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मुक्त व्यापार समझौते के तहत भारत और न्यूजीलैंड के बीच खुला नया बाजार, जानें कब घटेंगे फलों के दामव्यापार
20 अक्तू॰ 2026, 5:51 am (2 घंटे पहले)· 0

मुक्त व्यापार समझौते के तहत भारत और न्यूजीलैंड के बीच खुला नया बाजार, जानें कब घटेंगे फलों के दाम

भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौता 20 अक्टूबर से प्रभावी हो गया है, जिसके तहत भारतीय निर्यातों को शुल्क मुक्त पहुंच मिलेगी, जबकि कीवी और सेब के आयात शुल्क में रियायत दूसरे साल से लागू होगी।

अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संबंधों को मजबूती देते हुए भारत और न्यूजीलैंड के बीच हुआ द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता 20 अक्टूबर से विधिवत रूप से प्रभावी हो गया है। इस समझौते के लागू होने से दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं के बीच वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान के लिए एक नया गलियारा तैयार हुआ है। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इस कदम को ऐतिहासिक बताते हुए स्पष्ट किया है कि इस समझौते की बदौलत न्यूजीलैंड को होने वाला शत-प्रतिशत भारतीय निर्यात पूरी तरह से सीमा शुल्क मुक्त हो जाएगा। इस व्यवस्था से भारत के कृषि क्षेत्र, विशेषकर फल, सब्जी और मसाला उत्पादकों को एक बड़ा विदेशी बाजार मिलने की उम्मीद है, साथ ही दोनों देशों में रोजगार और व्यापार के नए अवसरों का सृजन होगा।

फलों की कीमतों में कमी के लिए करना होगा इंतजार

व्यापार समझौते के लागू होते ही भारतीय बाजारों में न्यूजीलैंड के विश्व प्रसिद्ध सेब और कीवी के तुरंत सस्ते होने की उम्मीद कर रहे उपभोक्ताओं को फिलहाल थोड़ा धैर्य रखना होगा। समझौते की रूपरेखा और वाणिज्य मंत्रालय के दिशानिर्देशों के अनुसार, आम ग्राहकों को सस्ती दरों पर ये विदेशी फल मिलने में अभी कम से कम एक साल का वक्त लगेगा। विदेश व्यापार महानिदेशालय ने रियायती शुल्क पर आधारित कोटा आवंटन की जो प्रणाली तय की है, उसके तहत मौजूदा पहले वित्त वर्ष में सेब और कीवी दोनों के लिए कोई विशेष शुल्क छूट या कोटा निर्धारित नहीं किया गया है। इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि चालू कारोबारी वर्ष के दौरान इन फलों की खुदरा कीमतों में किसी बड़े बदलाव की गुंजाइश नहीं है।

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दूसरे साल से कीवी पर पूरी तरह समाप्त होगा सीमा शुल्क

आगामी वर्षों के लिए आयात नियमों में व्यापक बदलाव तय किए गए हैं। समझौते के दूसरे वर्ष से न्यूजीलैंड से आने वाले कीवी पर लागू होने वाला आयात शुल्क शून्य कर दिया जाएगा। इस शुल्क-मुक्त सुविधा का लाभ देने के लिए सरकार ने चरणबद्ध आयात सीमा तय की है। योजना के मुताबिक, दूसरे साल में 8,000 टन कीवी शुल्क-मुक्त मंगाया जा सकेगा। इसके बाद तीसरे साल यह कोटा 9,750 टन, चौथे साल 11,500 टन और पांचवें साल 13,250 टन निर्धारित रहेगा। छठे साल से इस सीमा को बढ़ाकर सालाना 15,000 टन कर दिया जाएगा। इस व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण शर्त भी जोड़ी गई है, जिसके अनुसार शुल्क छूट केवल उसी कीवी पर मिलेगी जिसका लागत, बीमा और माल ढुलाई मूल्य न्यूनतम 1.80 डॉलर प्रति किलोग्राम होगा। यह कदम दूसरे साल से बाजार में कीवी की आपूर्ति बढ़ाने के साथ-साथ खुदरा कीमतों को नीचे लाने में मददगार साबित होगा।

विदेशी सेब पर आयात शुल्क में होगी पचास प्रतिशत की कटौती

भारतीय फल बाजार में बेहद लोकप्रिय न्यूजीलैंड के सेबों को लेकर भी रियायतों का खाका तैयार कर लिया गया है। इस समय देश में विदेशी सेब के आयात पर 50 फीसदी का भारी सीमा शुल्क वसूला जाता है। मुक्त व्यापार समझौते की शर्तों के अनुसार, दूसरे वर्ष से इस शुल्क को घटाकर 25 फीसदी कर दिया जाएगा। हालांकि, घरेलू बाजार में सेब की अत्यधिक आमद को नियंत्रित करने के लिए एक सख्त कोटा प्रणाली बनाई गई है। दूसरे वर्ष के दौरान भारत केवल 35,000 टन सेब 25 फीसदी के रियायती शुल्क पर आयात करने की अनुमति देगा। इस कोटे में धीरे-धीरे बढ़ोतरी की जाएगी और छठे वर्ष तक यह मात्रा अधिकतम 45,000 टन प्रति वर्ष पहुंचेगी। शुल्क दर आधी होने से दूसरे साल से भारतीय बाजारों में प्रीमियम गुणवत्ता वाले सेब काफी किफायती दामों पर मिलने लगेंगे।

