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पुरानी कारों के इंजन पर E20 पेट्रोल का असली असर, वर्कशॉप डेटा से खुली सच्चाईऑटो
2 घंटे पहले· 3

पुरानी कारों के इंजन पर E20 पेट्रोल का असली असर, वर्कशॉप डेटा से खुली सच्चाई

सोशल मीडिया पर E20 पेट्रोल से इंजन खराब होने और माइलेज में भारी गिरावट के दावे उड़ रहे हैं, लेकिन इंजीनियरिंग तथ्य कुछ और कहते हैं, हालांकि BS3 और कार्बोरेटेड गाड़ियों के लिए सच में कुछ सावधानियां जरूरी हैं.

अमित पटेलअमित पटेलबिज़नेस संवाददाता 6 मिनट पढ़ें AI के लिए
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देश में E20 यानी 20 प्रतिशत एथेनॉल मिला पेट्रोल अब लगभग हर पंप पर मिलने लगा है, और इसके साथ ही सोशल मीडिया पर एक नई बहस भी छिड़ गई है. कई वीडियो और पोस्ट में दावा किया जा रहा है कि इस ईंधन से पुरानी कारों का इंजन बैठ जाएगा, माइलेज में भारी गिरावट आएगी और फ्यूल सिस्टम को नुकसान पहुंचेगा. सच्चाई यह है कि ये दावे पूरी तरह सही नहीं हैं, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि कोई समस्या ही नहीं है. कुछ गाड़ियों में, खासकर बहुत पुरानी गाड़ियों में, वाकई दिक्कतें सामने आई हैं.

E20 लाने के पीछे सरकार का मकसद तेल के आयात पर खर्च घटाना, किसानों की आमदनी बढ़ाना और प्रदूषण को कम करना है. एथेनॉल एक ऑक्सीजनेट की तरह काम करता है, जिससे ईंधन का दहन ज्यादा साफ-सुथरा होता है. मुश्किल वहां शुरू होती है जब बात 2022 से पहले बनी, खासकर BS4 से पहले के जमाने की गाड़ियों की आती है, जहां फ्यूल सिस्टम की अनुकूलता पर सवाल उठते हैं. इंजीनियरिंग सिद्धांतों और वर्कशॉप के अनुभव को देखने पर तस्वीर काफी साफ हो जाती है.

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एथेनॉल आखिर है क्या और पेट्रोल में क्यों मिलाया जाता है

एथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने या मक्के से बनने वाला एक अल्कोहल है. इसे पेट्रोल में मिलाने की सबसे बड़ी वजह है ईंधन में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाना, जिससे कंबशन यानी दहन बेहतर होता है. इसका सीधा फायदा यह होता है कि हानिकारक उत्सर्जन कम होता है और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता भी घटती है. दिलचस्प बात यह है कि मोटरस्पोर्ट की दुनिया में एथेनॉल को खासतौर पर पसंद किया जाता है, क्योंकि इसकी ऑक्टेन रेटिंग ज्यादा होती है, कम्बशन का तापमान नियंत्रित रहता है और गाड़ी को ट्यून करना आसान हो जाता है. भारत में E10 यानी 10 प्रतिशत एथेनॉल वाला पेट्रोल लंबे समय से चल रहा था, और अब E20 नया स्टैंडर्ड बन गया है.

इंजन के एयर-फ्यूल रेशियो पर क्या फर्क पड़ता है

हर इंजन का एक तय एयर-फ्यूल रेशियो यानी AFR होता है, जिस पर वह सबसे बेहतर तरीके से चलता है. शुद्ध पेट्रोल यानी E0 के लिए यह अनुपात 14.7:1 है, जबकि शुद्ध एथेनॉल के लिए यह करीब 9:1 रह जाता है. जब E20 जैसा ब्लेंड इस्तेमाल होता है, तो यह अनुपात बदल जाता है, जिसकी वजह से इंजन के ECU को ईंधन की मात्रा थोड़ी बढ़ानी पड़ती है. अगर ECU यह एडजस्टमेंट न करे, तो इंजन लीन हो सकता है यानी उसे जरूरत से कम ईंधन मिलेगा, जिससे तापमान बढ़ने का खतरा रहता है. लेकिन आधुनिक गाड़ियां इस समस्या को संभालने में पूरी तरह सक्षम हैं.

