परिवार के साथ बैठकर देखी जा सकने वाली स्वच्छ फिल्मों का अपना ही एक अलग आनंद होता है। हर घर के मुखिया का सपना होता है कि वह पूरे कुनबे के साथ बैठकर कोई फिल्म देख सके। मौजूदा बॉलीवुड में ऐसी फिल्में बहुत कम बनती हैं जिन्हें घर के सभी सदस्य साथ बैठकर देख पाएं। मगर एक समय ऐसा भी रहा है जब चंद प्रोडक्शन हाउस सिर्फ इसी तरह की निर्मल फिल्मों के सहारे दर्शकों का दिल बहलाते थे और इन्हीं से भरपूर मुनाफा भी कमाते थे। ऐसा ही एक बैनर है राजश्री प्रोडक्शन। राजश्री ने महज सात साल के फासले में तीन ऐसी फिल्में बनाईं जो हर दर्शक के दिल में घर कर गईं। तीनों ही सुपर डुपर हिट रहीं और इनका संगीत ब्लॉकबस्टर साबित हुआ। तीसरी फिल्म के रीमेक ने तो कमाई के बिल्कुल नए कीर्तिमान रच डाले और वह ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर बन गई।
राजश्री की पहचान और 'गीत गाता चल'
राजश्री प्रोडक्शन की पहचान ही स्वच्छ फिल्में बनाने की रही है और यह परंपरा आज भी जारी है। पारिवारिक मूल्यों, निश्छल प्रेम और संवेदनाओं पर टिकी कहानियां चुनकर इस बैनर ने दिल को छू लेने वाली फिल्में दीं। साल 1975 को 'शोले' और 'दीवार' जैसी कालजयी फिल्मों के लिए याद किया जाता है। इसी वर्ष कई और फिल्में भी आईं जो हिंदी सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर बनीं। इसी 1975 में राजश्री की एक फिल्म 'गीत गाता चल' भी पर्दे पर आई थी, जो 16 अक्टूबर 1975 को रिलीज हुई। यह रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी 'अतिथि' से प्रेरित थी। इसका निर्देशन हिरेन नाग ने किया था और निर्माता ताराचंद बड़जात्या थे।
संगीत ने दिलाई सफलता
इस फिल्म में सचिन पिलगांवकर और सारिका मुख्य भूमिका में थे। इनके अलावा उर्मिला भट्ट, मदन पुरी और पद्मा खन्ना भी अहम किरदारों में नजर आए। फिल्म की कामयाबी में इसके संगीत का बड़ा योगदान रहा। संगीत रवींद्र जैन ने तैयार किया और गाने भी उन्हीं के लिखे हुए थे। फिल्म का शीर्षक गीत 'गीत गाता चल, ओ साथी गुनगुनाता चल' जसपाल सिंह ने गाया था। एक और सुपरहिट गीत 'श्याम तेरी बंशी पुकारे राधा नाम' जसपाल सिंह और आरती मुखर्जी की आवाज में था, जो आज भी उतना ही लोकप्रिय है। फिल्म में चौपाइयां भी शामिल थीं। सचिन पिलगांवकर ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि पहली ही मुलाकात में उनकी दोस्ती ताराचंद बड़जात्या के बेटे राजकुमार बड़जात्या से हो गई थी। जब फिल्म बनकर तैयार हुई तो उसे केवल एक ही सिनेमाघर में लगाया गया। सबको लग रहा था कि यह पिट जाएगी। तीन दिन तक एक भी दर्शक नहीं आया, लेकिन चौथे दिन से थिएटर हाउसफुल होने लगा और फिल्म सुपरहिट साबित हुई।
'लव स्टोरी' से जन्मा अगला आइडिया
'गीत गाता चल' की प्रेस पार्टी होनी थी। सचिन पिलगांवकर घर से जल्दी निकल पड़े और चूंकि उनके पास समय था, इसी बीच उन्होंने एक अंग्रेजी फिल्म 'लव स्टोरी' देख डाली। यह फिल्म एरिक सहगल के 1970 में आए उपन्यास पर आधारित थी। फिल्म देखने के बाद सचिन सीधे 'गीत गाता चल' की प्रेस पार्टी पहुंचे और राजकुमार बड़जात्या को इस फिल्म के बारे में बताया। सचिन ने अपने इंटरव्यू में कहा था, 'मैंने राजकुमार बड़जात्या को 'लव स्टोरी' की कहानी सुनाई और बताया कि यह एक रोमांटिक फिल्म है जिसमें लड़की की मौत हो जाती है।' कहानी सुनकर वे बेहद प्रभावित हुए और अगली फिल्म बनाने पर सोचने लगे। 'गीत गाता चल' की पूरी टीम के साथ ही यह फिल्म रची गई। सारिका इसका हिस्सा नहीं बन सकीं क्योंकि उनके पास तारीखें नहीं थीं, लिहाजा रंजीता कौर को लिया गया। यही फिल्म थी 'अंखियों के झरोखों से', जो 7 अप्रैल 1978 को रिलीज हुई।
