सनातन धर्म और ज्योतिष शास्त्र में शिशु के जन्म समय और उसकी जन्म कुंडली के नक्षत्रों का अत्यंत गहन विश्लेषण किया जाता है। नवजात शिशु के जन्म के साथ ही परिजनों के मन में उसके भविष्य और ग्रह-नक्षत्रों के प्रभावों को लेकर कई जिज्ञासाएं और चिंताएं उभरती हैं। इनमें से सबसे अधिक भ्रम और भय गंडमूल अथवा सतैसा नक्षत्र को लेकर देखा जाता है। समाज में प्रचलित कई मान्यताओं के कारण माता-पिता यह मान बैठते हैं कि इस नक्षत्र में जन्मे बालक के कारण परिवार पर संकट आ सकता है। हालांकि, ज्योतिषीय सिद्धांतों और विद्वानों के अनुसार यह भय पूर्णतः निराधार है। सही समय पर शास्त्रों में बताए गए नियमों और उपायों का पालन करके इस नक्षत्र के दुष्प्रभावों को समाप्त किया जा सकता है।
गंडमूल के छह प्रमुख नक्षत्र और उनके ज्योतिषीय प्रभाव
पूर्णिया के सुप्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित दयानाथ मिश्र के अनुसार, ज्योतिष शास्त्र में कुल 27 नक्षत्रों में से छह विशेष नक्षत्रों को सतैसा या गंडमूल श्रेणी में रखा गया है। जब शिशु का जन्म इन विशिष्ट नक्षत्रों में होता है, तो उसे गंडमूल दोष कहा जाता है। इन छह नक्षत्रों की सूची इस प्रकार है
- अश्विनी: केतु ग्रह के स्वामित्व वाला प्रथम नक्षत्र।
- आश्लेषा: बुध ग्रह द्वारा संचालित नक्षत्र।
- मघा: पितृ देव और केतु से प्रभावित नक्षत्र।
- ज्येष्ठा: इंद्र देव और बुध के अधीन नक्षत्र।
- मूल: निरृति देव और केतु ग्रह का नक्षत्र।
- रेवती: पूषा देव और बुध ग्रह द्वारा संचालित अंतिम नक्षत्र।
पंडित दयानाथ मिश्र स्पष्ट करते हैं कि गंडमूल नक्षत्र में जन्म लेने मात्र से किसी बच्चे को अशुभ नहीं माना जाना चाहिए। लोक-धारणाओं के विपरीत, यदि समय पर इस नक्षत्र का निवारण न किया जाए तो शिशु को केवल हल्की व्यावहारिक या शारीरिक परेशानियां हो सकती हैं। जैसे ही विधिवत पूजन संपन्न होता है, यह नक्षत्र अत्यंत बलशाली हो जाता है और बालक को अपार ख्याति प्रदान करता है।
सतैसा नक्षत्र में जन्मे विश्व प्रसिद्ध दिग्गज और महापुरुष
ज्योतिषीय गणनाओं और ऐतिहासिक तथ्यों का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि सतैसा नक्षत्र में जन्मे बच्चे अत्यंत प्रखर बुद्धि, अद्भुत नेतृत्व क्षमता और प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी होते हैं। इतिहास और आधुनिक युग की कई ऐसी महान हस्तियां हैं जिन्होंने गंडमूल नक्षत्र में जन्म लेकर विश्व पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है
- गोस्वामी तुलसीदास: कालजयी ग्रंथ रामचरितमानस के रचयिता।
- पंडित जवाहरलाल नेहरू: स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री।
- इंदिरा गांधी: भारत की पूर्व प्रधानमंत्री और सशक्त नेत्री।
- अमिताभ बच्चन: भारतीय सिनेमा के सदी के महानायक।
- सचिन तेंदुलकर: क्रिकेट जगत के भगवान कहे जाने वाले महान बल्लेबाज।
- ऐश्वर्या राय: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त महान हस्ती।
इन महापुरुषों का जीवन इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि गंडमूल नक्षत्र में जन्मा व्यक्ति अपने क्षेत्र में सर्वोच्च शिखर तक पहुंच सकता है।
27वें दिन शांति पूजा का विधान और सही समय
गंडमूल नक्षत्र के नकारात्मक प्रभावों को समाप्त करने के लिए शास्त्रों में शांति पूजा और मंत्र जाप का विशेष विधान बताया गया है। पंडित दयानाथ मिश्र के अनुसार, इस पूजा को कराने का सबसे उत्तम और प्रथम अवसर बालक के जन्म के ठीक 27वें दिन आता है। 27वें दिन वही नक्षत्र पुनः लौटकर आता है, जिस नक्षत्र में बालक का जन्म हुआ था। इस दिन विधिवत जल, मृत्तिका और औषधियों से स्नान कराकर नक्षत्र शांति पूजन कराना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
यदि किसी कारणवश अभिभावक जन्म के 27वें दिन यह पूजा संपन्न कराने में असमर्थ रहते हैं, तो उन्हें निराश होने की आवश्यकता नहीं है। दूसरा विकल्प यह है कि माता-पिता अपनी सुविधा और सामर्थ्य के अनुसार जितनी जल्दी संभव हो सके, किसी योग्य पंडित से परामर्श करके शांति पूजा करवा लें। समय रहते इस दोष का निवारण करा लेने से नक्षत्र का नकारात्मक असर समाप्त हो जाता है और बालक को इस नक्षत्र की अपार सकारात्मक ऊर्जा एवं सफलता का पूरा लाभ मिलने लगता है।



















