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हिमाचल प्रदेश की पीर पंजाल पहाड़ियों में मणिमहेश यात्रा की शुरुआत, जानिए रक्षाबंधन से लेकर राधाष्टमी तक के सभी अनुष्ठानधर्म
27 अग॰ 2026, 7:27 am (1 घंटे पहले)· 3

हिमाचल प्रदेश की पीर पंजाल पहाड़ियों में मणिमहेश यात्रा की शुरुआत, जानिए रक्षाबंधन से लेकर राधाष्टमी तक के सभी अनुष्ठान

हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में स्थित मणिमहेश कैलाश की पवित्र यात्रा रक्षाबंधन के पावन पर्व 28 अगस्त शुक्रवार से आरंभ हो रही है। साधु-संतों के पहले जत्थे के साथ शुरू होने वाली यह धार्मिक यात्रा कृष्ण जन्माष्टमी के छोटे स्नान और राधा अष्टमी के बड़े स्नान के साथ संपन्न होगी।

उत्तर भारत की देवभूमि हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में स्थित मणिमहेश कैलाश पर्वत श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का केंद्र है। पीर पंजाल पर्वत शृंखलाओं के बीच समुद्र तल से तकरीबन 13,000 फीट की ऊंचाई पर विराजमान यह पवित्र स्थल हर वर्ष रक्षाबंधन के पावन अवसर पर जीवंत हो उठता है। इस वर्ष भाई-बहन का पवित्र पर्व रक्षाबंधन 28 अगस्त दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी शुभ तिथि पर साधु-संतों का पहला दल पवित्र मणिमहेश की यात्रा पर प्रस्थान करता है और वहां पहुंचकर प्रथम पूजा तथा स्नान संपन्न करता है। इसी के साथ इस प्रसिद्ध धार्मिक मेले और आधिकारिक यात्रा का शुभारंभ होता है, जो आगे चलकर भाद्रपद मास की कृष्ण जन्माष्टमी से होती हुई राधा अष्टमी तक निरंतर चलती है।

रक्षाबंधन की पावन भोर और दिव्य प्रकाश का रहस्य

मणिमहेश कैलाश पर्वत से जुड़ी लोकमान्यताओं में रक्षाबंधन के दिन का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन तड़के जब भगवान सूर्य देव की प्रथम किरणें कैलाश पर्वत की ऊंची बर्फिली चोटी को स्पर्श करती हैं, तब वहां एक अलौकिक तथा अद्भुत प्रकाश बिखर जाता है। श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि इस पावन समय में पर्वत के शिखर पर दिव्य मणि के समान चमक दिखाई देती है। मणिमहेश झील का अत्यंत स्वच्छ एवं पारदर्शी पानी कैलाश पर्वत के विशाल, बर्फ से आच्छादित प्रतिबिंब को अपने भीतर समेट लेता है। यह मनमोहक दृश्य वहां उपस्थित भक्तों को एक अलग ही अध्यात्मिक दुनिया का अहसास कराता है।

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छोटा स्नान और बड़ा स्नान: यात्रा के दो प्रमुख पड़ाव

मणिमहेश यात्रा के दौरान पवित्र झील में डुबकी लगाने के लिए दो तिथियां मुख्य रूप से निर्धारित हैं, जिन्हें छोटा स्नान और बड़ा स्नान कहा जाता है। छोटा स्नान प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी यानी कृष्ण जन्माष्टमी की तिथि पर आयोजित किया जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाने के साथ ही श्रद्धालु दुर्गम रास्तों और कड़ाके की ठंड की परवाह किए बिना मणिमहेश झील पहुंचकर यात्रा के पहले बड़े चरण को पूरा करते हैं और पवित्र जल में डुबकी लगाते हैं। इसके बाद भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी यानी राधा अष्टमी के दिन बड़ा स्नान संपन्न होता है। बड़ा स्नान इस पूरी मणिमहेश यात्रा का सबसे भव्य और अंतिम मुख्य आकर्षण माना जाता है, जिसके साथ ही इस वार्षिक धार्मिक यात्रा का विधिवत समापन हो जाता है। इन मुख्य स्नान पर्वों की तिथियां हर साल पंचांग के अनुसार बदलती रहती हैं।

गूर चरपतनाथ की पवित्र छड़ी और पारंपरिक शोभायात्रा

मणिमहेश यात्रा का शुभारंभ एक अत्यंत प्राचीन और भव्य परंपरा के तहत होता है, जिसे 'छड़ी यात्रा' के नाम से जाना जाता है। यह पवित्र छड़ी गूर चरपतनाथ जी की मानी जाती है, जिसे श्रद्धालु अत्यंत श्रद्धाभाव से अपने कंधों पर उठाकर ले जाते हैं। इस छड़ी यात्रा की विधिवत शुरुआत चंबा शहर में स्थित ऐतिहासिक लक्ष्मी नारायण मंदिर तथा दशनामी अखाड़े से होती है। रंग-बिरंगी पताकाओं और पवित्र छड़ी के साथ निकलने वाली इस शोभायात्रा में सैकड़ों भक्त शामिल होते हैं। पूरे पैदल मार्ग पर श्रद्धालु भगवान शिव के भजनों और कीर्तनों की मधुर धुन पर झूमते हुए आगे बढ़ते हैं।

