1970 के दशक में हिंदी सिनेमा में बदले की कहानियों वाली मसाला फिल्मों का दौर शुरू हुआ, जिनमें एक्शन, रोमांस, गाने और क्राइम थ्रिल सब एक साथ मिलते थे. इसी दौर में 7 साल के फासले पर आई दो फिल्मों में एक अजीब समानता निकली, दोनों की कहानी में विलेन का नाम एक जैसा ही रखा गया था. एक फिल्म में ही-मैन धर्मेंद्र लीड रोल में थे, तो दूसरी में नए-नए उभरे एंग्री यंगमैन अमिताभ बच्चन. दोनों फिल्मों के गाने सुपरहिट हुए और दोनों की स्क्रिप्ट एक ही जोड़ी, सलीम-जावेद ने लिखी थी. ये फिल्में थीं यादों की बारात और शान, जो आज भी हिंदी सिनेमा के मसाला दौर की मिसाल मानी जाती हैं.
यादों की बारात ने रखी मसाला फिल्मों की बुनियाद
आमिर खान के ताया नासिर हुसैन ने यादों की बारात बनाई थी, जिसे 70 के दशक की शुरुआती और सबसे बड़ी मसाला फिल्मों में गिना जाता है. फिल्म की कहानी सलीम-जावेद ने लिखी, जबकि निर्देशन और प्रोडक्शन नासिर हुसैन ने खुद संभाला. फिल्म में धर्मेंद्र, विजय अरोड़ा, तारिक खान और जीनत अमान लीड रोल में थे, जबकि मुख्य विलेन का किरदार अजीत ने निभाया था. तारिक खान आमिर खान के ममेरे भाई हैं, और फिल्म में आमिर ने खुद तारिक के किरदार का बचपन वाला रोल निभाया था.
फिल्म का संगीत आरडी बर्मन ने तैयार किया था, जो आज भी सदाबहार माना जाता है. फिल्म में कुल 6 गाने थे और मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे बोल कालजयी बन गए. गाना 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' फिल्म की पहचान बन गया, जिसे आशा भोसले और मोहम्मद रफी ने गाया था. दिलचस्प बात यह रही कि फिल्म का टाइटल ट्रैक दो दिग्गज गायकों, मोहम्मद रफी और किशोर कुमार ने मिलकर गाया.
'वक्त' की झलक और शाकाल का जन्म
सलीम-जावेद ने 1965 की फिल्म वक्त के कुछ तत्वों को नए तरीके से यादों की बारात में इस्तेमाल किया, इसी वजह से दोनों फिल्मों में कई समानताएं नजर आती हैं. दोनों में कहानी की शुरुआत में परिवार बिछड़ जाता है और आखिर में सब एक-दूसरे से मिल पाते हैं, यानी वही जाना-पहचाना 'खोया-पाया' फॉर्मूला. यादों की बारात में इस ढांचे के ऊपर बदले की कहानी भी जोड़ी गई थी. धर्मेंद्र का किरदार अपने पिता के कातिल का चेहरा कभी नहीं देख पाता और पूरी जिंदगी उसे ढूंढता रहता है. यह कातिल का रोल अजीत ने निभाया था और किरदार का नाम था 'शाकाल'. दिलचस्प यह है कि 1980 में आई शान में भी विलेन का नाम शाकाल ही रखा गया, जिस किरदार को कुलभूषण खरबंदा ने अमर कर दिया.
यादों की बारात ने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाया था और करीब 4.25 करोड़ का कलेक्शन किया, जिससे यह उस साल की दूसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी. 1973 का साल धर्मेंद्र के लिए बेहद खास साबित हुआ. दिलचस्प बात यह भी है कि इसी साल बॉलीवुड को अपना एंग्रीमैन अमिताभ बच्चन मिला, जिन्होंने आने वाले सालों में इंडस्ट्री पर लगभग एकतरफा राज किया.
