जहानाबाद में कृषि के आधुनिक तरीकों को अपनाना अब किसानों के लिए अनिवार्य हो गया है। एक दौर था जब खेती पूरी तरह से शारीरिक मेहनत और पशुओं पर आधारित थी, लेकिन वर्तमान समय में तकनीक ने मशीनों और रसायनों की भूमिका को प्रमुख बना दिया है। आज के समय में बंपर पैदावार के लिए खाद का उपयोग एक अनिवार्य प्रक्रिया बन चुकी है, जिसमें मुख्य रूप से डीएपी, यूरिया, पोटास और जिंक का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जाता है। खरीफ सीजन के दौरान धान की खेती के लिए इन पोषक तत्वों की भूमिका और भी अहम हो जाती है।
डीएपी खाद के प्रयोग में आम गलती
धान के खेतों में अक्सर किसान फसल की रोपाई के बाद डीएपी और यूरिया का छिड़काव करते हैं। यूरिया का उपयोग तो बाद में किया जा सकता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि धान की रोपाई के पश्चात डीएपी का उपयोग करना एक बड़ी तकनीकी भूल है। कई किसान इस वैज्ञानिक पहलू से अनजान हैं कि फसल लगाने के बाद डीएपी क्यों नहीं डालना चाहिए और इससे मिट्टी तथा पौधों को किस प्रकार का नुकसान होता है।
विशेषज्ञों की राय और वैज्ञानिक कारण
जहानाबाद के गंधार स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉक्टर निराला ने इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उनका कहना है कि बिहार भर के किसान अक्सर रोपाई के बाद डीएपी का प्रयोग करते हैं, जो पूरी तरह से अनुचित है। डीएपी एक ऐसा रासायनिक खाद है जिसे मिट्टी में घुलने के लिए पर्याप्त समय चाहिए होता है। यदि इसे फसल लगाने के बाद डाला जाता है, तो यह समय पर नहीं घुल पाता, जिससे पौधे को आवश्यक पोषक तत्व नहीं मिल पाते और खाद का पूरा प्रभाव नष्ट हो जाता है। इसके अतिरिक्त, मिट्टी के भीतर यह खाद एक कठोर परत यानी हार्ड लेयर का निर्माण करने लगता है।
जुताई के समय खाद का महत्व
डॉक्टर निराला के अनुसार, यदि किसान चाहते हैं कि उनकी फसल को एक बूस्टर डोज मिले और पैदावार में वृद्धि हो, तो उन्हें खाद डालने का समय बदलना होगा। जुताई के दौरान डीएपी का उपयोग करना सबसे प्रभावी तरीका है। जब खेत की जुताई की जाती है और कीचड़ तैयार किया जाता है, तो खाद मिट्टी के कणों के साथ समान रूप से मिल जाता है। इस प्रक्रिया से पोषक तत्व पौधे की जड़ों तक आसानी से पहुंचते हैं।
सही समय और सावधानियां
कृषि विशेषज्ञों ने जहानाबाद के किसानों से स्पष्ट रूप से अपील की है कि वे किसी भी फसल के लिए डीएपी का उपयोग रोपाई से 8 से 10 दिन पहले ही सुनिश्चित करें। इसके दो बड़े फायदे हैं: पहला, फसल को पर्याप्त पोषण मिलता है और दूसरा, यह मिट्टी में हार्ड लेयर बनाने से रोकता है। मिट्टी में कठोर परत न बनने से भूजल स्तर यानी ग्राउंड वाटर टेबल पर भी बुरा असर नहीं पड़ता है, जो पर्यावरण और भविष्य की सिंचाई के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।











