जीवविज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संगम से एक बेहद अनोखा प्रयोग सामने आया है, जहाँ एक फल मक्खी के डिजिटल दिमाग को समाचारों के विषय और शीर्षक तैयार करने का काम सौंपा गया। इस प्रणाली में लगभग 165,112 सक्रिय न्यूरॉन्स को प्रशिक्षित किया गया, जिससे कई विचित्र परिणाम निकलकर आए। उदाहरण के लिए, इस मॉडल ने निगरानी तंत्र में छिपी मौसम समस्याओं और एलन मस्क की कंप्यूटर सुरक्षा की समीक्षा जैसे शीर्षकों के सुझाव दिए। इसके सबसे मनोरंजक प्रस्तावों में यह विचार भी शामिल रहा कि खाना पकाने की इच्छा हर किसी को है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप की पहेली को कोई नहीं सुलझा सका। यह अजीबोगरीब सेटअप दिखाता है कि जैविक मस्तिष्क के बुनियादी ढांचे को जब डिजिटल दुनिया में उतारा जाता है, तो वह किस तरह काम करता है।
पिचफ्लाई और कनेक्टोम का तकनीकी ढांचा
इस पूरी पहल की नींव में पिचफ्लाई नामक एक परियोजना है, जो नर ड्रोसोफिला यानी साधारण फल मक्खी के मस्तिष्क के विस्तृत डिजिटल नक्शे पर काम करती है। गूगल और कई प्रमुख अकादमिक संस्थानों के वैज्ञानिकों ने मिलकर इस तंत्रिका तंत्र के नक्शे का निर्माण किया है, जिसे विज्ञान की भाषा में कनेक्टोम कहा जाता है। यह डिजिटल संरचना लगभग 166,000 न्यूरॉन्स और 125 मिलियन कनेक्टिंग सिनैप्स के बीच होने वाली विद्युत और रासायनिक क्रियाओं का खाका खींचती है। बाहरी उत्तेजनाओं के मिलने पर मक्खी का तंत्रिका तंत्र किस तरह सक्रिय होता है, यह नक्शा ठीक उसी प्रतिक्रिया का आभासी अनुकरण करने में सक्षम बनाता है। यह असल जैविक बुद्धिमत्ता के भौतिक मानचित्र पर आधारित कंप्यूटेशनल मॉडलिंग का एक सीधा और व्यावहारिक उदाहरण है।
क्योंकि शोध दल ने इस कनेक्टोम को स्वतंत्र और ओपन सोर्स रूप में उपलब्ध कराया, इसलिए किसी भी प्रोग्रामिंग टूल की मदद से इसे सीधे किसी सॉफ्टवेयर प्रोजेक्ट में शामिल करना संभव हो गया। इस प्रयोग के तहत सैकड़ों लोकप्रिय और सर्वाधिक पढ़े गए समाचार शीर्षकों को संकलित किया गया और उन्हें इस आभासी तंत्रिका जाल को सौंप दिया गया। कोडेक्स की मदद से इन शीर्षकों को छोटे शब्दों और वाक्यांशों में तोड़ा गया, जिसके बाद उन्हें न्यूरल नेटवर्क के समझने योग्य वेक्टर प्रारूप में बदल दिया गया। इसके बाद इस कनेक्टोम को बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले लेखों का डेटा देकर अपने नए विचार उत्पन्न करने के निर्देश दिए गए। डिजिटल अवतार में नजर आने वाली यह मक्खी एक छोटी टोपी पहने दिखती है, जो इस जटिल प्रयोग को एक हास्यप्रद रूप देती है।
भाषा समझ या सिर्फ पैटर्न का फेरबदल
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि पिचफ्लाई कोई पारंपरिक लार्ज लैंग्वेज मॉडल नहीं है। फल मक्खी का यह आभासी मस्तिष्क शब्दों का अर्थ नहीं समझता और न ही उसे यह पता होता है कि उसके वाक्यों का कोई तर्कसंगत मतलब निकलता है या नहीं। इसका काम केवल उन पैटर्नों को नए संयोजनों में जोड़ना है जो इसने अपने प्रशिक्षण के दौरान देखे हैं। इस मॉडल द्वारा रचे गए कुछ अन्य शीर्षकों में यह विचार शामिल था कि एजंटिक एआई में आ रहा सूक्ष्म बदलाव खानपान के नियमों को कैसे बदल रहा है, या सुरक्षा समाचार चुपचाप डोनाल्ड ट्रंप के साथ क्या कर रहे हैं। इसके अलावा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के टूटने से पहले निजता को नए सिरे से परिभाषित करने की होड़ जैसे जटिल विषयों के शीर्षक भी इस डिजिटल मक्खी ने उछाले।
