पश्चिम एशिया के अशांत क्षेत्र में तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है, जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की ओर से पेश किए गए सात दिवसीय युद्धविराम प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। प्रशासनिक अधिकारियों के हवाले से यह बात सामने आई है कि डोनाल्ड ट्रंप ने अपने करीबी सहयोगियों के साथ चर्चा में इस बात के संकेत दिए हैं कि नवंबर महीने में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनाव संपन्न होने के बाद वह ईरान के खिलाफ नए सिरे से बमबारी अभियान शुरू कर सकते हैं। इस घटनाक्रम ने पूरे मध्य पूर्व में पहले से जारी अस्थिरता को और अधिक गंभीर बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के वैश्विक मंच पर तेहरान को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाने के ठीक बाद राष्ट्रपति ट्रंप का यह कड़ा फैसला सामने आया है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से ट्रंप का कड़ा संदेश
न्यूयॉर्क में 22 सितंबर को आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र को संबोधित करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के भविष्य को लेकर अपने प्रशासन के सामने मौजूद दो स्पष्ट रास्तों का उल्लेख किया था। उन्होंने वैश्विक नेताओं के सामने स्पष्ट किया कि उन्हें ईरान को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय लेना है। उन्होंने कहा कि उनके सामने एक विकल्प ईरान के साथ ऐसा कड़ा और प्रभावी समझौता करने का है जिससे वह देश अपने बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण कर सके और मध्य पूर्व तथा वैश्विक स्तर पर एक मजबूत राष्ट्र के रूप में उभर सके।
इसके विपरीत डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरे कठोर विकल्प का भी सार्वजनिक तौर पर जिक्र किया, जिसमें उन्होंने जरूरत पड़ने पर ईरान के वर्तमान शासन को तेजी से पूरी तरह समाप्त करने की बात कही थी, ताकि वह अन्य मुल्कों के लिए किसी भी तरह का खतरा पैदा न कर सके। हालांकि उस संबोधन के दौरान उन्होंने यह विश्वास भी जताया था कि अमेरिकी चुनाव के तुरंत बाद दोनों पक्षों के बीच एक समझौता संभव हो सकता है, क्योंकि उनके अनुसार बातचीत की मेज पर आने के अलावा कोई दूसरा व्यावहारिक रास्ता नहीं बचता है।
ईरान का सात दिनों का शांति प्रस्ताव और कूटनीतिक प्रयास
इस कड़े रुख के जवाब में ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठकों के दौरान मीडिया के समक्ष एक विस्तृत प्रस्ताव पेश किया था। अरागची ने बताया कि तेहरान ने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों के माध्यम से वाशिंगटन के समक्ष एक सात दिन की विस्तृत योजना रखी है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में जारी भीषण सैन्य टकराव को समाप्त करना और कूटनीतिक संवाद को फिर से सक्रिय करना था।
सैयद अब्बास अरागची ने अपनी बात रखते हुए स्पष्ट किया, "हमने मध्यस्थों के जरिए अमेरिका के सामने एक योजना रखी है।" उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यदि पूर्व निर्धारित शर्तें पूरी होती हैं, तो सातवें दिन सामरिक रूप से बेहद अहम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह खोल दिया जाएगा और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नए सिरे से व्यापक चर्चा शुरू की जा सकेगी। ईरानी विदेश मंत्री ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले ही किसी ठोस कूटनीतिक नतीजे पर पहुंचना दोनों देशों और वैश्विक स्थिरता के लिए कहीं अधिक फायदेमंद साबित होगा।
जर्मनी के साथ बैठक में तेहरान की शर्तें
कूटनीतिक पहुंच को आगे बढ़ाते हुए सैयद अब्बास अरागची ने जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वेडफुल के साथ भी एक महत्वपूर्ण बैठक की। इस चर्चा के दौरान ईरानी विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि शांति प्रक्रिया को बहाल करने के लिए ईरान ने अपनी उचित और वैध शर्तें अमेरिका के समक्ष प्रस्तुत कर दी हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि मध्य पूर्व में वास्तविक सुरक्षा केवल तभी लौट सकती है जब ईरान के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप और सैन्य आक्रामकता को पूरी तरह से रोका जाए।
ईरान के विदेश मंत्री ने इस बात की पुष्टि की कि उनका देश अपने शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम के संदर्भ में कूटनीति के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए पूरी निष्ठा के साथ तैयार है। उन्होंने वैश्विक समुदाय से आह्वान किया कि वार्ता की मेज पर ईरान की सद्भावना और सकारात्मक दृष्टिकोण की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।
ईरानी राष्ट्रपति का अमेरिका पर समझौता तोड़ने का गंभीर आरोप
दूसरी तरफ ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने अमेरिकी मीडिया संस्थान फॉक्स न्यूज के साथ एक विशेष साक्षात्कार में मौजूदा संकट के लिए पूरी तरह से वाशिंगटन और डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया। मसूद पेजेश्कियन ने कहा कि इसी साल जून महीने में दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण सहमति का ढांचा तैयार हुआ था, जिस पर औपचारिक हस्ताक्षर भी किए जा चुके थे।
मसूद पेजेश्कियन ने साक्षात्कार में कहा, "समस्या यह है कि अमेरिका बातचीत करने के बजाय बमबारी करके मैदान में उतर आया और हर रास्ता बंद कर दिया।" ईरानी राष्ट्रपति ने विस्तृत विवरण देते हुए कहा कि उनका देश जून के समझौते के आधार पर आगे बढ़ने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध था, लेकिन अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ लगातार की गई सैन्य कार्रवाइयों ने पूरी शांति प्रक्रिया को पटरी से उतार दिया। उन्होंने इस बात को दृढ़ता से नकारा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में पैदा हुई असुरक्षा के लिए ईरान दोषी है, और आरोप लगाया कि उनके सर्वोच्च नेता को निशाना बनाए जाने के बाद ही हालात इस खतरनाक मोड़ पर पहुंचे हैं।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और जून के समझौते का संकट
जून में बनी सहमति के बाद से ही दोनों पक्षों के बीच अविश्वास की खाई लगातार चौड़ी होती गई है। ईरान का दावा है कि उसने समझौते के नियमों का पालन करने की पूरी कोशिश की, लेकिन अमेरिकी हमलों ने संवाद की संभावनाओं को समाप्त कर दिया। इसके विपरीत वाशिंगटन और इजरायल की ओर से तेहरान पर लगातार उकसावे वाली गतिविधियों के आरोप लगाए जाते रहे हैं।
वर्तमान में पेश किए गए सात दिवसीय प्रस्ताव में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से सामान्य यातायात के लिए खोलना सबसे महत्वपूर्ण बिंदु बना हुआ है। यह संकरा समुद्री मार्ग पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ माना जाता है, जहां से वैश्विक तेल का एक बड़ा हिस्सा रोजाना गुजरता है। यदि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने रुख पर अड़े रहते हैं और चुनाव के बाद सैन्य कार्रवाई का रास्ता चुनते हैं, तो इस समुद्री मार्ग के पूरी तरह बाधित होने का खतरा बढ़ जाएगा, जिसका सीधा और विनाशकारी असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।



















