जरा सोचिए, दुनिया के सबसे बड़े तेल बेचने वाले देश अगर आपस में भिड़ जाएं, समुद्री रास्ते बंद होने लगें और कच्चे तेल के दाम रोज नया रिकॉर्ड बनाने लगें, तो क्या होगा? कुछ साल पहले तक ऐसी एक भी खबर भारत की नींद उड़ाने के लिए काफी थी। तुरंत पेट्रोल और डीजल के महंगे होने का डर बैठ जाता था, रुपये पर दबाव दिखने लगता था और शेयर बाजार में हड़बड़ी मच जाती थी। लेकिन आज हालात एकदम बदले हुए हैं। दुनिया में तनाव अब भी है और तेल की कीमतों को लेकर अनिश्चितता भी बरकरार है, फिर भी भारत उतना घबराया हुआ नहीं दिखता। इसकी सीधी वजह यह है कि बीते कुछ वर्षों में देश ने बिना शोर मचाए ऐसी तैयारी कर ली है, जिसने बड़े से बड़े वैश्विक झटके की मार को काफी हल्का कर दिया है। यही कारण है कि जानकार अब भारत को पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित स्थिति में मानने लगे हैं।
सीनियर इकोनॉमिस्ट मिताली निकोरे का कहना है कि सरकार ने संकट के दरवाजे पर आने का इंतजार नहीं किया। उसने पहले से ही ऐसी रणनीति तैयार की, जिससे ईंधन की कीमतों की चोट आम आदमी और अर्थव्यवस्था दोनों पर कम से कम पड़े। उनके मुताबिक भारत अब सिर्फ किस्मत के सहारे नहीं, बल्कि पक्की तैयारी के दम पर आगे बढ़ रहा है।
एक ही देश पर टिके रहने की आदत छोड़ी
पहले भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा गिने चुने खाड़ी देशों से खरीदता था और यही सबसे बड़ी कमजोरी थी। वहां जरा सी हलचल होते ही पूरी सप्लाई खतरे में पड़ जाती थी। रूस और यूक्रेन के बीच जंग छिड़ने के बाद भारत ने अपना पूरा गणित बदल दिया। देश ने रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने की राह पकड़ी और इसका असर आंकड़ों में साफ दिखता है। हाल के महीनों में भारत के कुल कच्चे तेल आयात का करीब 40 से 45 फीसदी हिस्सा अकेले रूस से आया है। इसके साथ ही यूएई, इराक, सऊदी अरब, अमेरिका और अफ्रीकी देशों से भी लगातार तेल मंगाया जा रहा है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि अब भारत किसी एक सप्लायर की मर्जी पर नहीं टिका है। एक दरवाजा बंद हो तो दूसरा खुला रहता है।
पश्चिम एशिया में जब भी तनाव बढ़ता है, तो सबसे ज्यादा फिक्र स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की होती है, क्योंकि तेल का बड़ा हिस्सा इसी संकरे रास्ते से आता है। इस जोखिम को घटाने के लिए भारत ने ओमान और यूएई के बंदरगाहों के साथ तालमेल बढ़ाया है। इससे सप्लाई चेन पहले के मुकाबले ज्यादा लचीली हो गई है और किसी एक समुद्री रास्ते पर पूरी निर्भरता खत्म होती जा रही है।
डॉलर की पकड़ ढीली करने की कोशिश
दुनिया में जैसे ही संकट गहराता है, अमेरिकी डॉलर अक्सर मजबूत हो जाता है और इसका सीधा नुकसान तेल खरीदने वाले देशों को उठाना पड़ता है, क्योंकि उनकी लागत बढ़ जाती है। भारत ने इस मुश्किल का भी तोड़ तलाशना शुरू किया। रूस, यूएई और कुछ दूसरे देशों के साथ स्थानीय मुद्रा में कारोबार को आगे बढ़ाया गया। इसका नतीजा यह है कि हर लेनदेन के लिए डॉलर की जरूरत धीरे धीरे कम होती जा रही है, जिससे बाहरी झटकों की मार भी घटती है।
देश के भीतर तेल की अपनी तिजोरी
भारत ने अपने यहां रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी खड़ा किया है। आसान भाषा में कहें तो यह देश के लिए आपातकाल में काम आने वाली तेल की तिजोरी है। अगर किसी वजह से कुछ समय के लिए दुनिया की सप्लाई अटक जाए, तो इसी भंडार से जरूरत पूरी की जा सकती है। इसका फायदा यह है कि अचानक आने वाले किसी संकट की चोट कुछ हद तक संभल जाती है और घबराने की नौबत नहीं आती।
अब सिर्फ तेल नहीं, नई ऊर्जा पर भी दांव
भारत लगातार इलेक्ट्रिक वाहनों, इथेनॉल मिश्रण और सौर ऊर्जा पर निवेश बढ़ा रहा है। पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से कच्चे तेल की खपत घटती है और देश में औसत इथेनॉल ब्लेंडिंग करीब 20 फीसदी तक पहुंच चुकी है। सरकार का मानना है कि इससे कच्चे तेल का आयात कम होगा और हर साल हजारों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचाने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही सौर ऊर्जा और दूसरी स्वच्छ ऊर्जा की परियोजनाएं भी तेजी से रफ्तार पकड़ रही हैं। इसका असर आने वाले वर्षों में यह होगा कि बाहर से मंगाए जाने वाले तेल पर देश की निर्भरता धीरे धीरे घटती जाएगी।
विदेशी मुद्रा भंडार बना सबसे बड़ा कवच
भारत की सबसे मजबूत ताकतों में से एक उसका विदेशी मुद्रा भंडार है। भारतीय रिजर्व बैंक के पास जून की शुरुआत में करीब 682 अरब डॉलर, यानी करीब 58 लाख करोड़ रुपये का विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद था। यह रकम करीब 11 महीने के आयात का खर्च उठाने के लिए पर्याप्त मानी जाती है। मुश्किल वक्त में यही पैसा रुपये को सहारा देता है और जरूरत पड़ने पर देश को तेल समेत बाकी जरूरी सामान खरीदने की ताकत देता है।
घरेलू निवेशकों ने दी नई मजबूती
कुछ साल पहले तक जैसे ही विदेशी निवेशक पैसा निकालते थे, शेयर बाजार धड़ाम से गिर जाता था। अब यह तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। आज देश में 1.1 करोड़ से ज्यादा सक्रिय एसआईपी खाते चल रहे हैं और हर महीने म्यूचुअल फंड में 25,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का एसआईपी निवेश आ रहा है। यही वजह है कि विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बावजूद बाजार को घरेलू निवेशकों का मजबूत कंधा मिल जाता है और गिरावट उतनी गहरी नहीं होती।
तो क्या अब भारत पर कोई असर नहीं होगा?
ऐसा बिल्कुल नहीं है कि वैश्विक संकट का भारत पर कोई असर ही नहीं पड़ेगा। अगर तेल की कीमतें बहुत लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं या सप्लाई पूरी तरह ठप हो जाती है, तो इसकी आंच भारत तक भी पहुंचेगी। फर्क बस इतना है कि आज देश के पास पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा विकल्प हैं। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार है, तेल खरीदने के कई रास्ते हैं, घरेलू निवेशकों का भरोसा है और ऊर्जा के नए विकल्प भी तेजी से पांव पसार रहे हैं। यही सब मिलकर भारत को वैश्विक उथल पुथल के दौर में भी पहले से कहीं ज्यादा संभली हुई स्थिति में खड़ा कर देते हैं।