'अंखियों के झरोखों से' का जादू
'अंखियों के झरोखों से' का शीर्षक गीत बाद में कंपोज होने के बाद तय हुआ। फिल्म की कहानी मधुसूदन कालेलकर ने लिखी, जबकि पटकथा हिरेन नाग और मधुसूदन कालेलकर ने मिलकर लिखी। संवाद वृजेंद्र गौड़ के थे। दिलचस्प बात यह है कि मधुसूदन कालेलकर की दोस्ती सचिन के पिता से थी। गीत-संगीत रवींद्र जैन का था और इसकी सफलता में संगीत की बड़ी भूमिका रही। फिल्म में कुल पांच गाने थे और हर एक सुपरहिट साबित हुआ। शीर्षक गीत 'अंखियों के झरोखे से' हेमलता ने गाया था, जो आज भी दिल को छू जाता है। 26वें फिल्मफेयर अवॉर्ड में इस फिल्म को पांच नामांकन मिले। फिल्म जबरदस्त कामयाब रही। 48 लाख के बजट में बनी इस फिल्म ने 1.5 करोड़ का कलेक्शन किया और सुपरहिट साबित हुई।
'सुन सजना' की नाकामी और 'नदिया के पार' की तैयारी
'अंखियों के झरोखों से' की अपार सफलता के बाद राजकुमार बड़जात्या पर उनके भाइयों ने मिथुन चक्रवर्ती और रंजीता कौर के साथ फिल्म बनाने का दबाव डाला। परिवार के दबाव के सामने राजकुमार झुक गए और उन्होंने 'सुन सजना' नाम से फिल्म बनाई। 8 अगस्त 1982 को रिलीज हुई यह फिल्म डिजास्टर साबित हुई। इसी दौरान उन्होंने सचिन पिलगांवकर और साधना सिंह के साथ एक और फिल्म 'नदिया के पार' भी बनाई। यह फिल्म केशव प्रसाद मिश्रा के मशहूर उपन्यास 'कोहबर की शर्त' पर आधारित थी। इसकी शूटिंग पूरे एक महीने तक जौनपुर की केराकत तहसील के विजयीपुर गांव में हुई। उपन्यास की सिर्फ आधी कहानी पर ही फिल्म बनाई गई। कहानी चंदन (सचिन) और गुंजा (साधना सिंह) की प्रेमकथा पर केंद्रित थी।
भोजपुरी रंग में रंगी 'नदिया के पार'
'नदिया के पार' 10 अक्टूबर 1982 को रिलीज हुई। इसका निर्देशन गोविंद मूनिस ने किया था। संगीत एक बार फिर रवींद्र जैन ने ही दिया। फिल्म में कुल पांच गाने थे और हर गाना सुपरहिट रहा। सभी गीत रवींद्र जैन के ही लिखे हुए थे और इनमें लोकगीतों का स्पर्श था। फिल्म का कलेवर भी भोजपुरी था। सबसे रोचक बात यह है कि फिल्म का कुल बजट करीब ₹18 लाख था। इस सादगी भरी फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन करते हुए दुनियाभर में करीब ₹5.4 करोड़ का कलेक्शन किया और सुपरहिट साबित हुई।
कागज पर लिखे तीन शब्द और रीमेक का सुझाव
राजकुमार बड़जात्या के बेटे सूरज बड़जात्या साल 1989 में अपनी ब्लॉकबस्टर फिल्म 'मैंने प्यार किया' की तेलुगू भाषा में डबिंग करवा रहे थे। यह काम चेन्नई के एक स्टूडियो में चल रहा था, जहां राजकुमार बड़जात्या भी मौजूद थे। उन्होंने कागज पर बड़े प्यार से तीन शब्द लिखे और वह कागज सूरज की ओर बढ़ा दिया। उस पर अगली फिल्म बनाने का सुझाव लिखा था। पिता की आज्ञा मानते हुए सूरज ने फिल्म बनाने का फैसला किया। दरअसल, राजकुमार ने उन्हें 'नदिया के पार' का रीमेक बनाने का सुझाव दिया था।













