दीपावली के पावन पर्व पर देश भर के बाजारों में मिठाइयों की भारी मांग देखने को मिलती है, लेकिन राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में एक ऐसी मिठाई तैयार की जाती है जो अपने सादे संघटकों और अनूठी निर्माण विधि के लिए प्रसिद्ध है। झुंझुनूं जिले के बिसाऊ कस्बे में तैयार होने वाली तिलंगनी सेंठोली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें न तो घी का इस्तेमाल होता है और न ही किसी प्रकार के तेल की आवश्यकता पड़ती है। पूरी तरह से चीनी की चाशनी पर आधारित यह पारंपरिक मिठास वर्षों से लक्ष्मी पूजन की थाली की अनिवार्य सामग्री रही है। जैसे ही त्योहारों का दौर नजदीक आता है, इस क्षेत्र के मिष्ठान कारीगरों की दिनचर्या बेहद व्यस्त हो जाती है और स्थानीय भट्टियों में इस खास मिठास को ढालने का सिलसिला शुरू हो जाता है।
धार्मिक मान्यता और लक्ष्मी पूजन में भोग की परंपरा
शेखावाटी के ग्रामीण और शहरी अंचलों में दीपावली की रात होने वाली महालक्ष्मी पूजा में सेंठोली का भोग लगाना बेहद मंगलकारी माना गया है। लोक मान्यताओं के अनुसार, शुद्ध और सात्विक तरीके से तैयार की गई इस मिठाई को अर्पित करने से गृहस्थी में सुख, शांति और आर्थिक समृद्धि का वास होता है। परिवारों में यह रीति पीढ़ियों से निरंतर चली आ रही है, जिसके चलते लोग अन्य आधुनिक मिठाइयों की मौजूदगी के बावजूद इस पारंपरिक प्रसाद को भूलते नहीं हैं। शारदीय नवरात्र के आरंभ के साथ ही इस मिठाई की मांग में उछाल आना शुरू हो जाता है और यह व्यस्तता दीपावली के दिन तक अपने चरम पर रहती है। आसपास के क्षेत्रों के साथ-साथ दूर-दराज के गांवों से लोग विशेष रूप से बिसाऊ पहुंचकर इसके आर्डर लिखवाते हैं ताकि पूजा के दिन कोई कमी न रहे।
पत्थर की शिला और लोहे की छड़ पर निखरता हुनर
तिलंगनी सेंठोली का स्वरूप आम मिठाइयों से काफी अलग होता है। यह देखने में एकदम दूधिया सफेद, लंबी और पतली सींक जैसी प्रतीत होती है। इसे तैयार करने की पूरी प्रक्रिया कारीगरों के शारीरिक श्रम, सटीक समय प्रबंधन और पीढ़ियों के अनुभव पर टिकी होती है। सबसे पहले एक निश्चित अनुपात में चीनी को उबालकर उसकी रवादार चाशनी बनाई जाती है। जब चाशनी सही तापमान और गाढ़ेपन पर पहुंच जाती है, तो उसे एक चिकनी और साफ पत्थर की शिला पर डाला जाता है। इसके बाद कारीगर अपने हाथों से गर्म चाशनी को तेजी से फेंटना शुरू करते हैं। जैसे-जैसे चाशनी को पत्थर पर लगातार रगड़ा और पलटा जाता है, उसके भीतर हवा का संचार होता है और उसका रंग सुनहरे से बदलकर पूरी तरह सफेद हो जाता है।
चाशनी के उचित खिंचाव पर आते ही अगला चरण शुरू होता है, जिसमें दीवार पर मजबूती से लगाई गई लोहे की छड़ का सहारा लिया जाता है। कारीगर चाशनी के सफेद लोचे को छड़ पर टांगकर बार-बार खींचते हैं और दोहराते हैं। इस खिंचाव की प्रक्रिया से मिठाई के भीतर बारीक रेशे और मजबूती आती है। इसके पश्चात उसे लंबी और पतली सींकों का रूप दिया जाता है। इस काम में लगे कुशल कामगारों के अनुसार, केवल दो किलो सेंठोली तैयार करने में लगभग एक पूरे घंटे की निरंतर मेहनत लग जाती है। चाशनी के तापमान का तनिक भी असंतुलन पूरी मेहनत को बिगाड़ सकता है, इसलिए कारीगरों की पारखी नजरें ही इसकी गुणवत्ता तय करती हैं।
