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चुनावी हार पर संवैधानिक संस्थाओं को घेरने के बजाय जनता की नब्ज पहचानना जरूरीराजनीति
6 अक्तू॰ 2026, 3:29 pm (2 घंटे पहले)· 0

चुनावी हार पर संवैधानिक संस्थाओं को घेरने के बजाय जनता की नब्ज पहचानना जरूरी

सत्तारूढ़ दलों के खिलाफ नाराजगी को राजनीति का अकाट्य नियम बताने वाले तर्कों के बीच चुनावी इतिहास बताता है कि मजबूत नेतृत्व और जनसमर्थन के दम पर कई दलों ने बार-बार सत्ता हासिल की है। चुनाव आयोग पर सवाल उठाने के बजाय राजनीतिक रणनीतियों का आत्ममंथन करना ही वास्तविक समाधान है।

लोकतांत्रिक राजनीति में किसी भी सत्ताधारी दल के खिलाफ जनअसंतोष या सत्ता विरोधी लहर स्वाभाविक रूप से पैदा होना तय माना जाता है, लेकिन जब कुछ दल बार-बार चुनावों में विजय हासिल करते हैं तो यह सवाल उठता है कि यह राजनीतिक नियम हर जगह एक जैसा क्यों काम नहीं करता। राहुल गांधी लगातार यह दलील देते रहे हैं कि दुनिया भर के लोकतंत्रों में सत्ता विरोधी लहर एक अनिवार्य प्रक्रिया है, लेकिन केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के सामने यह पूरी तरह निष्प्रभावी साबित हो रही है। अपनी इस उलझन को सुलझाने के लिए वे मतदान प्रक्रिया पर ही उंगली उठाते हुए वोट चोरी और चुनावी हेरफेर जैसे गंभीर आरोप लगा रहे हैं। चूंकि देश में निष्पक्ष चुनाव कराने का दायित्व निर्वाचन आयोग के कंधों पर है, इसलिए उनके निशाने पर सीधे तौर पर यही संवैधानिक संस्था आ खड़ी हुई है। मतदाता सूची को पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाने के उद्देश्य से आयोग द्वारा चलाए जा रहे विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण यानी एसआईआर अभियान पर भी वे सवाल उठा रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि सरकार की मिलीभगत से मतदाता सूची से नाम काटे जा रहे हैं।

सड़क से संसद तक विरोध और मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांगने की सियासत

विपक्षी खेमा यह दावा कर रहा है कि एसआईआर की आड़ में सुनियोजित तरीके से वैध मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि देश की शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग की इस पुनरीक्षण कवायद को पूरी तरह विधि सम्मत और सही ठहराया है। इसके बावजूद कांग्रेस और उसके सहयोगी विपक्षी दल इस मसले को लेकर संसद के भीतर और सड़कों पर लगातार आंदोलन की राह पर हैं। इस राजनीतिक टकराव में अब डिजिटल मंचों पर सक्रिय कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) भी नई पीढ़ी यानी जेन जेड के युवाओं को गोलबंद करके विपक्षी अभियानों को हवा दे रही है। इन तमाम गैर-भाजपा राजनीतिक शक्तियों ने मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर एक साझा आंदोलन छेड़ दिया है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के सीधे इस्तीफे की मांग की जा रही है और वे इस मांग से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

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सत्ता विरोधी लहर को अकाट्य नियम बताने के पीछे राहुल गांधी के तर्क

विपक्ष के नेता का मानना है कि सत्ता विरोधी भावना भारतीय लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन का सबसे बड़ा और बुनियादी आधार रही है। उनका कहना है कि यह एक ऐसी ताकत है जो किसी भी सत्तारूढ़ दल या कद्दावर नेता को ज्यादा समय तक नहीं बख्शती और सरकार बनते ही बहुत तेजी से उसके खिलाफ काम करने लगती है। इस सिद्धांत को पुख्ता करने के लिए वे अपनी दादी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का ऐतिहासिक उदाहरण पेश करते हैं। उनका कहना है कि 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम जीतने के बाद इंदिरा गांधी जब लोकप्रियता के चरम शिखर पर थीं, तब भी केवल एक-दो वर्षों के भीतर उनके खिलाफ जबरदस्त सत्ता विरोधी माहौल तैयार हो गया था। इसी आधार पर वे तर्क देते हैं कि जो नियम हर दल और हर ताकतवर नेता पर लागू होता रहा है, वह नरेंद्र मोदी, अमित शाह और भारतीय जनता पार्टी पर लागू क्यों नहीं हो रहा। वे हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों का हवाला देते हुए कहते हैं कि जहां दशकों तक नियमित अंतराल पर सत्ता बदलती रही, वहां अचानक यह सत्ता विरोधी लहर कैसे गायब हो गई।

