अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में जब भी बहु खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है, तब दुनिया भर के दर्शकों का उत्साह चरम पर पहुंच जाता है। घरों से लेकर दफ्तरों की टीवी और कंप्यूटर स्क्रीन तक, हर जगह खेल प्रेमियों की निगाहें इन आयोजनों पर टिकी रहती हैं। वर्तमान समय में चल रहे राष्ट्रमंडल खेलों ने भी खेल प्रेमियों का ध्यान अपनी ओर मजबूती से खींचा है। एथलेटिक्स, तैराकी, जिम्नास्टिक, कुश्ती, भाला फेंक, साइक्लिंग और जूडो जैसे विविध खेलों की प्रतिस्पर्धाएं दर्शकों को बांधे रखती हैं। खेल जगत की जब भी बात आती है, तो आमतौर पर ओलंपिक और एशियाई खेलों की चर्चा सबसे ज्यादा होती है। लेकिन इनके साथ ही राष्ट्रमंडल खेल भी एक ऐसा प्रतिष्ठित वैश्विक मंच है जहाँ दुनिया के कई देशों के खिलाड़ी अपना कौशल दिखाते हैं। भारतीय खिलाड़ी भी इस टूर्नामेंट में पूरी ताकत के साथ भाग लेते हैं और देश के लिए ढेर सारे पदक जीतते हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि राष्ट्रमंडल खेल आखिर क्या हैं, इनका नाम यह क्यों पड़ा और यह आयोजन ओलंपिक या एशियाड से किन मायनों में अलग है।
राष्ट्रमंडल खेलों का ऐतिहासिक सफर और औपनिवेशिक अतीत
राष्ट्रमंडल खेल, जिन्हें कॉमनवेल्थ गेम्स भी कहा जाता है, एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बहु खेल प्रतियोगिता है। इस आयोजन की सबसे बड़ी खासियत इसकी सदस्यता से जुड़ी है। मूल रूप से इसमें केवल वे ही देश हिस्सा लेते हैं जो अतीत में ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन या उसके औपनिवेशिक शासन का हिस्सा रहे थे। समय बदलने के साथ जब ये देश ब्रिटेन के शासन से स्वतंत्र हुए, तो उन्होंने आपसी शांति, सौहार्द और व्यापारिक व सांस्कृतिक सहयोग को बनाए रखने के उद्देश्य से एक अंतरराष्ट्रीय संगठन का गठन किया। इस संगठन को राष्ट्रमंडल यानी कॉमनवेल्थ ऑफ नेशंस नाम दिया गया।
इन सभी राष्ट्रों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ब्रिटिश राज से जुड़ी हुई थी। इसी साझा इतिहास को ध्यान में रखते हुए जब इन देशों के बीच पहली बार खेल प्रतियोगिता शुरू की गई, तो इसका नाम ब्रिटिश एम्पायर गेम्स रखा गया था। कालान्तर में बदलते राजनीतिक परिदृश्य और स्वतंत्रता के दौर के बाद इस प्रतियोगिता का नाम बदलकर राष्ट्रमंडल खेल कर दिया गया। वर्तमान समय में इस प्रतियोगिता में कुल 74 देश और क्षेत्र शामिल होते हैं। एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इस संगठन और खेल आयोजन में कुछ ऐसे देश भी हिस्सा लेते हैं जो प्रत्यक्ष रूप से कभी ब्रिटिश साम्राज्य के गुलाम नहीं रहे, फिर भी वे इस अंतरराष्ट्रीय परिवार का हिस्सा बने हुए हैं। आकार और महत्व के दृष्टिकोण से राष्ट्रमंडल खेलों को ओलंपिक के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बहु खेल आयोजन माना जाता है। ओलंपिक की तर्ज पर ही राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन भी प्रत्येक चार वर्ष के अंतराल पर किया जाता है।
तीन बड़े खेल महाकुंभ: ओलंपिक, राष्ट्रमंडल और एशियाड का तुलनात्मक विश्लेषण
यद्यपि ओलंपिक, राष्ट्रमंडल खेल और एशियाई खेल, तीनों को ही अंतरराष्ट्रीय खेल जगत का महाकुंभ माना जाता है, लेकिन इनकी संरचना, प्रतिभागी देशों की संख्या और प्रतिस्पर्धा के स्तर में बहुत बड़ा अंतर होता है।
पहला और सबसे बड़ा आयोजन ओलंपिक खेल है। यह दुनिया की सबसे विशाल और प्रतिष्ठित खेल प्रतियोगिता है। आधुनिक ओलंपिक खेलों की आधिकारिक शुरुआत वर्ष 1896 में हुई थी, लेकिन इसका इतिहास लगभग 3 हजार वर्ष पुराना है जिसकी जड़ें प्राचीन ग्रीक सभ्यता से जुड़ी हुई हैं। ओलंपिक खेलों में दुनिया भर के लगभग सभी स्वतंत्र देश भाग लेते हैं, जिनकी संख्या 200 से भी अधिक है। इसमें विश्व के सर्वश्रेष्ठ एथलीट अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं और इसे खेल जगत की सर्वोच्च उपलब्धि माना जाता है।
