तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए मक्का डिफेंस पैक्ट का मसौदा सामने आने के बाद रणनीतिक हलकों में चर्चा छिड़ गई है। पाकिस्तान के रणनीतिकार इसे भारत के खिलाफ एक बड़ी सुरक्षा ढाल के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं और इसके प्रावधानों को लेकर तमाम दावे किए जा रहे हैं। पैक्ट के आर्टिकल-2 में इस बात का जिक्र किया गया है कि किसी भी एक देश पर होने वाला बाहरी हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। हालांकि, जब इस समझौते के दस्तावेजों की गहराई से समीक्षा की जाती है, तो यह साफ हो जाता है कि यह केवल एक कूटनीतिक छलावा भर है और जमीनी स्तर पर इसकी कोई खास अहमियत नहीं है।
मक्का पैक्ट के आर्टिकल-2 की हकीकत और कानूनी पेंच
तुर्किये की संसद में पेश किए गए मक्का डिफेंस पैक्ट के दस्तावेजों ने कई तरह के भ्रम पैदा किए हैं, जिसमें सबसे ज्यादा चर्चा का विषय इसका आर्टिकल-2 बना हुआ है। इस अनुच्छेद को पश्चिमी सैन्य संगठन नाटो के आर्टिकल 5 की तर्ज पर तैयार किया गया है, जिसके तहत सामूहिक सुरक्षा का आश्वासन दिया जाता है। दस्तावेज के शब्दों के अनुसार, यदि किसी एक सदस्य देश पर आक्रमण होता है, तो उसे सभी पर हमला माना जाएगा। पहली नजर में यह प्रावधान भारत जैसे पड़ोसी देश के लिए एक बड़ा सैन्य दबाव लग सकता है, लेकिन इसकी बारीकियों में जाने पर असलियत बिल्कुल उलट नजर आती है।
सहायता को लेकर कोई कानूनी बाध्यता नहीं
आर्टिकल-2 की अगली पंक्तियों में ही बचने के लिए कई कानूनी रास्ते खुले छोड़े गए हैं। समझौते के प्रावधानों के मुताबिक, किसी भी संकट की स्थिति में मदद का स्वरूप और पैमाना जरूरत के वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन के आधार पर तय किया जाएगा। इसका सीधा और स्पष्ट मतलब यह है कि युद्ध या संकट के समय किसी भी देश पर अपनी सेना भेजने का कोई कानूनी दबाव नहीं होगा। कोई भी राष्ट्र संघर्ष की घड़ी में यह विकल्प चुन सकता है कि वह सैनिकों की बजाय केवल रसद, चिकित्सा सामग्री या अन्य गैर-सैन्य सहायता ही भेजेगा। इसके अलावा, इस पैक्ट में किसी भी प्रकार की संयुक्त सैन्य कमान या एकीकृत रक्षा बल के गठन का कोई प्रावधान नहीं किया गया है, जिससे यह सामूहिक सुरक्षा संधि महज कागजी साबित होती है।
क्या सऊदी अरब और तुर्किये भारत के खिलाफ भेजेंगे सेना?
रावलपिंडी का फौजी हेडक्वार्टर इस समझौते के सामने आने के बाद भले ही जश्न मना रहा हो, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि कोई भी समझदार देश किसी अन्य राष्ट्र की लड़ाई में अपनी सेना को सीधे तौर पर नहीं झोंकता है। तुर्किये हजारों किलोमीटर की दूरी तय करके भारत जैसी उभरती हुई सैन्य ताकत के साथ कभी भी सीधे टकराव में उलझना नहीं चाहेगा। तुर्किये की अपनी सीमाएं सीरिया और कुर्द संकट को लेकर बेहद संवेदनशील हैं और उसकी सेनाएं पहले से ही कई मोर्चों पर व्यस्त हैं। दूसरी तरफ, सऊदी अरब की थलसेना का रिकॉर्ड इतिहास में बहुत मजबूत नहीं रहा है और यमन के हूती विद्रोहियों से निपटने में भी सऊदी बलों को भारी संघर्ष करना पड़ा था। ऐसे में सऊदी अरब भारत की विशाल और आधुनिक सेना के सामने खड़े होने का जोखिम कभी नहीं उठाएगा।
कश्मीर और पीओके पर पाकिस्तान के मंसूबों को झटका
मक्का पैक्ट के आर्टिकल 1 में अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण बात दर्ज की गई है। इसमें साफ तौर पर कहा गया है कि केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमाओं की रक्षा की जाएगी। यह विशिष्ट प्रावधान पाकिस्तान के तथाकथित कश्मीर एजेंडे पर एक बड़ा कानूनी आघात है, क्योंकि जम्मू-कश्मीर में भारत और पाकिस्तान के बीच की सीमा कोई अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं बल्कि नियंत्रण रेखा यानी एलओसी है। यदि भारत अपनी सीमा पार से होने वाले आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी पीओके में कोई बड़ी सैन्य कार्रवाई करता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। ऐसी स्थिति में भारत अपनी संप्रभुता के दायरे में रहकर कार्रवाई करने का पूरा हक रखता है और मक्का पैक्ट का आर्टिकल-2 पाकिस्तान के बचाव में लागू नहीं हो पाएगा।
सऊदी अरब के भारत के साथ गहरे व्यावसायिक और रणनीतिक हित
सऊदी अरब और भारत के द्विपक्षीय संबंध आज जिस ऊंचे मुकाम पर पहुंच चुके हैं, वहां इस तरह का कोई भी बाहरी समझौता किसी भी प्रकार की दरार नहीं डाल सकता है। भारत वर्तमान में सऊदी अरब का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार बनकर उभरा है और दोनों देशों के बीच सालाना व्यापार 40 अरब डॉलर से अधिक का है। सऊदी की सरकारी तेल कंपनी अरामको के लिए भारत दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे स्थिर ऊर्जा बाजार है। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अपने देश की अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से पूरी तरह मुक्त करना चाहते हैं और उनके महत्वाकांक्षी विजन 2030 को सफल बनाने के लिए भारत की तकनीकी विशेषज्ञता और कुशल कार्यबल की अत्यंत आवश्यकता है। इसके अलावा, बहुचर्चित भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा भी भारत के साथ मजबूत सहयोग पर टिका हुआ है।























