सनातन धर्म की परंपराओं में जीवन के अंतिम पड़ाव और मृत्यु के पश्चात के कर्मकांडों के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश दिए गए हैं। इन्हीं मान्यताओं में एक विशेष नियम यह भी है कि दामाद को अपने सास-ससुर के अंतिम संस्कार में सम्मिलित होकर अर्थी को कंधा नहीं देना चाहिए। गरुड़ पुराण जैसे पवित्र ग्रंथों में भी इस व्यवस्था का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। यह परंपरा केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरे धार्मिक कारण और सामाजिक दृष्टिकोण छिपे हुए हैं।
गरुड़ पुराण और मृत्यु संस्कार
गरुड़ पुराण में आत्मा की यात्रा, यमलोक के मार्ग, कर्मों के आधार पर मिलने वाले परिणामों और मृत्यु के बाद किए जाने वाले संस्कारों का विस्तार से वर्णन है। शास्त्र यह स्पष्ट करते हैं कि अंतिम संस्कार की प्रक्रिया केवल दिवंगत व्यक्ति के अपने कुल या वंश के सदस्यों द्वारा ही संपन्न की जानी चाहिए। इस ग्रंथ के अनुसार, दामाद को सास-ससुर की अर्थी को कंधा देने या मुखाग्नि देने की अनुमति नहीं दी गई है।
प्रेत खंड की मान्यता
गरुड़ पुराण के प्रेत खंड में दामाद के प्रति सम्मान का विशेष भाव व्यक्त किया गया है। धार्मिक शास्त्रों में 'जमाई' शब्द को यमराज से जोड़कर देखा जाता है, इसीलिए दामाद को एक अत्यंत सम्मानित व्यक्ति माना गया है। ग्रंथों के अनुसार, सास-ससुर का कर्तव्य है कि वे अपने दामाद के साथ सदा आदरपूर्ण व्यवहार रखें। यदि सास-ससुर अपने दामाद का अपमान करते हैं या उनके साथ अनुचित बर्ताव करते हैं, तो मृत्यु के उपरांत उन्हें परलोक की यात्रा में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इसी सम्मानजनक पद के कारण उन्हें दाह-संस्कार की प्रक्रिया में शामिल करने से मना किया गया है।
अधिकार और वंश परंपरा
अंतिम संस्कार के अधिकारों के संबंध में गरुड़ पुराण यह स्पष्ट करता है कि केवल उसी वंश या गोत्र के सदस्य इस दायित्व को निभा सकते हैं जिनसे दिवंगत व्यक्ति का प्रत्यक्ष रक्त संबंध हो। हिंदू धर्मशास्त्रों में बेटी और दामाद को उस परिवार का सदस्य नहीं माना जाता, जिस कुल में उनका विवाह हुआ है। इस कारण से परंपरागत रूप से दामाद का अंतिम संस्कार में भाग लेना उचित नहीं माना गया है।
पुत्र का अभाव होने पर क्या करें
शास्त्रों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के पुत्र या पौत्र न हों, तो ऐसी स्थिति में वंश आगे बढ़ाने की प्रक्रिया और अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी बेटी के पुत्र यानी नाती को दी गई है। नाती को नानी के श्राद्ध और अन्य पितृ कर्मों का आधिकारिक उत्तराधिकारी माना जाता है। यह व्यवस्था वंश की निरंतरता और परंपरा को बनाए रखने के उद्देश्य से निर्मित की गई है।
सामाजिक बदलाव का प्रभाव
वर्तमान समय में समाज और परिवार के ढांचे में व्यापक परिवर्तन आए हैं। कई परिवारों में पुत्रों का अभाव है या पारिवारिक सदस्यों की अनुपस्थिति के कारण अंतिम संस्कार की रस्में संपन्न करने वाला कोई अन्य वंशज उपलब्ध नहीं होता है। ऐसे में बेटी, दामाद या अन्य निकटतम रिश्तेदार मानवीय संवेदनाओं और कर्तव्य के नाते अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। आज के समय में अधिकांश परिवार अपनी परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार इन परंपराओं का निर्वहन कर रहे हैं।