BS4 और उससे नई गाड़ियां E20 को कैसे झेल लेती हैं

BS4 या उससे नई पेट्रोल कारों में क्लोज्ड-लूप फ्यूलिंग सिस्टम, ऑक्सीजन सेंसर और स्मार्ट ECU होते हैं, जो इंजेक्टर के पल्स को खुद-ब-खुद एडजस्ट कर सकते हैं. ज्यादातर ECU इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि वे लगभग 20 प्रतिशत तक फ्यूल करेक्शन कर सकें, और E20 आसानी से इस दायरे में आ जाता है. इसका एक बड़ा उदाहरण ब्राजील है, जहां E25 से E27 तक का ब्लेंड सालों से आम कारों में बिना किसी बड़े संकट के इस्तेमाल हो रहा है. भारत में BS4 स्टैंडर्ड लाते वक्त ही E10 के लिहाज से तैयारियां कर ली गई थीं, यानी एथेनॉल-रेसिस्टेंट होसेस, सील्स और पंप पहले से मौजूद हैं. इंजीनियरिंग में हमेशा एक अतिरिक्त हेडरूम रखा जाता है, इसलिए ज्यादातर BS4 और उससे नई गाड़ियों को E20 के लिए सुरक्षित माना जा सकता है.

क्या E20 से वाकई 20 प्रतिशत ज्यादा फ्यूल इंजेक्ट होता है

इसका जवाब साफ तौर पर नहीं है. शुद्ध एथेनॉल में पेट्रोल के मुकाबले करीब 34 प्रतिशत कम ऊर्जा होती है, यानी बराबर काम के लिए ज्यादा मात्रा चाहिए. लेकिन E20 के मामले में E0 की तुलना में सिर्फ 6 से 7 प्रतिशत ज्यादा फ्यूल की जरूरत पड़ती है, जबकि E10 में यह अंतर सिर्फ 2 से 3 प्रतिशत का ही होता है. ECU इस छोटे से बदलाव को बहुत आसानी से हैंडल कर लेता है. इसलिए सोशल मीडिया पर घूम रहे 30 से 50 प्रतिशत माइलेज गिरने के दावे पूरी तरह गलत हैं. असल में जो गिरावट देखी जाती है, वह मोटे तौर पर 2 से 3 प्रतिशत के आसपास ही रहती है.

इंजेक्टर क्लॉगिंग और होसेस को लेकर चिंता कितनी सही

इंजेक्टर्स में डिपॉजिट यानी जमाव धीरे-धीरे बनते हैं, और इसकी वजह खराब ईंधन, बहुत छोटी ड्राइव्स या रखरखाव में लापरवाही हो सकती है. दिलचस्प बात यह है कि E20 में एक क्लीनिंग इफेक्ट भी होता है, जो वर्निश और कार्बन के जमाव को घोल देता है, ठीक उसी तरह जैसे बाजार में मिलने वाले महंगे फ्यूल सिस्टम क्लीनर काम करते हैं. जिन गाड़ियों का मेंटेनेंस पहले से ही खराब रहा है, उनमें पुराने जमे हुए डिपॉजिट अचानक ढीले पड़कर कुछ समय के लिए दिक्कत खड़ी कर सकते हैं, लेकिन जिन गाड़ियों का नियमित मेंटेनेंस होता रहा है, उनके लिए यह असल में फायदेमंद साबित होता है. होसेस के मामले में भी यही बात लागू होती है. एथेनॉल पुराने नेचुरल रबर या सस्ती क्वालिटी वाले होसेस को प्रभावित कर सकता है, लेकिन 2010 के बाद से ज्यादातर कंपनियां FKM या NBR जैसी रेसिस्टेंट मैटेरियल का इस्तेमाल कर रही हैं, और BS4 आने के बाद इन बदलावों को और मजबूती मिली है. यही वजह है कि इंजीनियरिंग टॉलरेंस के चलते E20 या यहां तक कि E30 भी ज्यादातर मामलों में सुरक्षित रहता है, बस शर्त यह है कि आपकी गाड़ी बहुत पुरानी कार्बोरेटेड न हो.

