हिंदू कैलेंडर के मुताबिक एक साल में कुल चार नवरात्रि मनाई जाती हैं, जिनमें आषाढ़ गुप्त नवरात्रि को देवी की साधना और विशेष आराधना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। यह पर्व आषाढ़ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होता है और नौ दिनों तक चलता है। इन नौ दिनों में भक्त मां दुर्गा की भक्ति में लीन रहते हैं, मंत्रों का जाप करते हैं, तंत्र साधना के कठिन अनुष्ठान पूरे करते हैं और 10 महाविद्याओं की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। ऐसी गहरी धार्मिक मान्यता है कि इस साधना से भक्तों को देवी की असीम कृपा प्राप्त होती है और आध्यात्मिक उन्नति के द्वार खुलते हैं।
देवी का आगमन और शुभ योग
आषाढ़ गुप्त नवरात्रि इस बार 15 जुलाई से शुरू हो रही है। इस बार का आगमन एक अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोग के साथ हो रहा है, जो 12 वर्षों के बाद देखने को मिल रहा है। पंचांग के अनुसार, इस दिन गजकेसरी योग और बुध पुष्य योग का अद्भुत मिलन हो रहा है। 15 जुलाई को पुष्य नक्षत्र रहेगा और चंद्रमा कर्क राशि में स्थित होंगे। चूंकि गुरु का किसी एक राशि में भ्रमण 12 साल में होता है और चंद्रमा के साथ उनकी युति से गजकेसरी योग का निर्माण हो रहा है, इसलिए यह समय साधना के लिए बहुत ही प्रभावशाली माना जा रहा है।
नौका पर सवार होकर आएंगी माता
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, नवरात्रि की शुरुआत किस वार से हो रही है, इसी के आधार पर माता रानी के वाहन का निर्धारण होता है। क्योंकि इस बार गुप्त नवरात्रि की शुरुआत सोमवार को हो रही है (15 जुलाई), इस वार के आधार पर माता रानी का वाहन नौका (नाव) माना गया है। देवी भागवत पुराण के उल्लेख के अनुसार, माता का नौका पर आगमन पृथ्वी पर अच्छी वर्षा, खुशहाली, समृद्धि और खेती-किसानी में भरपूर उन्नति का संकेत देता है। कृषि प्रधान क्षेत्रों के लिए इसे अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना जा रहा है। यह विश्वास है कि नाव पर सवार होकर आने से माता अपने भक्तों के सभी दुख हर लेती हैं और चारों तरफ सुख-शांति का संचार करती हैं।
उज्जैन में विशेष अनुष्ठान
महाकाल की पावन नगरी उज्जैन में गुप्त नवरात्रि को लेकर विशेष तैयारियां की गई हैं। यहाँ के प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिरों जैसे हरसिद्धि मंदिर, बगलामुखी मंदिर, गढ़कलिका मंदिर और चौंसठ योगिनी मंदिर सहित सभी प्रमुख सिद्धपीठों में भव्य अनुष्ठान आयोजित किए जाएंगे। भक्त इन नौ दिनों तक मां काली, तारा, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी और बगलामुखी सहित दस महाविद्याओं की आराधना करेंगे। इस पावन पर्व का समापन नवमी तिथि के दिन हवन और पूर्णाहुति के साथ संपन्न होगा।











