सामुद्रिक शास्त्र में हथेली की रेखाओं के साथ-साथ हथेलियों पर बने विभिन्न पर्वतों का भी विशेष स्थान माना गया है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार हथेली में स्थित मंगल पर्वत किसी भी मनुष्य के भीतर छिपे साहस, बल, शक्ति और बुद्धि जैसे महत्वपूर्ण गुणों की जानकारी देता है। हथेली के भीतर मंगल पर्वत की कुल दो जगहें होती हैं और दोनों ही स्थानों का अपना अलग ज्योतिषीय महत्व है। इन पर्वतों की बनावट, स्थिति और उनके उभरे होने या दबे होने से व्यक्ति के धैर्य, संयम और बौद्धिक क्षमता का आकलन किया जाता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि हथेली में ये पर्वत कहां पाए जाते हैं और इनके अलग-अलग हिस्सों से इंसान के स्वभाव व जीवन के किन पहलुओं का पता चलता है।
हथेली में कहां स्थित होते हैं मंगल पर्वत के दो स्थान?
समुद्र शास्त्र के नियमों के मुताबिक हथेली के भीतर मंगल पर्वत के दो मुख्य क्षेत्र निर्धारित किए गए हैं। इनमें से पहला स्थान हथेली में जीवन रेखा के ठीक पास होता है, जबकि दूसरा स्थान इसके बिल्कुल विपरीत यानी हृदय रेखा और मस्तिष्क रेखा के मध्य में स्थित होता है। मान्यताओं के अनुसार यह पर्वत इन दोनों में से किसी एक खास स्थान पर उभरा हुआ हो सकता है या फिर दोनों ही जगहों पर इसकी स्थिति मजबूत नजर आ सकती है। इस पर्वत की बनावट और उभार के आधार पर ही इंसान के व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं का अध्ययन किया जाता है।
पहला मंगल पर्वत बताता है इंसान की शारीरिक स्थिति और पराक्रम
हथेली में मंगल पर्वत का जो पहला क्षेत्र होता है, उसका सीधा संबंध मनुष्य की शारीरिक अवस्था से जोड़ा जाता है। इसी स्थान की स्थिति को देखकर व्यक्ति के भीतर मौजूद साहस, शारीरिक बल और ऊर्जा का आकलन किया जाता है। यदि हथेली का यह हिस्सा बेहद सुंदर, स्पष्ट और उन्नत नजर आए, तो इसे इंसान के अत्यंत साहसी और पराक्रमी होने का मजबूत संकेत माना गया है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार इस प्रकार का विकसित मंगल पर्वत इस बात की ओर इशारा कर सकता है कि वह व्यक्ति या तो सेना में ऊंचे पद पर है अथवा किसी अन्य प्रतिष्ठित विभाग में उच्च पद की जिम्मेदारी संभाल रहा है। इसके साथ ही इस खास स्थिति को एक कुशल और प्रभावशाली अधिकारी बनने के शुभ लक्षणों के रूप में भी देखा जाता है।
दूसरा मंगल पर्वत देता है मानसिक गुणों और संयम के संकेत
हथेली के भीतर मंगल पर्वत का दूसरा स्थान हृदय रेखा और मस्तिष्क रेखा के ठीक बीच में पाया जाता है। सामुद्रिक शास्त्र की शाखाओं में इस क्षेत्र का सीधा संबंध व्यक्ति की मानसिक स्थिति और बौद्धिक क्षमताओं से माना गया है। इस स्थान की बनावट को देखकर व्यक्ति के मन की स्थिति और उसके सोचने-समझने के तरीके का अंदाजा लगाया जाता है। यदि यह दूसरा मंगल पर्वत भी अच्छी तरह से उन्नत या उभरा हुआ हो, तो इसे इंसान के स्वभाव में धैर्य, शौर्य, संयम और क्षमा जैसे उच्च मानवीय गुणों की मौजूदगी का प्रतीक माना जाता है।






















