साल 1951 में रिलीज हुई क्लासिक हिंदी फिल्म अलबेला भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर मानी जाती है। इस फिल्म का निर्माण पूरी तरह से भगवान दादा की देखरेख में हुआ था, जिन्होंने इसकी कहानी लिखने के साथ ही निर्देशन, निर्माण और अभिनेत्री गीता बाली के साथ मुख्य भूमिका भी निभाई थी। फिल्म का एक खास गाना बलमा बड़ा नादान बेहद लोकप्रिय हुआ, जिसे लता मंगेशकर ने अपनी आवाज दी थी। लेकिन इस मशहूर गाने के पीछे एक दिलचस्प कहानी छिपी है। यह गाना असल में कोठे की ठुमरी से प्रेरित था, जिसे शुरुआत में संगीतकार और मुख्य अभिनेत्री दोनों ने खारिज कर दिया था।
कोठे की ठुमरी से रिकॉर्डिंग स्टूडियो तक का सफर
अलबेला फिल्म बनाने से पहले भगवान दादा ने देश के कई हिस्सों का दौरा किया था और वहां के कोठों की संगीत संस्कृति को बहुत करीब से देखा-समझा था। उस दौर में कोठों में तहजीब, संगीत का खास माहौल और ठुमरी-दादरा गायकी की समृद्ध परंपरा हुआ करती थी। भगवान दादा को कोठे की एक खास ठुमरी इतनी पसंद आ गई कि उन्होंने मन बना लिया था कि जब भी वे कोई फिल्म बनाएंगे, उसमें इस ठुमरी को जरूर शामिल करेंगे।
जब अलबेला का निर्माण शुरू हुआ, तो भगवान दादा इस ठुमरी की धुन लेकर संगीतकार रामचंद्र के पास पहुंचे। उन्होंने संगीतकार से कहा कि वे इस गाने को ठीक उसी कोठे वाले अंदाज और मिजाज में तैयार करें। हालांकि, रामचंद्र को यह विचार पसंद नहीं आया। संगीतकार का तर्क था कि यह ठुमरी किसी कमर्शियल फिल्म के हिसाब से बहुत धीमी है और इसे फिल्म में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन भगवान दादा अपने फैसले पर अड़े रहे और उन्होंने रामचंद्र से इसे हर हाल में रिकॉर्ड करने को कहा।
गीता बाली की आपत्ति और भगवान दादा की समझाइश
आखिरकार इस गाने को महान गायिका लता मंगेशकर की आवाज में रिकॉर्ड किया गया। लेकिन असली चुनौती तब खड़ी हुई जब इसे पर्दे पर गीता बाली के ऊपर फिल्माने की बारी आई। गाना सुनते ही गीता बाली ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई और इसे सस्ती किस्म का गाना करार दिया। उन्होंने भगवान दादा से पूछा कि वे ऐसा गाना कहां से ढूंढकर लाए हैं।
मामला बिगड़ता देख भगवान दादा ने गीता बाली को शांत कराया और उन्हें किरदार की जरूरत समझाई। उन्होंने बताया कि फिल्म में उनका किरदार किसी बड़ी या आधुनिक हीरोइन का नहीं है, बल्कि वह एक साधारण लड़की है जो एक ऐसे इंसान से प्यार करती है जिसे उसके प्यार की खबर तक नहीं है। भगवान दादा ने समझाया कि एक सामान्य लड़की के मुंह से यह गाना बेहद स्वाभाविक और जीवंत लगेगा। इस तर्क को सुनने के बाद गीता बाली शूटिंग के लिए तैयार हो गईं और गाना बलमा बड़ा नादान शूट किया गया।
सिनेमाघरों में गूंजी तालियां और सिक्कों की बारिश
हालांकि शूटिंग के दौरान भी गीता बाली के मन में गाने को लेकर थोड़ी हिचकिचाहट बनी हुई थी। भगवान दादा जिस तरह की भाव-भंगिमाएं और एक्सप्रेशन्स उनसे चाहते थे, वे उन्हें देने में थोड़ा झिझक रही थीं, लेकिन उन्होंने निर्देशक की मांग के अनुसार सीन पूरा किया।
जब 1951 में फिल्म अलबेला सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई, तो पर्दे पर बलमा बड़ा नादान गाना आते ही दर्शकों का उत्साह देखने लायक था। सिनेमाघरों में लोग खुशी से झूम उठे और पर्दे की तरफ सिक्के उछालने लगे। गाने की इस अपार सफलता को दिखाने के लिए भगवान दादा गीता बाली को खुद एक थिएटर ले गए। जब गीता बाली ने अपनी आंखों से दर्शकों का यह पागलपन देखा, तो वे बेहद खुश हुईं। उन्हें यह गाना इतना पसंद आया कि उन्होंने हंसते हुए भगवान दादा से कहा कि जब भी वे अपनी अगली फिल्म में उन्हें साइन करें, तो कांट्रैक्ट में ऐसा ही एक गाना जरूर रखें और अगर वे उसे शूट करने से मना करें तो उन्हें फिल्म से बाहर कर दें।



















