सागर का परेड मंदिर अपनी अनूठी सैन्य शैली की प्रतिमा के कारण पूरे देश में चर्चा का विषय बना रहता है। आषाढ़ मास के दौरान पड़ने वाले हर मंगलवार को यहां श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। कैंट छावनी इलाके में स्थित यह मंदिर आम हनुमान मंदिरों से बिल्कुल अलग है, क्योंकि यहां हनुमान जी वानर स्वरूप में नहीं, बल्कि एक फौजी की तरह नजर आते हैं। भगवान की प्रतिमा पर रौबदार मूंछें, बड़ी आंखें और सलामी देती हुई हाथ की मुद्रा इसे एक सैनिक का रूप देती है, जिसकी वजह से लोग इन्हें 'सैनिक हनुमान' के नाम से पुकारते हैं।
सैनिक हनुमान की अनोखी महिमा
इस मंदिर में केवल स्थानीय निवासी ही नहीं, बल्कि कैंट क्षेत्र के सेना के जवान और पुलिसकर्मी भी बड़ी श्रद्धा के साथ माथा टेकने आते हैं। आषाढ़ के मंगलवार को तो यहां का दृश्य किसी बड़े मेले से कम नहीं होता। इस दिन विशेष पूजा, हनुमान चालीसा का पाठ, सुंदरकांड का आयोजन और भव्य महाआरती की जाती है। मंदिर की ख्याति केवल शहर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि आसपास के क्षेत्रों से भी भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर यहां पहुंचते हैं।
धार्मिक दृष्टि से यह मंदिर वाराणसी के पंचदशनाम जूना अखाड़ा से जुड़ा हुआ है। मंदिर के विशाल परिसर में हनुमान जी के अलावा भगवान राम, सीता, लक्ष्मण, राधा-कृष्ण, शिव जी और शनिदेव के मंदिर भी स्थापित हैं। यह स्थान सागर की सांस्कृतिक धरोहर और सैन्य परंपरा के संगम का एक जीवंत उदाहरण है, जो आस्था और इतिहास को एक साथ संजोए हुए है।
भगवान ने खुद की थी परेड में हाजिरी
मंदिर के साथ जुड़ी एक प्रचलित कथा आज भी भक्तों के बीच काफी मशहूर है। कहा जाता है कि सेना का एक जवान हनुमान जी का बहुत बड़ा भक्त था। अपने कठिन सैन्य जीवन के बीच भी वह हनुमान जी की सेवा और दर्शन में कोई कमी नहीं आने देता था। वह रोजाना परेड से पहले मंदिर की साफ-सफाई करता था। एक बार वह भक्ति में इतना खो गया कि अपनी परेड का समय भूल गया। किंवदंती है कि उस वक्त खुद हनुमान जी ने उस सैनिक का रूप लिया और परेड में शामिल होकर उसकी जगह हाजिरी लगाई। इस घटना के बाद से ही भक्त उन्हें सैनिक स्वरूप में पूजने लगे और यह माना जाने लगा कि हनुमान जी अपने भक्तों की रक्षा के लिए किसी भी रूप में आ सकते हैं।
कैसे पड़ा परेड मंदिर नाम?
महंत राघवेंद्र गिरी के अनुसार, 'परेड मंदिर' नाम के पीछे का इतिहास अंग्रेजी शासनकाल से जुड़ा है। उस समय सागर एक बेहद महत्वपूर्ण सैन्य छावनी हुआ करता था। वर्तमान भव्य ढांचे के बनने से पहले यहां एक छोटा सा मंदिर हुआ करता था, जिसके इर्द-गिर्द सेना की परेड आयोजित की जाती थी। धीरे-धीरे लोगों के बीच यह स्थान 'परेड मंदिर' के नाम से ही प्रसिद्ध हो गया। आज भी यह मंदिर अपनी उस विशिष्ट प्रतिमा के कारण भक्तों को आकर्षित करता है, जो उन्हें भक्ति के साथ-साथ साहस का संदेश देती है।