शान को शोले से भी बड़ा बनाने की कोशिश
सलीम-जावेद ने बदले की कहानी पर एक और स्क्रिप्ट लिखी, जो बाद में शान बनी. इस फिल्म की अक्सर तुलना 1975 की ऑल टाइम ग्रेट फिल्म शोले से की जाती रही है. स्टारकास्ट, कहानी और विलेन तक में शोले जैसी झलक दिखती थी. आज इस फिल्म को कल्ट क्लासिक का दर्जा मिला हुआ है. फिल्म ने कई सुपरहिट फिल्मों से भी ज्यादा कमाई की, लेकिन फिर भी इसे फ्लॉप ही करार दिया गया. फिल्म रिलीज हुई तो इसके वीडियो कैसेट खरीदने के लिए शहरों में लोगों की भीड़ लग गई थी.
शोले की जबरदस्त कामयाबी के बाद दर्शकों को निर्देशक रमेश सिप्पी से वैसी ही किसी बड़ी फिल्म की उम्मीद थी. रमेश सिप्पी ने सलीम-जावेद से साफ कह दिया था कि कहानी हर लिहाज से शोले से भी बड़ी लिखी जाए. शान में सुनील दत्त, शशि कपूर, अमिताभ बच्चन, शत्रुघन सिन्हा, राखी गुलजार, परवीन बॉबी, बिंदिया गोस्वामी, जॉनी वॉकर और कुलभूषण खरबंदा जैसे कलाकार नजर आए. कुलभूषण खरबंदा ने शाकाल का रोल निभाया और इस किरदार को हमेशा के लिए यादगार बना दिया. जहां शोले की कहानी एक गांव में बसी थी, वहीं शान की कहानी शहर के इर्द-गिर्द बुनी गई थी.
दिसंबर 1980 में रिलीज, सबसे बड़ी उम्मीदों के साथ
शान दिसंबर 1980 में रिलीज हुई थी और इसमें अमिताभ बच्चन का अंदाज कहीं-कहीं शोले वाले किरदार जैसा ही झलकता था. फिल्म सबसे बड़े बजट, सबसे बड़ी स्टारकास्ट और सबसे बड़ी उम्मीदों के साथ सिनेमाघरों में पहुंची थी. कहानी बदले की थी, जिसमें अमिताभ बच्चन का किरदार अपने बड़े भाई के कत्ल का बदला लेता है. संगीत फिर आरडी बर्मन का ही था, इस बार कुल 7 गाने थे. गीतकार आनंद बख्शी के लिखे 'यम्मा यम्मा', 'प्यार करने वाले जीते हैं शान से' और 'जानू मेरी जान' जैसे गाने खूब पसंद किए गए.
फिल्म में शाकाल का अड्डा स्टेप होल्म नाम की जगह दिखाया गया था, जो ब्रिस्टल चैनल में स्थित एक छोटा-सा निर्जन ब्रिटिश द्वीप है और समरसेट, इंग्लैंड के तट से दूर पड़ता है. शान की एडिटिंग, कैमरा वर्क और संगीत बेहद शानदार था, लेकिन फिल्म में भावनात्मक जुड़ाव की कमी रह गई. दर्शकों को ऐसा कुछ नहीं मिला जिससे वे कहानी से दिल से जुड़ पाएं, और यही कमी फिल्म पर भारी पड़ गई. पहला हफ्ता हाउसफुल गया, लेकिन दूसरे हफ्ते में कलेक्शन तेजी से गिर गया. फिल्म का बजट करीब 4.25 करोड़ था और कलेक्शन भी लगभग इतना ही रहा, जिसके बाद फिल्म को औसत से कम करार दिया गया. महंगे सेट और बड़ी स्टारकास्ट के बावजूद फिल्म दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच नहीं पाई. हालांकि बाद में रिपीट रन में यह फिल्म बहुत कामयाब रही और 1980 में कमाई के लिहाज से यह पांचवें नंबर की फिल्म बनी.













