पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ रहे भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक अस्थिरता के बीच भारत के लिए पेट्रोलियम उत्पादों और उर्वरकों की सुचारू आपूर्ति सुनिश्चित करना एक बेहद जटिल चुनौती बन गया था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भारी उछाल आने की गंभीर आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं, जिससे घरेलू बाजार में महंगाई बढ़ने का सीधा खतरा मंडरा रहा था। इस विपरीत परिस्थिति के बावजूद भारत सरकार ने समय रहते रणनीतिक कदम उठाए और घरेलू उपभोक्ताओं को इस वैश्विक संकट की तपिश से पूरी तरह सुरक्षित रखा। एक कार्यक्रम के दौरान इस विषय पर विस्तार से चर्चा करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया कि आखिर सरकार ने इस संकट काल में भी कीमतों को नियंत्रण से बाहर क्यों नहीं होने दिया और देश की अर्थव्यवस्था को वैश्विक झटकों से कैसे बचाए रखा।
रणनीतिक वित्तीय योजना और बजट की मजबूती
कार्यक्रम के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने देश के आर्थिक परिदृश्य को लेकर सकारात्मक भरोसा जताया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकार को आगामी वित्त वर्ष 2026-27 के लिए तैयार किए गए बजट में किसी भी तरह के बड़े फेरबदल या संशोधन करने की कोई जरूरत नहीं है। वित्त मंत्री ने बताया कि बजट तैयार करने की प्रक्रिया के दौरान ही सरकार ने अपनी वित्तीय योजनाओं में पहले से कुछ विशेष बजटीय गुंजाइश (वित्तीय सुरक्षा कवच) का प्रावधान कर रखा था। यह दूरदर्शी कदम इसलिए उठाया गया था ताकि यदि भविष्य में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां अचानक बिगड़ती हैं, तो उनका सुगमता से मुकाबला किया जा सके। उदाहरण के तौर पर, युद्धग्रस्त समुद्री क्षेत्रों से गुजरने वाले मालवाहक जहाजों के बीमा प्रीमियम में होने वाली भारी बढ़ोतरी जैसे अतिरिक्त खर्चों को भी सरकार ने अपने इन्हीं आंतरिक वित्तीय बफ़र्स की मदद से संभाला। यही वजह रही कि वैश्विक बाजार में कीमतों में उछाल आने के बाद भी उसका प्रत्यक्ष बोझ भारत के आम उपभोक्ताओं के ऊपर नहीं आने दिया गया।
महंगाई नियंत्रण और घरेलू चुनौतियों का आकलन
महंगाई के कारणों का विश्लेषण करते हुए वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि मूल्य वृद्धि के लिए केवल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां या बाहरी कारक ही पूरी तरह से जिम्मेदार नहीं होते हैं। उन्होंने देश के भीतर उत्पन्न होने वाले घरेलू जोखिमों का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, कमजोर मानसून और अल नीनो मौसमी प्रणाली का प्रभाव भी देश में खाद्य कीमतों को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यदि मानसूनी वर्षा सामान्य स्तर से काफी नीचे रहती है, तो इसका सीधा असर फसलों के उत्पादन पर पड़ेगा। कृषि पैदावार में कमी आने की स्थिति में खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा काफी हद तक बढ़ जाता है। सरकार इन सभी मौसमी और प्राकृतिक बदलावों से जुड़ी परिस्थितियों पर निरंतर और बेहद सतर्कता से अपनी नजर बनाए हुए है ताकि जरूरत पड़ने पर बाजार में हस्तक्षेप किया जा सके।
मजबूत आर्थिक बुनियादी ढांचा और विकास अनुमान
तमाम वैश्विक बाधाओं के बावजूद, वित्त मंत्री ने भारत की आर्थिक विकास यात्रा को लेकर गहरी प्रतिबद्धता और विश्वास व्यक्त किया। उन्होंने कई मजबूत आर्थिक संकेतकों का उल्लेख किया जो देश की मजबूत आर्थिक गतिविधियों को प्रदर्शित करते हैं। हाल के महीनों में देश के भीतर लगातार बेहतर हो रहे GST कलेक्शन से यह साफ झलकता है कि बाजार में घरेलू मांग और व्यापारिक गतिविधियां लगातार गति पकड़ रही हैं। इसके साथ ही, निर्मला सीतारमण ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी किए गए ताजा आर्थिक अनुमानों का भी विशेष रूप से हवाला दिया। वैश्विक सप्लाई चेन में जारी व्यवधानों और कमजोर मानसून की आशंकाओं के बावजूद, देश के केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए 6.6 प्रतिशत की मजबूत विकास दर का अनुमान जताया है, जो देश के आर्थिक लचीलेपन की पुष्टि करता है।
सरकारी खजाने पर सब्सिडी का बढ़ता वित्तीय दायित्व
पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक अस्थिरता का सीधा असर सरकार के व्यय और बजटीय प्राथमिकताओं पर भी पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूरिया, DAP और प्राकृतिक गैस जैसी आवश्यक कृषि इनपुट्स की कीमतों में तेजी आने की वजह से उर्वरक सब्सिडी पर होने वाला सरकारी खर्च बढ़ने की पूरी संभावना है। हालांकि सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के मूल बजट में उर्वरक सब्सिडी के मद में लगभग 1.71 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए थे, लेकिन वैश्विक कीमतों में आए उछाल को देखते हुए अब इस मद में वास्तविक खर्च इससे काफी अधिक हो सकता है। इसी तरह, देश में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को स्थिर रखकर आम जनता को राहत प्रदान करने के उद्देश्य से सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों को करीब 1.23 लाख करोड़ रुपये की बड़ी वित्तीय सहायता दी है। इसके अलावा, आम उपभोक्ताओं को मिलने वाली LPG सब्सिडी पर होने वाला कुल सरकारी खर्च भी शुरुआती बजटीय अनुमानों की तुलना में काफी ज्यादा रहने का अनुमान व्यक्त किया गया है।


















