केंद्र सरकार ने देश में हरित परिवहन को प्रोत्साहन देने की दिशा में एक बड़ा और महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। सरकार ने अब उन सभी कमर्शियल वाहनों को परमिट लेने की अनिवार्यता से सात साल की बड़ी राहत दे दी है, जो पारंपरिक ईंधन के बजाय बैटरी, एथेनॉल, मेथनॉल या हाइड्रोजन जैसे क्लीन फ्यूल यानी स्वच्छ विकल्पों पर चलते हैं। इस बदलाव का प्राथमिक उद्देश्य पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले उत्सर्जन को कम करना और परिवहन के क्षेत्र में नई तकनीक व ईंधन के इस्तेमाल को सुगम बनाना है।
परमिट नियमों में बदलाव का आधार
सामान्य तौर पर, मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 66(1) के अंतर्गत भारत में किसी भी प्रकार के मालवाहक ट्रक, यात्री बस या अन्य व्यावसायिक वाहनों को सार्वजनिक सड़कों पर चलने के लिए परमिट प्राप्त करना अनिवार्य होता है। यह एक जटिल और खर्चीली प्रक्रिया हो सकती है। लेकिन, सरकार ने अब स्वच्छ ईंधन को अपनाने वाले वाहनों को इस कानूनी प्रक्रिया से छूट प्रदान कर दी है। यह छूट स्पष्ट रूप से उन वाहनों पर लागू होती है जो पूरी तरह से बैटरी इलेक्ट्रिक, मेथनॉल, एथेनॉल और हाइड्रोजन जैसे अत्याधुनिक ईंधन का उपयोग करते हैं।
सुरक्षा और निगरानी के लिए अनिवार्य शर्त
इस छूट का लाभ उठाने के लिए वाहन मालिकों को एक अनिवार्य तकनीकी शर्त का पालन करना होगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि केवल वही वाहन इस परमिट मुक्ति का लाभ ले पाएंगे, जिनमें AIS-140 मानक के अनुरूप व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (VLTD) लगा होगा। यह जीपीएस आधारित ट्रैकिंग सिस्टम वाहन की सटीक और रियल टाइम लोकेशन, रफ्तार और यात्रा से जुड़ी अन्य महत्वपूर्ण जानकारी संबंधित एजेंसियों तक पहुंचाएगा। सरकार का मानना है कि इस तकनीक के माध्यम से सार्वजनिक सुरक्षा को मजबूत किया जा सकेगा और यातायात नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित होगा। जिन वाहनों में यह डिवाइस नहीं होगा, उन्हें परमिट नियमों से मिली इस विशेष छूट का पात्र नहीं माना जाएगा।
ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर पड़ेगा बड़ा असर
परमिट से सात वर्षों की यह छूट निश्चित रूप से ट्रांसपोर्ट संचालकों और वाहन मालिकों के लिए एक बड़ी राहत है। परमिट हासिल करने की फीस, लंबी कागजी कार्यवाही और प्रशासनिक उलझनों से मुक्ति मिलने के कारण परिचालन लागत में उल्लेखनीय गिरावट आएगी। इससे न केवल बड़े ट्रांसपोर्ट ऑपरेटरों को बल्कि छोटे व्यावसायिक वाहन मालिकों को भी क्लीन फ्यूल की ओर रुख करने की प्रेरणा मिलेगी। यह कदम भविष्य के परिवहन तंत्र को अधिक सस्टेनेबल बनाने और वर्ष 2070 तक नेट जीरो एमिशन के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने में भी एक आधारशिला सिद्ध होगा। साथ ही, इससे देश में इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन वाहनों की संख्या में तेजी से इजाफा होने की प्रबल संभावना है, जो अप्रत्यक्ष रूप से आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसे अभियानों को भी गति प्रदान करेगा।











