बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में तीन अलग-अलग मामलों में पुलिसकर्मियों के खिलाफ हुई विभागीय कार्रवाई ने इलाके में पुलिस महकमे के भीतर भ्रष्टाचार को लेकर नई बहस छेड़ दी है। कुछ ही दिनों के भीतर लखौरा थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी, आदापुर के दो चौकीदार और तुरकौलिया थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी के खिलाफ अलग अलग स्तर पर एक्शन लिया गया है, जिसके बाद लोगों के बीच यह सवाल तेज हो गया है कि पुलिस असल में किसके साथ खड़ी है, आम जनता के साथ या फिर उन लोगों के साथ जिन पर कार्रवाई होनी चाहिए।
लखौरा थाना प्रभारी पर सस्पेंशन की कार्रवाई
पूर्वी चंपारण के लखौरा थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी प्रवीण कुमार को डीआईजी हरकिशोर राय ने निलंबित कर दिया है। यह कार्रवाई उन साक्ष्यों और शिकायतों के आधार पर की गई है जो जांच के दौरान पुलिस के पास पहुंचे थे। विभाग की ओर से अभी तक इस मामले की पूरी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है और आधिकारिक स्तर पर विस्तृत जांच अब भी चल रही है, इसलिए आरोपों की पूरी तस्वीर जांच पूरी होने के बाद ही साफ हो पाएगी।
आदापुर में दो चौकीदार भी हुए सस्पेंड
लखौरा वाले मामले से अलग, आदापुर थाना क्षेत्र से भी एक मामला सामने आया, जिसमें दो चौकीदारों पर आम लोगों से कथित तौर पर अवैध वसूली करने और उन्हें धमकाने के आरोप लगे। थाना स्तर पर हुई शुरुआती जांच के बाद इसकी रिपोर्ट एसपी स्वर्ण प्रभात के पास भेजी गई और उसी रिपोर्ट के आधार पर दोनों चौकीदारों को निलंबित कर दिया गया। इस मामले में भी विभागीय जांच अभी जारी बताई जा रही है।
तुरकौलिया के तत्कालीन थाना प्रभारी पर भी गिरी गाज
तीसरा मामला पूर्वी चंपारण के ही तुरकौलिया थाने से जुड़ा है, जहां तत्कालीन थाना प्रभारी संपत कुमार के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई की गई। उनके खिलाफ दर्ज शिकायतों और हुई जांच के आधार पर उन्हें निलंबित किया गया है। पुलिस विभाग इस मामले की भी आंतरिक जांच कर रहा है। हालांकि आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो पाएगी, लेकिन एक के बाद एक हुई इस ताबड़तोड़ कार्रवाई ने भ्रष्ट आचरण में लिप्त पुलिसकर्मियों के बीच खलबली मचा दी है।
पुलिस की कार्यशैली पर उठ रहे सवाल
लगातार सामने आ रहे इन तीन मामलों के बाद पूर्वी चंपारण में पुलिस की कार्यशैली को लेकर सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा तेज है कि अगर पुलिसकर्मियों पर लगे आरोप सही साबित होते हैं, तो इसका सीधा असर पुलिस की निष्पक्षता और जनता के भरोसे पर पड़ सकता है। हालांकि पुलिस मुख्यालय की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी शिकायत की जांच के बाद जो भी कर्मी दोषी पाए जाते हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।
सरकार की नीति और पुलिस की जवाबदेही
राज्य सरकार लगातार अपराध नियंत्रण को अपनी प्राथमिकता बताती रही है और इसी क्रम में पुलिस अधिकारियों को कानून के मुताबिक सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही यह अपेक्षा भी जताई जाती रही है कि पुलिस आम जनता के साथ निष्पक्ष और संवेदनशील तरीके से पेश आए। इन तीनों मामलों में हुई विभागीय कार्रवाई को इसी जवाबदेही तय करने की कवायद का हिस्सा माना जा रहा है।
जनविश्वास बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती
फिर भी, कानून के रखवालों के इस तरह के आचरण को देखकर कुछ सवाल लाजिमी हैं। जिस तरह केस डायरी को मैनेज करने के लिए महंगे तोहफे लिए जाने की बातें सामने आती हैं, उससे क्या गरीब और आम लोगों को सही मायने में पुलिसिया न्याय मिल पाएगा? पुलिस की जांच पर आम आदमी कितना भरोसा कर पाएगा? जानकारों की मानें तो पुलिस पर जनता का यकीन तभी मजबूत होगा जब हर शिकायत की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों पर तय समय में कार्रवाई हो और बेकसूर लोगों को किसी तरह की परेशानी न झेलनी पड़े।











