उत्तर प्रदेश ने कृषि के क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए मशरूम उत्पादन के मामले में पूरे देश में शीर्ष स्थान प्राप्त कर लिया है। पादप रोग वैज्ञानिक डॉ. ओंकार सिंह के अनुसार, एक समय ऐसा था जब हरियाणा और पंजाब इस क्षेत्र में सबसे आगे हुआ करते थे और बाद में बिहार ने भी इसमें अच्छी बढ़त बनाई थी। लेकिन अब इन सभी राज्यों को पीछे छोड़ते हुए उत्तर प्रदेश ने देश के कुल मशरूम उत्पादन में लगभग 14 प्रतिशत की हिस्सेदारी दर्ज करा दी है। इस बदलाव ने राज्य के किसानों के लिए आय के नए द्वार खोले हैं और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है।
गाजीपुर में एक दशक में मशरूम खेती का अभूतपूर्व विस्तार
राज्य के गाजीपुर जिले में मशरूम की खेती ने पिछले दस वर्षों के दौरान काफी तेजी से विस्तार किया है। कृषि विज्ञान केंद्र के पास उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, साल 2016 में इस जिले में केवल डेढ़ से दो क्विंटल मशरूम का उत्पादन होता था। वहीं, साल 2026 तक पहुंचते-पहुंचते यह आंकड़ा सीधे 250 से 300 क्विंटल तक जा पहुंचा है। इस प्रकार पिछले एक दशक में यहां उत्पादन में करीब 150 गुना की भारी वृद्धि देखने को मिली है, जो यह साबित करती है कि स्थानीय किसान अब इस मुनाफे वाली खेती को अपनाने में गहरी रुचि ले रहे हैं।
त्योहारों और आयोजनों में लगातार बढ़ रही है मांग
आज के समय में मशरूम केवल सीमित कृषि उपज तक ही सिमटकर नहीं रह गया है। स्थानीय स्तर पर मनाए जाने वाले त्योहारों, बड़े पारिवारिक समारोहों और अन्य मांगलिक आयोजनों के लिए व्यापारी और किसान सीधे कृषि विज्ञान केंद्र से मशरूम प्राप्त कर रहे हैं। इसकी लगातार बढ़ती हुई मांग ने किसानों के लिए इसे अतिरिक्त कमाई का एक बेहद मजबूत और भरोसेमंद विकल्प बना दिया है। डॉ. ओंकार सिंह का कहना है कि मशरूम को इसके पारंपरिक खाद्य मूल्य के साथ-साथ इसके खास पोषण संबंधी फायदों के कारण भी देखना चाहिए। इसमें भरपूर मात्रा में प्रोटीन और अन्य जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं, जिसके चलते इसे एक बेहतरीन संतुलित आहार का हिस्सा माना जाता है।
स्वास्थ्य लाभ और जरूरी सावधानियां
स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से मशरूम के सेवन को लेकर कई तरह के दावे किए जाते रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि इसके खाने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का जोखिम कुछ हद तक कम हो सकता है, हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है और पाचन तंत्र भी दुरुस्त रहता है। हालांकि, विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि किसी भी बीमारी के पुख्ता इलाज या उसकी रोकथाम के लिए केवल मशरूम पर ही पूरी तरह निर्भर रहना बिल्कुल सही नहीं है। इसके सभी स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव व्यक्ति की शारीरिक स्थिति, खाई जाने वाली मात्रा और उसकी संपूर्ण डाइट पर पूरी तरह निर्भर करते हैं।
प्रशिक्षण और भविष्य की नई रूपरेखा
कृषि विज्ञान केंद्र की तरफ से पिछले लगभग आठ वर्षों के दौरान करीब 400 से 500 लोगों को मशरूम उत्पादन का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा चुका है। इस ट्रेनिंग के माध्यम से किसानों और इस काम में दिलचस्पी रखने वाले अन्य लोगों को मशरूम उगाने की आधुनिक तकनीकों, उसकी सही देखभाल और इससे जुड़े हर बारीक पहलू की पूरी जानकारी सिखाई जाती है। डॉ. ओंकार सिंह का सुझाव है कि मशरूम के उत्पादन को और अधिक व्यवस्थित और व्यापक रूप देने के लिए एक विशेष टीम का गठन किया जाना चाहिए। उन्होंने बिहार के मखाना उत्पादन का उदाहरण देते हुए बताया कि जिस प्रकार मखाना की खेती और उसके प्रसंस्करण के लिए एक अलग विशेष व्यवस्था व टीम काम करती है, ठीक उसी तरह यदि मशरूम के लिए भी अलग से टीम बनाई जाए, तो इससे उत्पादन और किसानों की आमदनी में और भी ज्यादा इजाफा किया जा सकता है।



