नमी सोखने और फेज सेपरेशन का खतरा कब बढ़ता है

एथेनॉल हाइग्रोस्कोपिक होता है, यानी यह हवा से नमी सोख लेता है. E20 में फेज सेपरेशन तब हो सकता है जब पानी की मात्रा 0.4 प्रतिशत तक पहुंच जाए, लेकिन इसमें आमतौर पर 3 से 5 हफ्ते का वक्त लगता है. यह समस्या खासतौर पर उन गाड़ियों में देखने को मिल सकती है, जो लंबे समय तक इस्तेमाल में नहीं आतीं, नमी भरे इलाकों में खड़ी रहती हैं या जिनका टैंक अक्सर खाली रहता है. जो गाड़ियां रोजाना चलती हैं, उनमें ईंधन लगातार सर्कुलेट होता रहता है, इसलिए इस तरह की समस्या की गुंजाइश काफी कम हो जाती है. इसके अलावा दो और छोटी लेकिन असली समस्याएं भी सामने आई हैं, एक तो माइलेज में मामूली 2 से 3 प्रतिशत की गिरावट, और दूसरी बहुत ठंडे मौसम में कोल्ड स्टार्ट के वक्त थोड़ी दिक्कत.

BS3 और कार्बोरेटेड गाड़ियों के लिए खतरा कहीं ज्यादा असली है

यहीं पर असली सावधानी की जरूरत है. BS3 वाली गाड़ियों में इस्तेमाल हुआ मैटेरियल एथेनॉल के लिए उतना टॉलरेंट नहीं है, जितना बाद के स्टैंडर्ड में हो गया. लंबे समय तक E20 के इस्तेमाल से इनके होसेस, सील्स और पंप तेजी से खराब हो सकते हैं. कार्बोरेटेड इंजन में फिक्स्ड जेट्स होते हैं, जिनकी वजह से ये इंजन लीन चलते हैं, यानी जरूरत से कम ईंधन के साथ काम करते हैं, और इसका नतीजा हिचकिचाहट, स्टार्ट होने में परेशानी और ज्यादा तापमान के रूप में सामने आ सकता है. वहीं जब गाड़ी लंबे समय तक बिना चले खड़ी रहती है, तो स्टोरेज के दौरान करोशन यानी जंग लगने का खतरा भी बढ़ जाता है.

पुरानी गाड़ी वालों के लिए जरूरी सावधानियां

जिनके पास BS3 या बहुत पुरानी कार्बोरेटेड गाड़ी है, उनके लिए कुछ बातों का ध्यान रखना समझदारी होगी. सबसे पहले, एथेनॉल-रेसिस्टेंट होसेस और सील्स लगवाना बेहतर रहेगा, यानी FKM या NBR मैटेरियल वाले पार्ट्स. दूसरा, पंप डायफ्राम और सील्स की नियमित जांच करवाते रहें और जरूरत पड़ने पर उन्हें बदलें. तीसरा, अगर गाड़ी को लंबे समय तक स्टोर करना है तो स्टेबलाइज़र का इस्तेमाल करें और टंकी में E20 को बहुत लंबे समय तक न रखें. चौथा, जेट्स और इंजेक्टर्स की नियमित सफाई कराते रहें. इन छोटी-छोटी सावधानियों से पुरानी गाड़ियों को भी E20 के साथ बिना बड़ी परेशानी के चलाया जा सकता है.

इसका आप पर असर

यह खबर सीधे उन लाखों गाड़ी मालिकों को छूती है जो रोज पेट्रोल पंप पर E20 भरवा रहे हैं.

  • पुरानी गाड़ी मालिकों के लिए: जिनकी कार BS4 या उससे नई है, उन्हें बड़ी चिंता की जरूरत नहीं, माइलेज में सिर्फ 2-3 प्रतिशत का ही मामूली फर्क पड़ेगा, न कि दावा किए जा रहे 30-50 प्रतिशत का.
  • BS3 और कार्बोरेटेड कार मालिकों के लिए: इन्हें एथेनॉल-रेसिस्टेंट होसेस, सील्स और पंप डायफ्राम समय पर चेक कराने पर खर्च करना पड़ सकता है, ताकि लंबे समय में महंगी रिपेयर से बचा जा सके.
  • गाड़ी को स्टोर करने वालों के लिए: लंबे समय तक खड़ी रहने वाली गाड़ियों में टंकी में E20 लंबे समय तक न रखें और फ्यूल स्टेबलाइज़र इस्तेमाल करें, ताकि फेज सेपरेशन का खतरा टाला जा सके.

