आज देशभर में शिव भक्त रवि प्रदोष व्रत रख रहे हैं. सनातन परंपरा में हर महीने की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखने का विधान है, लेकिन जब यह तिथि रविवार के दिन पड़ती है तो इसे रवि प्रदोष व्रत कहा जाता है. भगवान शिव की आराधना का यह दिन इसलिए भी खास माना जाता है क्योंकि इसमें सूर्य देव और शिवजी दोनों की कृपा एक साथ मिलने की मान्यता है. धार्मिक मान्यता है कि विधि-विधान से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने पर जीवन के कष्ट दूर होते हैं, घर में सुख-समृद्धि बढ़ती है और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं. इस साल का रवि प्रदोष व्रत वृद्धि योग सहित कई शुभ संयोगों में पड़ रहा है, जिसकी वजह से इसका फल और भी बढ़ा हुआ माना जा रहा है.
प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व
शास्त्रों में प्रदोष व्रत को पूरी तरह भगवान शिव को समर्पित बताया गया है. मान्यता है कि प्रदोष काल में यानी सूर्यास्त के आसपास भगवान शिव कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में तांडव नृत्य करते हैं, और इसी समय उनकी पूजा-आराधना करने वाले भक्तों पर उनकी विशेष कृपा बरसती है. चूंकि रविवार का दिन सूर्य देव को समर्पित माना जाता है, इसलिए रविवार को पड़ने वाला यह प्रदोष व्रत सूर्य देव और भगवान शिव, दोनों की कृपा दिलाने वाला माना गया है. मान्यता है कि इस व्रत को करने से रोग, शत्रु बाधा, मानसिक तनाव और आर्थिक तंगी जैसी परेशानियां कम होती हैं और घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है. साथ ही कुंडली में सूर्य ग्रह की स्थिति भी मजबूत होती है.
त्रयोदशी तिथि की शुरुआत और समापन
पंचांग के अनुसार त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 12 जुलाई सुबह 2 बजकर 4 मिनट से हो रही है और यह तिथि उसी दिन यानी 12 जुलाई शाम 10 बजकर 29 मिनट तक रहेगी. हिंदू पंचांग में उदया तिथि को ही व्रत-त्योहार के लिए मान्य माना जाता है, इसलिए रवि प्रदोष व्रत भी 12 जुलाई, रविवार के दिन ही रखा जाएगा.
आज बन रहे शुभ योग
इस बार रवि प्रदोष व्रत के दिन एक साथ कई शुभ योग बन रहे हैं, जिससे इसका महत्व और बढ़ गया है. आज वृद्धि योग के साथ-साथ ध्रुव योग भी बन रहा है. इसके अलावा शुभ ग्रह गुरु अपनी उच्च राशि यानी कर्क राशि में विराजमान हैं, जिसकी वजह से हंस राजयोग का निर्माण भी हो रहा है. मान्यता है कि इन शुभ योग में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा और ध्यान करने से भक्तों को सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है और कुंडली के तमाम दोष भी दूर होते हैं. ग्रहों की चाल की बात करें तो आज सूर्य मिथुन राशि में रहेंगे, जबकि चंद्रमा वृषभ राशि में संचार करेंगे.
पूजा के शुभ मुहूर्त
रवि प्रदोष व्रत के दिन पूजा-पाठ और शुभ कार्यों के लिए दिनभर में कई शुभ मुहूर्त बन रहे हैं. पंचांग के अनुसार आज के प्रमुख मुहूर्त इस प्रकार हैं
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:10 बजे से 04:51 बजे तक
- अभिजीत मुहूर्त: दिन में 11:59 बजे से दोपहर 12:54 बजे तक
- लाभ-उन्नति मुहूर्त: सुबह 08:59 बजे से 10:43 बजे तक
- अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त: सुबह 10:43 बजे से दोपहर 12:27 बजे तक
- शुभ-उत्तम मुहूर्त: शाम 07:22 बजे से 08:38 बजे तक
- अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त: रात 08:38 बजे से 09:54 बजे तक
इस तरह करें रवि प्रदोष व्रत की पूजा
रवि प्रदोष व्रत के दिन सुबह स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और विधिपूर्वक व्रत का संकल्प लें. इसके बाद प्रदोष काल में भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और नंदी महाराज की पूजा की जाती है. सबसे पहले शिवलिंग का अभिषेक शुद्ध जल, गंगाजल, दूध, दही, शहद, घी और शक्कर से किया जाता है. इसके बाद शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, आक, भांग, सफेद चंदन, अक्षत और पुष्प अर्पित किए जाते हैं. धूप और दीप जलाकर शिव चालीसा का पाठ करें और साथ ही शिव पंचाक्षर मंत्र "ॐ नमः शिवाय" तथा महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें. पूजा के अंत में भगवान शिव की आरती करके अपनी मनोकामना उनके सामने रखनी चाहिए.
प्रदोष काल क्यों माना जाता है सबसे शुभ समय
प्रदोष काल उस अवधि को कहा जाता है जो सूर्यास्त से करीब 45 मिनट पहले शुरू होकर सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक रहती है. आमतौर पर यह समय शाम करीब 06:30 बजे से रात 08:30 बजे के बीच पड़ता है, हालांकि यह अलग-अलग शहरों में सूर्यास्त के समय के हिसाब से थोड़ा आगे-पीछे हो सकता है. मान्यता है कि इसी अवधि में भगवान शिव की पूजा सबसे अधिक फलदायी होती है, इसलिए श्रद्धालुओं को सलाह दी जाती है कि वे अपने शहर के पंचांग में दिए गए सूर्यास्त के समय के अनुसार ही प्रदोष काल में पूजा करें.
व्रत रखने से मिलने वाले लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रवि प्रदोष व्रत रखने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जिससे घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है. करियर और व्यवसाय में आ रही बाधाएं दूर होने की भी मान्यता है, वहीं मानसिक तनाव कम होकर आत्मविश्वास में वृद्धि होती है. अविवाहित लोगों के लिए मान्यता है कि इस व्रत से उन्हें योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है, जबकि विवाहित जोड़ों के दांपत्य जीवन में मधुरता आती है. इसके अलावा जो श्रद्धालु संतान सुख, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना रखते हैं, वे भी परंपरागत रूप से यह व्रत रखते हैं.
जाप के लिए शिव मंत्र
रवि प्रदोष व्रत की पूजा में रुद्राक्ष की माला से मंत्र जाप का विशेष महत्व बताया गया है. महामृत्युंजय मंत्र का जाप 108 बार करने की परंपरा है.
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्.
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
इसके अलावा शिव गायत्री मंत्र "ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि" का जाप कम से कम 11, 21 या 108 बार करने का विधान है. वहीं शिव पंचाक्षर मंत्र "ॐ नमः शिवाय" का जाप भी रुद्राक्ष माला से 108 बार करना शुभ माना जाता है.
शिव आरती, ॐ जय शिव ओंकारा
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे
त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी.
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा.











