों की पृष्ठभूमि से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि इनमें से 22 प्रतिशत लोग अपने निजी कारोबार के मालिक थे। लगभग 30 प्रतिशत लोगों के पास कॉलेज की डिग्री थी। अदालत में पेश किए गए इन लोगों में डॉक्टर, इंजीनियर, कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) और सरकारी कर्मचारी शामिल थे। हमले में शामिल लगभग 40 प्रतिशत लोग कॉलर वाली अच्छी नौकरियों (व्हाइट कॉलर जॉब) में कार्यरत थे, जबकि केवल 8 प्रतिशत प्रतिभागी ही ऐसे थे जिनके पास कोई रोजगार नहीं था।
केवल 10 में से एक व्यक्ति ही किसी संगठित मिलिशिया का सदस्य था। आरोपितों में लगभग आधे लोग डॉक्टर, वकील, CEO, कारोबारी और अमेरिकी विदेश विभाग द्वारा नियुक्त पूर्व कर्मचारी थे। इनमें से कुछ लोग तो घटना से पिछले साल व्हाइट हाउस की क्रिसमस पार्टी तक में शामिल हुए थे। अधिकांश लोग अमेरिकी मध्यवर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जिनके पास स्थिर घर, नौकरियां और 401(k) रिटायरमेंट खाते थे। वे किसी सनक में नहीं, बल्कि इस आम मुख्यधारा की सोच से प्रेरित होकर आगे बढ़े थे कि लोकतांत्रिक संस्थाएं अब अपनी वैधता खो चुकी हैं।
चेतावनी के संकेतों को नजरअंदाज करने की भूल
पेप का तर्क है कि 6 जनवरी की घटना को हाशिए के चरमपंथियों की करतूत बताकर वर्षों तक गलत विमर्श पेश किया गया। शुरुआती दौर में सार्वजनिक संस्थाओं और मीडिया ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों के अपूर्ण डेटाबेस पर बहुत अधिक भरोसा किया, जिसने स्वाभाविक रूप से केवल सबसे मुखर और संगठित चरमपंथियों को चिन्हित किया था। बाद में जब बड़ा डेटा सामने आया, तब भी जनता तक सही तस्वीर नहीं पहुंचाई गई। विचित्र और अनोखे किरदारों पर नजर गड़ाए रखने के कारण विश्लेषक उस मूक, मुख्यधारा के जनसमर्थन को देखने से चूक गए, जिसने वास्तव में इस घटना को ऊर्जा दी थी।
इतिहास के पन्नों में 6 जनवरी 2021 का हमला सामान्य राजनीतिक टकराव और गृहयुद्ध के बीच की विभाजक रेखा साबित हुआ। इस हमले ने उस बुनियादी लोकतांत्रिक परंपरा को चकनाचूर कर दिया कि सत्ता का हस्तांतरण मतपत्रों से होता है, शारीरिक बल के खुले प्रदर्शन से नहीं। इसने दिखाया कि किसी विदेशी दुश्मन ने नहीं, बल्कि अपने ही देश के नागरिकों की भारी भीड़ ने अपनी ही संसद को निशाना बनाकर चुनावी नतीजों को बलपूर्वक चुनौती दी थी।
वर्तमान में सबसे बड़ा चेतावनी संकेत यह है कि आक्रामक राजनीतिक कदमों को आम जनजीवन का सामान्य हिस्सा माना जाने लगा है। पूरे मीडिया जगत में हिंसक प्रतीकों की बाढ़ आ चुकी है, और शीर्ष नेताओं की भाषा विरोधी गुटों की वैधता को पूरी तरह नकारती है। जब आम नागरिक अपने राजनीतिक विरोधियों को एक अस्तित्वगत खतरा मानने लगते हैं, तब वास्तविक टकराव के लिए जमीन पूरी तरह तैयार हो जाती है। मुख्यधारा द्वारा हिंसा को सामान्य मान लिए जाने के बाद पुराने संस्थागत समाधान बेअसर साबित होने लगते हैं।
1920 के कु क्लक्स क्लैन से तुलना और द्विदलीय फैलाव
मध्यमवर्गीय श्वेत अमेरिकी आबादी द्वारा हिंसक लोकलुभावनवाद को अपनाए जाने की तुलना पेप ने 1920 के दशक के दूसरे कु क्लक्स क्लैन के विस्तार से की है। आधुनिक सोच में क्लैन की छवि केवल कम आय वाले क्षेत्रीय नफरती समूहों तक सीमित मानी जाती है। इसके विपरीत ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि 1920 के दशक का दूसरा KKK एक मुख्यधारा का, मध्यमवर्गीय सामाजिक आंदोलन था, जो अमेरिकी पहचान को लेकर खड़े हुए सांस्कृतिक टकराव से संचालित होता था। यह ऐतिहासिक तुलना दर्शाती है कि सामान्य और संस्थागत समाज भी कितनी आसानी से असहिष्णुता की खाई में गिर सकता है जब उसे लगता है कि उसका सांस्कृतिक वर्चस्व खतरे में है।
हिंसक लोकलुभावनवाद केवल दक्षिणपंथी राजनीति का दायरा नहीं है, बल्कि वामपंथी खेमे के लोग भी इस खतरे को बढ़ाते हैं। लूइगी मैनजिओनी, जिसने एक स्वास्थ्य सेवा कंपनी के CEO की हत्या की बात कबूल की, और अप्रैल में व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर के दौरान डोनाल्ड ट्रंप की कथित तौर पर हत्या की कोशिश करने वाला आरोपी, दोनों वामपंथी राजनीतिक हिंसा के उदाहरण हैं। CPOST के सर्वेक्षण बताते हैं कि आक्रामक तेवर, हिंसक प्रतीकवाद और राजनीतिक विरोधियों का दानवीकरण पूरे राजनीतिक फलक पर धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे हैं। यह स्थिति साबित करती है कि हिंसक लोकलुभावनवाद किसी एक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक और सामाजिक विफलता है।
लोकतंत्र की रक्षा के लिए 70 प्रतिशत आबादी की भूमिका
इस गंभीर संकट के बीच उम्मीद की किरण उन आंकड़ों में छिपी है जो शांति और स्थिरता के पक्ष में खड़े हैं। पेप रेखांकित करते हैं कि अमेरिका के 70 प्रतिशत नागरिक किसी भी तरह की राजनीतिक हिंसा से सख्त नफरत करते हैं। यह एक बहुत बड़ा और अनदेखा जनसमूह है जो लोकतंत्र का असली आधार है। इस 70 प्रतिशत आबादी को केवल मतदान तक सीमित रहने के बजाय आगे आकर सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
वाम और दक्षिण, दोनों खेमों में मौजूद आम नागरिकों का यह विशाल बहुमत बुनियादी स्थिरता और सुशासन की चाह रखता है। वास्तविक उम्मीद इस बात को समझने में है कि नागरिक आपस में एक-दूसरे के दुश्मन नहीं हैं, बल्कि हिंसा का सामान्यीकरण ही असली दुश्मन है। संयम की रणनीतियों को जानबूझकर चुनकर ही लोकतांत्रिक मानकों को दोबारा स्थापित किया जा सकता है और व्यवस्था को किसी गहरे संस्थागत पतन से बचाया जा सकता है।



















