आजकल कार और बाइक दोनों ही वाहनों में ट्यूबलेस टायर का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है। इनकी सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि पंचर होने की स्थिति में हवा बहुत धीमी गति से बाहर निकलती है, जिससे अचानक वाहन अनियंत्रित होने या दुर्घटना का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है। कई वाहन चालक यह सोचते हैं कि टायर में पंचर होने पर केवल रिपेयर करवा लेना ही काफी है और इसके बाद गाड़ी को बेफिक्र होकर चलाया जा सकता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि हर एक पंचर टायर की मजबूती को अंदर से प्रभावित करता है। जब किसी टायर में बार-बार रिपेयरिंग कराई जाती है, तो उसकी स्ट्रक्चरल स्ट्रेंथ यानी संरचनात्मक मजबूती कम होने लगती है, जिससे आगे चलकर टायर फटने का जोखिम काफी बढ़ जाता है।
कब माना जाता है टायर को असुरक्षित
विशेष रूप से जब पंचर ट्रेड एरिया से बाहर हो या फिर एक ही हिस्से के आसपास कई सारे छेद हो जाएं, तब स्थिति काफी गंभीर और जोखिम भरी हो जाती है। टायर निर्माताओं और ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों की हमेशा यही सलाह रहती है कि एक निश्चित सीमा से अधिक रिपेयरिंग होने के बाद पुराना टायर हटाकर नया टायर लगवा लेना ही सबसे सुरक्षित विकल्प साबित होता है। समय रहते टायर बदल लेने से न केवल सड़क पर आपकी व्यक्तिगत सुरक्षा सुनिश्चित होती है, बल्कि लंबी यात्राओं के दौरान मानसिक शांति भी मिलती है। ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि आखिर एक ट्यूबलेस टायर में अधिकतम कितने पंचर होने के बाद उसे बदल देना अनिवार्य हो जाता है।
अधिकतम कितने पंचर होने पर बदलें टायर
अधिकांश ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी ट्यूबलेस टायर को 3 से 4 बार पंचर होने के बाद बदल देना चाहिए। यदि पंचर केवल ट्रेड वाले हिस्से में हुए हैं, छोटे आकार के छेद हैं और उन्हें पूरी सावधानी के साथ सही तरीके से रिपेयर किया गया है, तब तक इसे 2 से 3 बार तक सुरक्षित माना जा सकता है। हालांकि, यदि पंचर की संख्या 3 से 4 बार से अधिक हो जाती है, तो टायर का ढांचा कमजोर पड़ जाता है। ऐसी स्थिति में हाई स्पीड यानी तेज गति में गाड़ी चलाने पर या फिर लंबी दूरी की यात्रा के दौरान बड़ा हादसा होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है。
साइडवॉल में पंचर होने पर तुरंत लें कड़ा फैसला
टायर के साइडवॉल यानी किनारे वाले हिस्से या शोल्डर एरिया में यदि कभी भी पंचर हो जाए, तो उसे किसी भी कीमत पर रिपेयर नहीं कराना चाहिए। साइडवॉल का हिस्सा वाहन चलाते समय लगातार फ्लेक्स करता रहता है यानी मुड़ता और फैलता रहता है। यही वजह है कि ऐसे संवेदनशील स्थान पर लगाया गया पैच या प्लग आसानी से निकल सकता है या अपनी पकड़ छोड़ सकता है। इस प्रकार की स्थिति बनने पर टायर की रिपेयरिंग का जोखिम न लेते हुए उसे तुरंत बदल देना ही एकमात्र सुरक्षित और समझदारी भरा विकल्प माना जाता है।
पंचर के बीच की दूरी और आकार का रखें खास ख्याल
वाहन चालकों को इस बात का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए कि टायर में मौजूद दो पंचर के बीच कम से कम 150 मिलीमीटर यानी लगभग 6 इंच की सुरक्षित दूरी अवश्य होनी चाहिए। इसके अलावा यदि टायर में हुआ छेद 6 मिलीमीटर से अधिक बड़ा है या फिर एक ही जगह के आसपास कई सारे रिपेयर किए गए हैं, तो इससे टायर की कुल मजबूती बुरी तरह प्रभावित होती है। इस तरह के मामलों में किसी भी प्रकार की जोखिम लेने से बचने के लिए नया टायर डलवाना ही बुद्धिमानी होती है।
अन्य परिस्थितियां जिनमें टायर बदलना है जरूरी
पंचर की संख्या के अलावा भी कुछ ऐसी स्थितियां होती हैं जिनमें टायर का बदला जाना बेहद आवश्यक हो जाता है। यदि टायर की ट्रेड डेप्थ 1.6 मिलीमीटर से कम हो चुकी है, टायर पर किसी प्रकार के उभार या गहरे कट दिखाई दे रहे हैं, टायर से बार-बार हवा कम हो रही है, या फिर टायर की उम्र 5 से 6 साल पुरानी हो चुकी है, तो पंचर की संख्या कम होने के बावजूद उसे बदल देना बेहतर रहता है। घिस चुके टायरों में पंचर होने की संभावना नए टायरों की तुलना में बहुत अधिक होती है।
सुरक्षा के लिए कुछ जरूरी सावधानियां
अपने वाहन के टायरों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए नियमित रूप से टायर प्रेशर की जांच करवाते रहें, सड़क पर पड़े नुकीले मलबे या कांच के टुकड़ों से वाहन को बचाएं और किसी भी पंचर के बाद किसी पेशेवर मैकेनिक से टायर की पूरी जांच जरूर करवाएं। मामूली पैसों की बचत के चक्कर में सस्ता रिपेयर करवाना भविष्य में बहुत महंगा साबित हो सकता है। समय पर टायर बदलकर सड़क पर अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करें।



