दूसरा आयोजन राष्ट्रमंडल खेल है। ओलंपिक के विपरीत, इसमें दुनिया का हर देश हिस्सा नहीं ले सकता। इसमें केवल वही देश प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं जो राष्ट्रमंडल संगठन के सदस्य हैं। उदाहरण के तौर पर भारत, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, पाकिस्तान और कनाडा जैसे देश इसमें शामिल हैं। वर्तमान में इसमें भाग लेने वाले देशों और क्षेत्रों की संख्या 74 तक है। ओलंपिक की तुलना में राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा लेने वाले एथलीटों की संख्या और शामिल किए गए खेलों के प्रकार अपेक्षाकृत कम होते हैं।
तीसरा आयोजन एशियाई खेल या एशियाड है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह प्रतियोगिता केवल एशिया महाद्वीप के देशों तक सीमित है। इसका संचालन ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया द्वारा किया जाता है और इसमें मान्यता प्राप्त 45 एशियाई देश हिस्सा लेते हैं। इस आयोजन में भारत और उसके पड़ोसी देशों के अलावा मध्य पूर्व के इराक, ईरान और सीरिया से लेकर दक्षिण पूर्व और पूर्व एशिया के सिंगापुर, मलेशिया, कोरिया, चीन और जापान जैसे देश आपस में मुकाबला करते हैं।
राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का शानदार प्रदर्शन और 500 से अधिक पदकों का रिकॉर्ड
भारत के खेल इतिहास में राष्ट्रमंडल खेल हमेशा से सबसे सफल और यादगार प्रतियोगिताओं में से एक रहे हैं। चूंकि राष्ट्रमंडल खेलों में वैश्विक स्तर की वह कठिन प्रतिस्पर्धा नहीं होती जो ओलंपिक खेलों में देखने को मिलती है, इसलिए भारतीय एथलीट यहाँ लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन करते रहे हैं। भारतीय खिलाड़ियों ने राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में अब तक कुल मिलाकर 500 से भी अधिक पदक जीते हैं, जिनमें स्वर्ण, रजत और कांस्य पदक शामिल हैं।
भारतीय एथलीटों का दबदबा विशेष रूप से निशानेबाजी, बैडमिंटन, भारोत्तोलन, मुक्केबाजी और कुश्ती में देखने को मिलता है। इन खेलों में भारतीय दल हर बार पदकों की झड़ी लगाता है और तालिका में शीर्ष स्थानों में अपनी जगह पक्की करता है। इन प्रतियोगिताओं में मिली सफलता ने देश में खेल संस्कृति को बढ़ावा देने और युवा प्रतिभाओं को आगे लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
एशियाड की 100 से अधिक पदकों की ऐतिहासिक उपलब्धि और ओलंपिक में भारत का संघर्ष
एशियाई खेलों में भी बीते कुछ वर्षों के दौरान भारत के प्रदर्शन में अभूतपूर्व सुधार देखने को मिला है। हालिया एशियाई खेलों में भारत ने अपने खेल इतिहास का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए 100 से अधिक पदक जीतने का ऐतिहासिक रिकॉर्ड कायम किया है। एथलेटिक्स और निशानेबाजी जैसे खेलों में भारतीय खिलाड़ियों का शानदार प्रदर्शन रहा है। इसके अतिरिक्त भाला फेंक में नीरज चोपड़ा जैसे स्टार खिलाड़ियों की वैश्विक सफलताओं के दम पर भारत अब एशिया की एक प्रमुख खेल शक्ति के रूप में स्थापित हो चुका है।
दूसरी ओर, ओलंपिक खेलों में भारत की यात्रा ऐतिहासिक रूप से चुनौतीपूर्ण और संघर्षपूर्ण रही है। हॉकी के स्वर्णिम युग को छोड़ दिया जाए, तो व्यक्तिगत स्पर्धाओं में भारतीय खिलाड़ियों को ओलंपिक पदक हासिल करने के लिए कड़ा परिश्रम और पसीना बहाना पड़ता है। हालांकि, हाल के कुछ ओलंपिक आयोजनों में भारतीय एथलीटों ने इस धारणा को बदला है। नीरज चोपड़ा, पी.वी. सिंधु, मीराबाई चानू और मनु भाकर जैसे दिग्गज खिलाड़ियों ने स्वर्ण और अन्य पदक जीतकर ओलंपिक मंच पर देश का परचम लहराया है। इसके बावजूद, कुल पदकों की संख्या के मामले में ओलंपिक में भारत का रिकॉर्ड राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों की तुलना में अभी भी काफी पीछे है।



