चुनावी इतिहास में लंबे शासन और हैट्रिक लगाने वाले मुख्यमंत्रियों की मिसालें

जब दुनिया के तमाम लोकतांत्रिक देशों में सरकारों के खिलाफ असंतोष पैदा होने की मिसालें दी जाती हैं और इसे नरेंद्र मोदी के शासनकाल में एक अबूझ पहेली बताकर चुनाव आयोग तथा सरकार की साठगांठ का नतीजा करार दिया जाता है, तब भारतीय राजनीति के वास्तविक इतिहास का बारीकी से विश्लेषण करना जरूरी हो जाता है। इस हकीकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि आजादी के बाद वर्ष 1947 से लेकर 1977 तक पूरे तीन दशकों तक देश में लगातार कांग्रेस पार्टी की ही सरकारें बनती रहीं। उस लंबे दौर में पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी लगातार सत्ता में रहे, और बाद में राजीव गांधी ने भी देश की बागडोर संभाली। इसके बाद सोनिया गांधी के दौर में विवादों से दूर रहने के लिए मनमोहन सिंह को आगे किया गया और वे भी लगातार 2004 से 2014 तक पूरे दस साल प्रधानमंत्री पद पर रहे। ऐसे में अगर लंबे समय तक सत्ता में बने रहने को केवल किसी कथित साठगांठ का नतीजा माना जाए, तो यह इतिहास के तथ्यों के साथ नाइंसाफी होगी।

राज्यों में पांच-पांच बार सरकार बनाने वाले क्षेत्रीय क्षत्रपों का रिकॉर्ड

अगर प्रांतीय राजनीति पर नजर डालें तो दर्जनों ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं जिन्होंने लगातार तीन या उससे ज्यादा बार चुनाव जीतकर सत्ता विरोधी लहर की अवधारणा को पूरी तरह ध्वस्त किया है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने लगातार तीन कार्यकालों तक जीत दर्ज की, जबकि बिहार में नीतीश कुमार को लगातार 20 वर्षों तक मुख्यमंत्री पद पर रहने का मौका मिला। ओडिशा में नवीन पटनायक ने वर्ष 2000 से 2024 तक लगातार पांच बार सत्ता संभालकर एक बड़ा कीर्तिमान स्थापित किया। खुद नरेंद्र मोदी ने गुजरात में 2001 से 2012 तक लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीते और वह भी उस दौर में जब केंद्र में कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार थी। इसी तरह केंद्र में भाजपा सरकार होने के बावजूद ममता बनर्जी ने 2011 में पहली बार जीतने के बाद लगातार तीसरी बार जीत हासिल की, हालांकि 2026 में उन्हें भाजपा के हाथों पराजय झेलनी पड़ी। छत्तीसगढ़ में भाजपा के रमन सिंह ने 2003 से 2018 तक लगातार तीन बार सत्ता संभाली।

अन्य दलों के मुख्यमंत्रियों का निरंतर चुनावी विजय का सफर

असम में कांग्रेस के तरुण गोगोई ने 2001, 2006 और 2011 में लगातार तीन विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज की। दिल्ली में कांग्रेस की शीला दीक्षित ने भी 1998 से 2008 तक लगातार तीन बार सरकार बनाई। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने 2003, 2008 और 2013 में जीत हासिल कर अपनी सरकार को बार-बार दोहराया। सिक्किम में पवन कुमार चामलिंग ने 1994 से 2019 तक लगातार पच्चीस साल शासन किया, जबकि पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु ने 1977 से 2000 तक लगातार पांच बार वाममोर्चा की सरकार का नेतृत्व किया। पूर्वोत्तर राज्यों में त्रिपुरा में मानिक सरकार, नगालैंड में नेफ्यू रियो और मणिपुर में ओकरम इबोबी सिंह ने भी लगातार चुनावी हैट्रिक लगाकर जीत का परचम लहराया था। इन तमाम मिसालों से साफ जाहिर होता है कि जनता का विश्वास जीतना, मजबूत सांगठनिक ढांचा, लोककल्याणकारी योजनाएं और विपक्ष की रणनीतिक कमजोरियां ही चुनावों का फैसला करती हैं, न कि केवल सत्ता विरोधी लहर का कोई कथित नियम।

सवाल-जवाब

राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर क्या मुख्य आरोप लगाए हैं?
राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग सरकार के साथ मिलकर काम कर रहा है और एसआईआर प्रक्रिया के दौरान वोटर लिस्ट से लोगों के नाम काटे जा रहे हैं।
विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण (एसआईआर) पर सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख रहा है?
देश की सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग द्वारा संचालित एसआईआर प्रक्रिया को पूरी तरह सही और वैध ठहराया है।
विपक्षी दल किस मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांग रहे हैं?
विपक्षी दल और प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।
राहुल गांधी ने सत्ता विरोधी लहर को समझाने के लिए किसका ऐतिहासिक उदाहरण दिया?
उन्होंने अपनी दादी इंदिरा गांधी का उदाहरण देते हुए कहा कि 1971 में बांग्लादेश युद्ध जीतने के बावजूद एक-दो साल के भीतर उनके खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल बन गया था।
क्या भारतीय राजनीति में लगातार कई बार चुनाव जीतने का कोई पूर्व इतिहास रहा है?
हां, केंद्र में कांग्रेस ने 1947 से 1977 तक लगातार तीन दशक शासन किया, जबकि नवीन पटनायक, ज्योति बसु, पवन कुमार चामलिंग, नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार जैसे कई नेताओं ने राज्यों में लगातार कई कार्यकाल पूरे किए हैं।
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