इन बेतुके और कई बार सिरदर्द पैदा करने वाले शीर्षकों से एक बात साफ हो जाती है कि वास्तविक मानवीय पत्रकारों और विश्लेषकों की जगह यह तकनीक फिलहाल नहीं ले सकती। आने वाले समय में इसे लगातार नए शीर्षक पढ़कर और अधिक सीखने का अवसर दिया जा सकता है। वर्तमान स्थिति में यह प्रयोग केवल एक संकल्पना परीक्षण के रूप में कार्य करता है, जो यह साबित करता है कि बुनियादी जैविक नक्शों को भी रचनात्मक दिखने वाले कार्यों के लिए कंप्यूटर पर चलाया जा सकता है।
स्टॉक ट्रेडिंग से लेकर वीडियो गेम तक के अनूठे प्रोजेक्ट
सितंबर की शुरुआत में जैसे ही इस कनेक्टोम को सार्वजनिक किया गया, फल मक्खी के आभासी दिमाग से जुड़े दर्जनों अनोखे और मनोरंजक प्रोजेक्ट्स इंटरनेट पर दिखाई देने लगे। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लायरा बबल्स नामक एक उपयोगकर्ता ने एक ऐसा प्रदर्शन साझा किया, जहाँ इस डिजिटल मक्खी के मस्तिष्क को बीट सेबर नामक वीआर गेम खेलने के लिए प्रशिक्षित किया गया था। वहीं दूसरी तरफ, कॉइनबेस कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर एलेक्स वोर्मुथ ने स्टोनकफ्लाई नाम से एक परियोजना तैयार की, जिसमें मक्खी के नन्हे मस्तिष्क को यह निर्णय लेने का जिम्मा सौंपा गया कि शेयर बाजार में शेयरों की खरीद-फरोख्त कैसे की जाए। हालाँकि यह ट्रेडिंग मॉडल आर्थिक नुकसान झेल रहा है, लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए इसका प्रदर्शन आश्चर्यजनक माना जा रहा है।
एलेक्स वोर्मुथ ने बताया कि फल मक्खी का यह प्रयोग ऐसे दौर में एक हल्का-फुल्का और हास्यप्रद सुकून देता है जब हर कोई एआई के अस्तित्वगत खतरों को लेकर चिंतित है। उन्होंने यह भी कहा कि इस कनेक्टोम के साथ प्रयोग करना दार्शनिक रूप से बेहद दिलचस्प रहा है और यह ऐसे सवाल उठाता है कि इसके निर्माण से जुड़ी नैतिकता क्या है और क्या मक्खी के दिमाग की नकल में चेतना का कोई अंश मौजूद है। कई अन्य प्रोग्रामरों ने इस कनेक्टोम को डूम, माइनक्राफ्ट और पोंग जैसे क्लासिक वीडियो गेम खेलने के लिए प्रशिक्षित किया। कुछ आभासी मक्खियों ने रूबिक क्यूब की पहेली हल करने में भी हाथ आजमाया, जबकि किसी ने इसे कंप्यूटर पर गाड़ियां चलाने का काम दिया, जहाँ यह बात सामने आई कि फल मक्खियां समानांतर पार्किंग करने में बेहद कमजोर साबित हुईं।
न्यूरोविज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भविष्य
हालाँकि यह जांचना अभी बाकी है कि इनमें से कौन से प्रोजेक्ट्स सचमुच कनेक्टोम के वास्तविक न्यूरोनल फायरिंग का उपयोग कर रहे हैं और कौन से महज डिजिटल एनिमेशन या मजाक हैं। कुछ प्रोजेक्ट्स ऐसे भी हैं जिनमें मक्खी को बस आराम करने का प्रशिक्षण दिया गया है, जो सीधे तौर पर पैरोडी जान पड़ते हैं। लेकिन इस मनोरंजन के पीछे बेहद गंभीर वैज्ञानिक अनुसंधान भी चल रहे हैं, जिनमें इस तंत्रिका जाल का अन्वेषण करने वाले विजुअलाइजेशन और न्यूरल सर्किट्स को नियंत्रित करने वाले उपयोगी वैज्ञानिक टूल्स शामिल हैं।
विभिन्न जीवों के मस्तिष्क का ऐसा सटीक मानचित्र तैयार करना तंत्रिका वैज्ञानिकों के लिए बुद्धिमत्ता के जैविक रहस्यों को सुलझाने का एक बड़ा माध्यम बन सकता है। मानव मस्तिष्क में मौजूद 86 अरब न्यूरॉन्स का संपूर्ण नक्शा बनाना आज के दौर में तकनीकी रूप से मुमकिन नहीं है, लेकिन छोटे जीवों के मस्तिष्क का अध्ययन करके महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि हासिल की जा सकती है। वैज्ञानिक मक्खी के कनेक्टोम के तारों में फेरबदल करके यह भी देख सकते हैं कि किसी न्यूरोनल क्षति का असर पूरे तंत्र पर क्या पड़ता है और भविष्य में ऐसी क्षति की मरम्मत कैसे की जा सकती है। इसके अलावा, एआई के नजरिए से यह साबित होता है कि बड़ी कंपनियों द्वारा चलाए जा रहे विशालकाय मॉडल्स के मुकाबले विशिष्ट कार्यों के लिए छोटे जैविक मॉडल तैयार करना कितना आसान और प्रभावी हो चुका है।


















