झुंझुनू के हिमांशु सिंह का जीवन उन तमाम लोगों के लिए एक मिसाल है जो बोलने में असुविधा और आत्मविश्वास की कमी का सामना करते हैं। शुरुआती वर्षों में जब बच्चे बेहिचक अपनी बात रखना सीखते हैं, उस दौरान हिमांशु के लिए सामान्य बातचीत करना भी एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा था। महज छह साल की उम्र से उन्हें हकलाहट की समस्या ने घेर लिया था, जिससे स्कूल की कक्षाओं में जवाब देने या अपना परिचय देने के दौरान उनके शब्द अक्सर अटक जाया करते थे। साथियों की तरफ से होने वाले उपहास ने कई बार उनके मनोबल को भी ठेस पहुंचाई, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और डटकर मुकाबला किया। अपनी मजबूत इच्छाशक्ति, लगातार अभ्यास और स्पीच थेरेपी की मदद से उन्होंने इस बाधा को पार किया और उसी आवाज को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया, जिसे लेकर वह कभी संकोच महसूस करते थे।
लंबा संघर्ष और आकाशवाणी तक का सफर
करीब 23 साल की उम्र तक, यानी लगभग 17 लंबे वर्षों तक हिमांशु को इस परेशानी से जूझना पड़ा। इस दौरान सार्वजनिक मंचों पर बोलने और आम बातचीत करने में उन्हें भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। हालांकि, एक उम्र के बाद उन्होंने इस समस्या से पार पाने के लिए बेहद गंभीर और अनुशासित प्रयास शुरू कर दिए। उन्होंने स्पीच थेरेपी का सहारा लिया, इस विषय पर गहराई से अध्ययन किया और अपनी दिनचर्या में नियमित अभ्यास को शामिल किया। धीरे-धीरे उनके बोलने के ढंग में सुधार आने लगा और उनका आत्मविश्वास भी मजबूत होने लगा। उन्होंने बार-बार माइक के सामने खड़े होकर अभ्यास किया ताकि उनके भीतर की झिझक पूरी तरह खत्म हो सके। इसी कड़ी मेहनत का सुखद परिणाम यह निकला कि वर्ष 2015 में उन्होंने आकाशवाणी की ऑडिशन प्रक्रिया को सफलतापूक पास कर लिया और इसके बाद आकाशवाणी के युववाणी कार्यक्रम से बतौर उद्घोषक जुड़ गए।
रेडियो से लेकर दूरदर्शन और प्रशासनिक सेवा तक
आकाशवाणी और दूरदर्शन जैसे प्रतिष्ठित माध्यमों में कार्य करने का तजुर्बा हासिल करने वाले हिमांशु सिंह वर्तमान समय में राजस्थान सरकार के अंतर्गत जिला जनसंपर्क अधिकारी की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उनका यह पूरा सफर यह साबित करता है कि किसी भी रुकावट को अपनी मुकद्दर की कमजोरी मानकर बैठ जाने के बजाय यदि निरंतर प्रयास किए जाएं तो सफलता अवश्य मिलती है। उनकी यह उपलब्धि केवल एक व्यक्तिगत जीत नहीं है, बल्कि उन अनगिनत बच्चों और युवाओं के लिए उम्मीद का एक नया सूरज है जो हकलाने की समस्या के कारण सार्वजनिक रूप से बोलने से घबराते हैं। हिमांशु अपनी इस सफलता को केवल अपने तक सीमित नहीं रखना चाहते हैं, बल्कि वे आज के समय में हकलाहट से पीड़ित अन्य बच्चों को निशुल्क स्पीच थेरेपी के जरिए संबल प्रदान कर रहे हैं और उचित परामर्श भी दे रहे हैं। उनका यह प्रयास रहता है कि बच्चों को बोलने का बेहतर अभ्यास मिले और उन्हें ऐसा सकारात्मक माहौल मिले जहां उनकी बातों को पूरी तल्लीनता और धैर्य के साथ सुना जा सके।
विशेषज्ञों की राय और समाज की जिम्मेदारी
ऑडियोलॉजिस्ट एवं स्पीच लैंग्वेज थेरेपिस्ट डॉ. अमित किराड़ के अनुसार, हकलाहट मूल रूप से बोलने के प्रवाह से जुड़ी हुई एक जटिल समस्या है जिसके पीछे कई अलग-अलग जैविक या अन्य कारक हो सकते हैं। इसे केवल किसी प्रकार का डर, कोई गलत आदत या फिर सांस के तालमेल में आई गड़बड़ी मान लेना पूरी तरह से गलत है। ऐसे मामलों में किसी पेशेवर और प्रशिक्षित स्पीच लैंग्वेज थेरेपिस्ट से सही मूल्यांकन और मार्गदर्शन लेना बहुत जरूरी हो जाता है। हकलाने वाले व्यक्ति पर कभी भी जल्दी बोलने का दबाव नहीं बनाना चाहिए, बल्कि उसे पूरी तरह से धैर्य के साथ सुनना चाहिए। हिमांशु सिंह की यह प्रेरणादायक यात्रा इस बात को पूरी दृढ़ता के साथ रेखांकित करती है कि उचित मार्गदर्शन, निरंतर अभ्यास और अपनों के सहयोग से कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यताओं को निखार सकता है और अपने मुकाम को हासिल कर सकता है।

















