दाम कितने गिरे
कच्चे तेल के बाजार में 12 जून को तेज बिकवाली देखने को मिली। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 3.37 फीसदी की गिरावट के साथ 87.33 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि अमेरिकी बाजार का पैमाना माने जाने वाला WTI क्रूड 3.23 फीसदी फिसलकर 84.88 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ। अपने रिकॉर्ड ऊंचे स्तर से तुलना करें तो कीमतें करीब 20 फीसदी नीचे आ चुकी हैं।
भारतीय तेल कंपनियों के लिए इसका क्या मतलब
बाजार से जुड़े जानकारों का आकलन है कि दामों की इस नरमी का सबसे सीधा फायदा देश की तेल विपणन कंपनियों को होगा, क्योंकि सस्ता क्रूड खरीदने से उनका घाटा घटेगा और बैलेंस शीट पर दबाव कम होगा। हालांकि इसी आधार पर अगर कोई आम उपभोक्ता यह मान बैठे कि पेट्रोल और डीजल जल्द सस्ते हो जाएंगे, तो यह जल्दबाजी होगी। वजह साफ है — अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का मौजूदा भाव अब भी उस स्तर से काफी ऊपर है, जहां वह अमेरिका-ईरान टकराव शुरू होने से पहले था।
बिना शांति समझौते के गिरते दाम क्यों बड़ी बात है
गौर करने वाली बात यह है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अब तक न तो पूरी तरह खत्म हुआ है और न ही दोनों के बीच किसी तरह की सुलह हुई है। ऐसे में बिना किसी औपचारिक शांति समझौते के कीमतों का इस तरह नीचे आना बाजार के लिए एक मजबूत और सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
सप्लाई का संकट और राहत का रास्ता
इस पूरे टकराव की सबसे भारी मार समुद्री रास्तों से होने वाली क्रूड ऑयल की ढुलाई और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क पर पड़ी थी। तेल आपूर्ति के लिए सबसे अहम मार्ग माने जाने वाले स्ट्रैट ऑफ होर्मुज से होने वाली सप्लाई घटकर नाममात्र की रह गई थी। राहत की बात यह रही कि लाल सागर (Red Sea) के वैकल्पिक समुद्री रास्तों और अंतरराष्ट्रीय पाइपलाइनों के जरिए तेल पहुंचाया जाता रहा। इन्हीं सुरक्षित और नए विकल्पों के खुले रहने की वजह से दुनिया के बड़े देशों तक कच्चे तेल की आपूर्ति बनी रही।
गिरावट की दूसरी बड़ी वजह: सुस्त मांग
कीमतों में आई इस मंदी के पीछे केवल सप्लाई की चिंता घटना ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर मांग का कमजोर पड़ना भी एक बड़ा कारण है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि कमजोर आर्थिक गतिविधियों के चलते इस साल वैश्विक क्रूड की मांग में रोजाना 4,20,000 बैरल तक की गिरावट आ सकती है। लंबे समय तक ऊंचे बने रहे दामों और ईंधन की खपत घटाने के लिए सरकारों द्वारा उठाए गए कदमों ने भी मांग को दबाने का काम किया है।
आगे कीमतें किस ओर जाएंगी
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर वैश्विक आर्थिक विकास दर (Global Growth) में इसी तरह सुस्ती कायम रही, तो आने वाले समय में कच्चे तेल की मांग और प्रभावित होगी और ब्रेंट क्रूड के दाम मौजूदा स्तर से और नीचे लुढ़क सकते हैं। उनका अनुमान है कि अमेरिका और ईरान के बीच भले ही कोई समझौता न हो, फिर भी आने वाले हफ्तों में ब्रेंट का भाव गिरकर 75 से 85 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में आ सकता है।
एक जोखिम भी बना हुआ है
दूसरी तरफ, यह संभावना भी पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती कि अगर भविष्य में अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा टकराव भड़क उठा, तो कच्चे तेल की कीमतों में फिर से जोरदार उछाल आ सकता है। फिलहाल क्रूड के 87 डॉलर के करीब आने से भारतीय तेल कंपनियों पर दबाव जरूर कुछ हल्का हुआ है।













