मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर विपक्ष की तरफ से की गई बयानबाजी के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के फौरन बाद भारतीय जनता पार्टी ने पलटवार करते हुए उनके तर्कों को जमीनी हकीकत से दूर बताया। भाजपा प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने सार्वजनिक मंच से दावा किया कि विपक्षी नेतृत्व में देश की राजनीतिक वास्तविकताओं और चुनावी इतिहास को लेकर गंभीर समझ का अभाव है।
एंटी-इनकम्बेंसी के दावों पर चुनावी अतीत का हवाला
सुधांशु त्रिवेदी ने विपक्षी नेता के उस कथन पर सीधे सवाल उठाए जिसमें उन्होंने सत्ता विरोधी लहर यानी एंटी-इनकम्बेंसी को केवल मौजूदा दौर की परिघटना बताया था। भाजपा नेता ने कहा कि चुनावी इतिहास बताता है कि कांग्रेस के खिलाफ दशकों तक चलने वाली सत्ता विरोधी लहर बेहद मजबूत और अटूट रही है। उदाहरण देते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि साल 1967 के बाद से कांग्रेस तमिलनाडु की सत्ता में दोबारा कभी कदम नहीं रख पाई, जबकि उस समय भारतीय जनता पार्टी का कोई वजूद भी नहीं था। इसी तरह पश्चिम बंगाल का जिक्र करते हुए उन्होंने याद दिलाया कि साल 1977 से 2011 तक वामपंथियों ने वहां लगातार 34 साल तक शासन किया और 1977 के बाद कांग्रेस राज्य में कभी वापस नहीं लौटी।
पुराने चुनावी तौर-तरीकों और नतीजों पर सवाल
विपक्षी दल के लंबे शासनकाल की परिस्थितियों का ब्योरा देते हुए सुधांशु त्रिवेदी ने मतदाता पहचान पत्र से पहले के दौर की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि उस जमाने में बूथ पर कब्जे, मतपेटियों की लूट और खुलेआम गोलीबारी जैसी घटनाओं के बीच चुनाव संपन्न होते थे। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में शायद ही कोई ऐसा चुनाव बीतता था जिसमें हिंसा, मौतें और घायलों की खबरें न आती हों। भाजपा नेता के अनुसार उस समय कांग्रेस के खिलाफ जनभावनाओं के बावजूद नतीजे अलग आते थे, जिसे आज का नेतृत्व नजरअंदाज कर देता है।
चुनाव आयोग के फैसले और नेतृत्व पर सियासी तंज
संस्थागत प्रक्रिया स्पष्ट करते हुए भाजपा सांसद ने कहा कि निर्वाचन आयोग में कोई भी फैसला बहुमत के आधार पर तय होता है। SIR से संबंधित जो भी कदम उठाए गए हैं, वे तीनों चुनाव आयुक्तों के बहुमत के आधार पर ही लिए गए हैं। सुधांशु त्रिवेदी ने आगे कटाक्ष करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जमीन से जुड़े हुए नेता हैं, जबकि राहुल गांधी जमीन से उड़े हुए हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि राहुल गांधी अपने बलबूते एक भी संसदीय सीट जीतने में सक्षम नहीं हैं और रायबरेली से उनका चुनाव भी समाजवादी पार्टी के समर्थन की बैसाखी पर टिका हुआ था।





