सवाल-जवाब

E20 पेट्रोल में एथेनॉल कितने प्रतिशत होता है?
E20 पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिला होता है, बाकी हिस्सा शुद्ध पेट्रोल यानी E0 होता है.
क्या E20 से पुरानी कारों का इंजन खराब हो जाता है?
पूरी तरह ऐसा नहीं है, BS4 या उससे नई ज्यादातर गाड़ियों का ECU इस बदलाव को आसानी से संभाल लेता है, लेकिन BS3 और कार्बोरेटेड गाड़ियों में असली दिक्कत आ सकती है.
E20 से माइलेज में कितनी गिरावट आती है?
असल गिरावट सिर्फ 2 से 3 प्रतिशत के आसपास रहती है, न कि सोशल मीडिया पर दावा किए जा रहे 30 से 50 प्रतिशत जितनी.
क्या E20 में सच में 20 प्रतिशत ज्यादा फ्यूल इंजेक्ट होता है?
नहीं, E20 में E0 के मुकाबले सिर्फ 6 से 7 प्रतिशत ज्यादा फ्यूल की जरूरत पड़ती है, क्योंकि शुद्ध एथेनॉल में पेट्रोल से करीब 34 प्रतिशत कम ऊर्जा होती है.
फेज सेपरेशन क्या है और यह कब होता है?
यह एथेनॉल के नमी सोखने से होने वाली समस्या है, जो पानी की मात्रा 0.4 प्रतिशत तक पहुंचने पर होती है और इसमें आमतौर पर 3 से 5 हफ्ते लगते हैं.
BS3 गाड़ी मालिकों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
उन्हें एथेनॉल-रेसिस्टेंट होसेस और सील्स लगवानी चाहिए, पंप डायफ्राम नियमित चेक करना चाहिए और जेट्स-इंजेक्टर्स की सफाई कराते रहनी चाहिए.
क्या कार्बोरेटेड इंजन के लिए E20 ज्यादा जोखिम भरा है?
हां, फिक्स्ड जेट्स की वजह से कार्बोरेटेड इंजन लीन चलते हैं, जिससे हिचकिचाहट, खराब स्टार्ट और ज्यादा तापमान की समस्या हो सकती है.
क्या भारत के बाहर भी इतना ज्यादा एथेनॉल ब्लेंड इस्तेमाल होता है?
हां, ब्राजील में सालों से E25 से E27 तक का ब्लेंड आम कारों में बिना किसी बड़े संकट के इस्तेमाल हो रहा है.
अमित पटेल
लेखक के बारे मेंअमित पटेलबिज़नेस संवाददाता दिल्ली
विशेषज्ञताबिज़नेस समाचार, वित्तीय बाज़ार, शेयर बाज़ार विश्लेषण, कॉर्पोरेट मामले, स्टार्टअप, उद्यमिता, आर्थिक रुझान, टेक्नोलॉजी बिज़नेस, निवेश, वैश्विक अर्थव्यवस्था

अमित पटेल एक बिज़नेस संवाददाता हैं जो वैश्विक बाज़ार, वित्त, स्टार्टअप, तकनीक और आर्थिक रुझानों को कवर करते हैं। वे आधुनिक अर्थव्यवस्था को आकार देने वाले कारोबार और उद्योगों की ख़बरें, बाज़ार विश्लेषण और अंतर्दृष्टि देते हैं।

अमित पटेल एक बिज़नेस संवाददाता हैं जो वैश्विक बाज़ार, वित्त, उद्यमिता, तकनीक और आर्थिक घटनाक्रमों को कवर करते हैं। वे ब्रेकिंग बिज़नेस न्यूज़, कॉर्पोरेट रणनीतियों, शेयर बाज़ार के रुझानों, स्टार्टअप इकोसिस्टम और वैश्विक अर्थव्यवस्था को आकार देने वाले औद्योगिक नवाचारों पर रिपोर्ट करते हैं। सटीकता, स्पष्टता और गहन विश्लेषण पर ज़ोर देते हुए अमित पाठकों को जटिल कारोबारी विषयों और उनके वास्तविक असर को समझने में मदद करते हैं। उनकी कवरेज वित्तीय बाज़ार, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, उभरते उद्योगों, आर्थिक नीति, निवेश रुझानों और डिजिटल बदलाव तक फैली है।

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