पारंपरिक स्वरूप में पुदीने की ठंडक का नया समावेश
बदलते दौर और खानपान की नई प्राथमिकताओं के बीच बिसाऊ के कारीगरों ने इस पारंपरिक व्यंजन के मूल स्वाद को बचाए रखते हुए उसमें कुछ नवाचार भी जोड़े हैं। पहले जहां यह मिठाई केवल सादी चाशनी के मिठास के साथ मिलती थी, वहीं अब इसमें पेपरमिंट का फ्लेवर भी मिलाया जाने लगा है। पुदीने के अर्क का यह हल्का सा स्पर्श खाते ही मुंह में एक ताजगी और शीतलता भर देता है। इस स्वाद के कारण बच्चे और युवा पीढ़ी भी इसे बड़े चाव से पसंद करने लगे हैं। इसके अलावा, घी और दूध के उत्पाद न होने के कारण यह मिठाई बहुत जल्दी खराब नहीं होती है। नमी से बचाकर सूखे डिब्बों में सुरक्षित रखने पर यह लंबे समय तक अपनी बनावट और स्वाद बनाए रखती है, जिसके कारण लोग इसे दीपावली के कई हफ्तों बाद तक उपयोग में लाते हैं।
देश-विदेश में बसे शेखावाटी के प्रवासियों तक पहुंच
बिसाऊ की इस स्थानीय मिठास का दायरा अब केवल झुंझुनूं या राजस्थान की सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है। आजीविका और व्यापार के सिलसिले में मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु और अहमदाबाद जैसे बड़े शहरों में बसे शेखावाटी के प्रवासी आज भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं। दीपावली के पावन अवसर पर अपनी कुल परंपराओं को निभाने के लिए वे हफ्तों पहले से बिसाऊ के हलवाइयों से संपर्क कर सेंठोली के पार्सल बुक करवा लेते हैं। इतना ही नहीं, खाड़ी देशों और पश्चिमी मुल्कों में रहने वाले अनिवासी भारतीय भी अपने परिजनों के जरिए इस अनूठी मिठाई को मंगाते हैं। अपनी जन्मभूमि से हजारों मील दूर रहकर भी जब वे पूजन में इस सेंठोली का भोग लगाते हैं, तो उन्हें अपने गांव, घर-आंगन और बचपन की दीपावली की जीवंत अनुभूति होती है।
सांस्कृतिक पहचान और हस्तशिल्प की मिसाल
आज जब बाजार रासायनिक रंगों, प्रिजर्वेटिव्स और मशीनों द्वारा बनी मिठाइयों से पटे पड़े हैं, तब बिसाऊ की तिलंगनी सेंठोली हाथ की कारीगरी और शुद्धता का एक प्रामाणिक उदाहरण प्रस्तुत करती है। नवरात्र से लेकर दीपोत्सव के समापन तक चलने वाला यह कुटीर उद्योग न केवल स्थानीय कारीगरों को रोजगार देता है, बल्कि शेखावाटी की पाक कला की धरोहर को भी संरक्षित रखता है। यह मिठाई दर्शाती है कि किसी अंचल की संस्कृति सिर्फ उसकी विशाल हवेलियों और भित्तिचित्रों में ही नहीं, बल्कि त्योहारों पर तैयार होने वाले ऐसे सात्विक पकवानों और उनसे जुड़ी श्रद्धा में भी रची-बसी होती है। बिसाऊ की यह सफेद सींक जैसी मिठाई आज भी निष्ठा, स्वाद और राजस्थान की लोक परंपरा का प्रतीक बनकर अपनी महक बिखेर रही है।


