घरेलू बागवानों के हितों की सुरक्षा के लिए कड़े नियम

सस्ते विदेशी फलों के आने से भारत के स्थानीय किसानों और बागवानों को नुकसान न पहुंचे, इसके लिए सरकार ने पुख्ता रक्षात्मक उपाय किए हैं। विदेशी सेबों को अत्यधिक कम दरों पर भारतीय मंडियों में डंप होने से रोकने के उद्देश्य से सरकार ने न्यूनतम आयात मूल्य की सीमा निर्धारित की है। समझौते के तहत यह अनिवार्य किया गया है कि आयातित सेब का लागत, बीमा और माल ढुलाई मूल्य कम से कम 1.25 डॉलर प्रति किलोग्राम होना चाहिए। इस न्यूनतम मूल्य शर्त के कारण कोई भी विदेशी निर्यातक औने-पौने दामों पर सेब नहीं बेच पाएगा, जिससे कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के सेब उत्पादक किसानों की बाजार हिस्सेदारी और उनकी आय सुरक्षित रह सकेगी।

मानुका शहद और एल्ब्यूमिन के व्यापार में भी बड़ा बदलाव

यह द्विपक्षीय व्यापार समझौता केवल ताजे फलों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग से जुड़ी सामग्री को भी इसमें शामिल किया गया है। न्यूजीलैंड के प्रसिद्ध मानुका शहद के लिए पहले साल में 40 टन का सीमित कोटा आवंटित किया गया है, जिसे दूसरे साल से बढ़ाकर 200 टन सालाना कर दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त, प्रोटीन उत्पाद एल्ब्यूमिन के आयात पर 11 फीसदी का रियायती शुल्क तय किया गया है। एल्ब्यूमिन का आयात कोटा पहले साल 200 टन से शुरू होगा और अगले पांच वर्षों के दौरान इसे बढ़ाते हुए 3,000 टन प्रति वर्ष के स्तर तक पहुंचाया जाएगा। इन रियायतों से दोनों देशों के बीच प्रीमियम स्वास्थ्य उत्पादों का व्यापार भी एक नई रफ्तार पकड़ेगा।

सवाल-जवाब

भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौता कब से प्रभावी हुआ है?
यह मुक्त व्यापार समझौता 20 अक्टूबर से दोनों देशों में लागू हो गया है।
क्या इस समझौते के लागू होते ही न्यूजीलैंड के सेब और कीवी सस्ते हो जाएंगे?
नहीं, समझौते के पहले साल में इन फलों पर कोई रियायती कोटा नहीं है, इसलिए दाम कम होने के लिए दूसरे साल तक इंतजार करना होगा।
समझौते के दूसरे साल से कीवी पर कितना सीमा शुल्क लगेगा?
दूसरे साल से न्यूजीलैंड के कीवी पर आयात शुल्क पूरी तरह हटा दिया जाएगा और यह शून्य शुल्क पर उपलब्ध होगा।
दूसरे वर्ष में कितने टन कीवी और सेब रियायती दरों पर मंगाए जा सकेंगे?
दूसरे साल में 8,000 टन कीवी शुल्क-मुक्त और 35,000 टन सेब 25 प्रतिशत के रियायती शुल्क पर आयात करने की अनुमति होगी।
घरेलू सेब उत्पादकों को नुकसान से बचाने के लिए क्या नियम बनाया गया है?
आयातित सेब के लिए न्यूनतम 1.25 डॉलर प्रति किलोग्राम का लागत, बीमा और माल ढुलाई मूल्य तय किया गया है ताकि कोई सस्ते में माल न बेच सके।
न्यूजीलैंड के मानुका शहद और एल्ब्यूमिन के लिए क्या व्यवस्था की गई है?
मानुका शहद के लिए पहले साल 40 टन और आगे 200 टन का कोटा रहेगा, जबकि एल्ब्यूमिन पर 11 प्रतिशत रियायती शुल्क लगेगा।
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Gupta@rohan-gupta·1 घंटे पहले

कीवी पर 1.80 डॉलर प्रति किलो की न्यूनतम कीमत वाली शर्त बड़ी दिलचस्प है। यह बढ़िया है कि सस्ते के चक्कर में क्वालिटी से समझौता नहीं होगा।

Ravikash Gupta@ravikash·1 घंटे पहले

रोहन जी, बिल्कुल सही कहा आपने। पिछले साल जब मैं ऑकलैंड में था, तब वहाँ के बाग़ानों में किसानों से बात हुई थी, वे क्वालिटी को लेकर बहुत सख्त रहते हैं।

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