भरमौर के राज पुरोहितों के अनुष्ठान और पवित्र स्नान के नियम

जब यह पवित्र छड़ी यात्रा मणिमहेश झील के तट पर पहुंचती है, तब वहां भरमौर के पारंपरिक ब्राह्मण परिवार से आने वाले राज पुरोहितों द्वारा रात भर विशेष पूजा-अर्चना और वैदिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। पूरी रात चलने वाले इन धार्मिक अनुष्ठानों के अगले दिन श्रद्धालु मणिमहेश झील में मुख्य पवित्र स्नान, जिसे स्थानीय भाषा में 'नौण' कहा जाता है, पूरा करते हैं। स्नान के पश्चात भक्त भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पवित्र झील की तीन बार परिक्रमा करते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती ने गौरी कुंड में स्नान किया था और भगवान शिव ने शिव कलोत्री में स्नान किया था। इसी धार्मिक परंपरा का पालन करते हुए महिला श्रद्धालु मणिमहेश झील में डुबकी लगाने से पहले गौरी कुंड में स्नान करती हैं, जबकि पुरुष श्रद्धालु शिव कलोत्री में स्नान करते हैं।

भगवान शिव का निवास और मणिमहेश पर्वत का अजेय शिखर

मणिमहेश कैलाश पर्वत को भगवान शिव के पांच प्रमुख कैलाश धामों में से एक अत्यंत पवित्र स्थल माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भोलेनाथ ने माता पार्वती के संग निवास करने के उद्देश्य से इस पर्वत का निर्माण किया था। यहां भगवान शिव साक्षात शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं, जबकि माता पार्वती को देवी गिरजा के स्वरूप में पूजा जाता है। ऐसा माना जाता है कि संध्या काल और रात्रि के मध्य समय में भगवान शिव भक्तों को दर्शन देते हैं। सूर्यास्त के समय जब सूर्य की अंतिम किरणें पर्वत की चोटी पर पड़ती हैं, तो संपूर्ण कैलाश स्वर्णिम आभा से चमक उठता है। मौसम साफ रहने पर श्रद्धालु पर्वत के शिखर और शिव के दिव्य स्वरूप का दर्शन कर पाते हैं।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मणिमहेश पर्वत का मुख्य शिखर अधिकांश समय बादलों और बर्फ की मोटी परत से ढका रहता है। कहा जाता है कि इस पवित्र चोटी के दर्शन केवल वही व्यक्ति कर पाता है जो पूर्णतः निष्पाप हो और सच्ची श्रद्धा से भगवान शिव का स्मरण कर रहा हो। इस पर्वत की सटीक ऊंचाई को लेकर आज तक कोई ठोस या आधिकारिक आंकड़े सामने नहीं आए हैं। तिब्बत स्थित मुख्य कैलाश पर्वत की तरह मणिमहेश कैलाश की चोटी पर भी चढ़ाई करना सर्वथा असंभव माना गया है। जनश्रुति है कि जो भी व्यक्ति इस चोटी पर चढ़ने का प्रयास करता है, उसे कोई अदृश्य शक्ति आगे बढ़ने से रोक देती है। वर्ष 1968 में नंदिनी पटेल के नेतृत्व में भारत और जापान की एक संयुक्त पर्वतारोही टीम ने मणिमहेश पर्वत को फतह करने का प्रयास किया था, परंतु वे अपनी इस मुहिम में पूरी तरह असफल रहे थे।

सवाल-जवाब

मणिमहेश कैलाश पर्वत कहां स्थित है?
मणिमहेश कैलाश पर्वत हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में पीर पंजाल पर्वत शृंखलाओं के बीच समुद्र तल से लगभग 13,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।
वर्ष 2026 में रक्षाबंधन पर मणिमहेश यात्रा कब से शुरू हो रही है?
वर्ष 2026 में रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा और इसी दिन साधु-संतों का पहला जत्था पवित्र स्नान के साथ यात्रा की औपचारिक शुरुआत करेगा।
मणिमहेश यात्रा में छोटा स्नान और बड़ा स्नान कब होता है?
छोटा स्नान भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी यानी कृष्ण जन्माष्टमी के दिन होता है, जबकि बड़ा स्नान भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी यानी राधा अष्टमी के दिन होता है।
मणिमहेश यात्रा की आधिकारिक छड़ी कहां से निकलती है?
पवित्र छड़ी यात्रा गूर चरपतनाथ जी की छड़ी के साथ चंबा शहर स्थित लक्ष्मी नारायण मंदिर और दशनामी अखाड़े से गाजे-बाजे के साथ रवाना होती है।
मणिमहेश झील में डुबकी लगाने से पहले महिला और पुरुष श्रद्धालु कहां स्नान करते हैं?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महिला श्रद्धालु पहले गौरी कुंड में स्नान करती हैं, जबकि पुरुष श्रद्धालु शिव कलोत्री में स्नान करने के बाद मणिमहेश झील में डुबकी लगाते हैं।
क्या मणिमहेश कैलाश पर्वत की चोटी पर चढ़ाई संभव हुई है?
मणिमहेश कैलाश की चोटी पर चढ़ना नामुमकिन माना जाता है। वर्ष 1968 में नंदिनी पटेल के नेतृत्व वाली भारत-जापान की टीम ने चढ़ाई की कोशिश की थी, परंतु वे असफल रहे थे।
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