बरसात का मौसम शुरू होते ही ग्रामीण इलाकों में पशुपालकों की चिंताएं बढ़ने लगती हैं। मानसून के दौरान गाय और भैंसों को कई तरह की गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ता है, जिनमें थनैला रोग पशुओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाता है। इस मौसम में पशुशालाओं के भीतर लगातार नमी बनी रहती है, और आसपास गंदगी तथा कीचड़ जमा हो जाता है, जिससे खतरनाक बैक्टीरिया और संक्रमण फैलने का खतरा काफी ज्यादा बढ़ जाता है। इस बीमारी की चपेट में आने पर पशुओं के थनों में तेज सूजन और असहनीय दर्द शुरू हो जाता है, जिसका सीधा असर उनके दूध देने की क्षमता और दूध की गुणवत्ता दोनों पर पड़ता है। कई मामलों में दूध के भीतर गांठें बनने लगती हैं और उसकी बनावट में अजीब बदलाव भी देखने को मिलते हैं।
थनैला रोग के शुरुआती लक्षण और पहचान
पशुओं में थनैला रोग की शुरुआत होने पर उनके थनों में साफ तौर पर सूजन और दर्द के लक्षण उभरने लगते हैं। जब कोई व्यक्ति इन हिस्सों को छूने की कोशिश करता है, तो पशु बेचैनी महसूस करता है और दर्द के कारण प्रतिक्रिया देता है। इसके साथ ही दुधारू पशुओं द्वारा दिया जाने वाला कुल दूध अचानक कम होने लगता है और दूध की क्वालिटी भी गिरने लगती है। पशुओं की देखभाल करने वालों को चाहिए कि वे दूध निकालते समय थनों की स्थिति और दूध के स्वरूप में आने वाले हर छोटे-बड़े बदलाव पर पैनी नजर बनाए रखें।
दूध में होने वाले असामान्य बदलाव
यदि दूध निकालते समय उसमें छोटी या बड़ी गांठें दिखाई दें, दूध पानी की तरह बेहद पतला हो जाए, उसके रंग में किसी प्रकार का बदलाव नजर आए या कोई अन्य असामान्य बात दिखे, तो इसे थनैला रोग का स्पष्ट संकेत मानना चाहिए। इस तरह के लक्षण नजर आते ही बिना किसी देरी के योग्य पशु चिकित्सक से संपर्क करके सलाह लेना अनिवार्य हो जाता है।
बचाव और साफ-सफाई के उपाय
इस खतरनाक संक्रमण से बचाव का सबसे असरदार तरीका यह है कि पशुशाला को पूरी तरह से साफ-सुथरा और सूखा रखा जाए। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि बारिश का पानी और कीचड़ किसी भी स्थिति में पशुओं के रहने के स्थान पर इकट्ठा न होने पाए। पशुओं के थनों को हमेशा साफ पानी से अच्छी तरह धोने के बाद कपड़े से सुखाना चाहिए। इसके अलावा, दूध निकालने की पूरी प्रक्रिया के दौरान साफ-सफाई के नियमों का कड़ाई से पालन करना बेहद जरूरी है।
दूध निकालते समय किन बातों का रखें ध्यान
पशुओं का दूध हमेशा पूरी तरह से साफ बर्तनों में ही निकालना चाहिए और ऐसा करते समय हाथों की स्वच्छता का भी पूरा ध्यान रखना आवश्यक है। मवेशियों को गंदे फर्श या ज्यादा गीली जगहों पर लंबे समय तक खड़ा न रहने दें। यदि किसी पशु के थन पर किसी प्रकार की चोट लग जाती है या कोई घाव बन जाता है, तो उस पर तुरंत ध्यान देना चाहिए क्योंकि खुले घाव के रास्ते संक्रमण शरीर में तेजी से फैल सकता है।
नियमित जांच और समय पर इलाज
पशुपालकों को बरसात के इन महीनों के दौरान अपने मवेशियों के थनों और उनके द्वारा दिए जाने वाले दूध की रोजाना नियमित जांच करते रहना चाहिए। अगर बीमारी के शुरुआती लक्षणों को समय रहते पहचान लिया जाए और तुरंत किसी अनुभवी पशु चिकित्सक से इलाज शुरू करवा दिया जाए, तो इस संक्रमण को गंभीर रूप लेने से आसानी से रोका जा सकता है। समय पर उपचार मिलने से पशु पूरी तरह स्वस्थ रहता है और उसके दूध के उत्पादन पर भी इसका न्यूनतम असर पड़ता है।



















