खुद का उद्यम खड़ा करने की योजना बना रहे लोगों के लिए जूते और चप्पल का निर्माण एक निरंतर मांग वाला विकल्प साबित हो सकता है। रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतों में शामिल होने के कारण इस उत्पाद की खपत हर मौसम और वर्ग में बनी रहती है। फुटवियर क्षेत्र में काम कर रहे जनार्दन कुमार के अनुसार, दैनिक जीवन में निरंतर इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं की बाजार में कभी कमी नहीं होती, जिससे इस काम में नियमित आमदनी की अच्छी संभावनाएं मौजूद रहती हैं।
काम शुरू करने के दो अलग-अलग रास्ते
इस कारोबार में कदम रखने के लिए निवेशक अपनी पूंजी के हिसाब से दो स्पष्ट रास्ते चुन सकते हैं। पहला रास्ता बड़े पैमाने पर विनिर्माण इकाई लगाने का है। यदि कोई उद्यमी कच्चे माल से लेकर अंतिम उत्पाद तक खुद तैयार करना चाहता है, तो इसके लिए एक पूरी फैक्ट्री स्थापित करनी होगी। ऐसी व्यापक विनिर्माण इकाई लगाने में लगभग 1 करोड़ रुपये का खर्च आता है, जहां मशीनों के जरिए शीट से कटाई, फिनिशिंग और पैकेजिंग का पूरा काम एक ही छत के नीचे होता है।
सीमित पूंजी में असेंबलिंग का किफायती मॉडल
जिन लोगों के पास बड़ा बजट नहीं है, उनके लिए दूसरा तरीका बेहद कम लागत में तैयार किया जा सकता है। महज 2 से 5 लाख रुपये की शुरुआती पूंजी के साथ असेंबलिंग का काम शुरू किया जा सकता है। इस तरीके में भारी मशीनरी खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि कच्ची चप्पल और फीते अलग से खरीदकर उन्हें केवल जोड़ना और तैयार करना होता है। इसके लिए कच्चा माल दिल्ली या कोलकाता के थोक बाजारों से मंगाया जा सकता है। इस हल्के मॉडल में भी लागत के मुकाबले अच्छा मार्जिन हासिल किया जा सकता है।
बाजार में प्रतिस्पर्धा और जरूरी दस्तावेज
कारोबार को कानूनी तौर पर शुरू करने के लिए कुछ आवश्यक कागजी औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं। उद्यम रजिस्ट्रेशन कराने के साथ-साथ जीएसटी नंबर लेना और अपने फुटवियर ब्रांड का नाम पंजीकृत कराना अनिवार्य है। क्षेत्र में पहले से मौजूद कड़े मुकाबले के बीच खुद को स्थापित करने के लिए उत्पाद की मजबूती और गुणवत्ता सबसे निर्णायक साबित होती है। बिहार में इसका एक बड़ा उपभोक्ता आधार है, जहां अकेले भागलपुर शहर के भीतर तिलकामांझी और सुजागंज बाजार जैसे प्रमुख व्यापारिक केंद्र तैयार माल की स्थानीय बिक्री के लिए मजबूत अवसर उपलब्ध कराते हैं।

















