आईआईटी बॉम्बे में एक युवा छात्र की दुखद मौत के बाद संस्थान के भीतर उपजा तनाव अब सोशल मीडिया के खुले मैदान में तीखी बहस का रूप ले चुका है. परिसर में अकादमिक स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और शिक्षकों की एकजुटता को लेकर उठे गंभीर सवालों के बीच समाजशास्त्र के प्रोफेसर सूर्यकांत वाघमोरे लगातार ऑनलाइन हमलों और ट्रोलिंग के केंद्र में आ गए. डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कुछ उपयोगकर्ताओं द्वारा उन पर अनुचित आरोप लगाते हुए 'नक्सली' तक कह दिया गया. आमतौर पर ऐसी परिस्थितियों में लोग व्यक्तिगत स्पष्टीकरण जारी करते हैं या कानूनी कदम उठाने पर विचार करते हैं, लेकिन प्रोफेसर वाघमोरे ने इस पूरे विवाद का मुकाबला करने के लिए एक बिल्कुल अनूठा और तकनीकी तरीका चुना.
ऑनलाइन लगाए जा रहे मनगढ़ंत आरोपों और व्यक्तिगत आक्षेपों का जवाब देने के लिए उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित चैटबॉट ग्रोक का सहारा लिया. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सार्वजनिक रूप से किए गए इस संवाद में उन्होंने चैटबॉट से अपनी पृष्ठभूमि और तकनीकी संस्थान में समाजशास्त्र की प्रासंगिकता पर बात रखने को कहा. तकनीक के इस त्वरित इस्तेमाल से न केवल उनके पक्ष में तथ्यात्मक रिकॉर्ड सामने आया, बल्कि बिना किसी व्यक्तिगत तकरार के पूरी चर्चा को अकादमिक धरातल पर खड़ा कर दिया गया.
एआई चैटबॉट से सवाल और तथ्यात्मक प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया पर जब हमलों का दायरा बढ़ा और एक तकनीकी विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र पढ़ाने को लेकर प्रोफेसर की मौजूदगी पर ताने मारे जाने लगे, तब प्रोफेसर वाघमोरे ने ग्रोक को संबोधित करते हुए एक सीधा सवाल पूछा. उन्होंने लिखा कि वह समाजशास्त्र के प्रोफेसर सूर्यकांत वाघमोरे हैं और एक भीड़ उन्हें बिना वजह नक्सल कहकर तकनीकी संस्थान में उनके औचित्य पर सवाल उठा रही है, ऐसे में क्या चैटबॉट उन्हें सही उत्तर दे सकता है.
इस सवाल का विश्लेषण करते हुए ग्रोक ने तुरंत स्पष्ट किया कि प्रोफेसर वाघमोरे का किसी भी तरह की हिंसक या नक्सली गतिविधि अथवा संगठन से कोई जुड़ाव नहीं है. चैटबॉट ने तथ्यों के आधार पर रेखांकित किया कि वैचारिक मतभेद रखने वाले अकादमिक विद्वानों को इस तरह के ठप्पे लगाना एक राजनीतिक चाल का हिस्सा होता है. इसके साथ ही संवाद में यह भी समझाया गया कि आईआईटी जैसे उच्च तकनीकी संस्थानों में तकनीकी कौशल के साथ-साथ समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र और मानवीय मूल्यों की शिक्षा कितनी अनिवार्य भूमिका निभाती है, ताकि बेहतर समाज का निर्माण हो सके.
अकादमिक साख और शोध कार्यों पर स्पष्टीकरण
जब कुछ अन्य इंटरनेट उपयोगकर्ताओं ने प्रोफेसर वाघमोरे की शैक्षणिक योग्यता और उनके रिसर्च पेपर के स्तर पर संदेह व्यक्त किया, तब भी डिजिटल मंच पर आंकड़ों और रिकॉर्ड ने पूरी स्थिति साफ कर दी. एआई सिस्टम ने प्रोफेसर द्वारा लिखी गई प्रमुख पुस्तकों, प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके आलेखों और वैश्विक मंचों पर उनके अकादमिक योगदान की विस्तृत सूची सामने रख दी. इन ठोस और अकादमिक तथ्यों के सामने आते ही प्रोफेसर वाघमोरे ने बेहद संक्षिप्त टिप्पणी करते हुए 'डन... डस्टेड' लिखा, जिसकी चर्चा पूरे अकादमिक जगत में हो रही है.
विवाद की पृष्ठभूमि और 18 सितंबर की घटना
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत 18 सितंबर को हुई थी, जब आईआईटी बॉम्बे के बीटेक द्वितीय वर्ष के छात्र साहिल वाकोडे का शव उनके हॉस्टल के कमरे में मिला. छात्र की आत्महत्या की खबर फैलते ही पूरे परिसर में शोक और आक्रोश की लहर दौड़ गई. प्रारंभिक सूचनाओं के अनुसार, परीक्षा हॉल के दौरान प्रोफेसर सूर्यनारायण डुल्ला ने साहिल को कथित तौर पर चैटजीपीटी का उपयोग करते हुए पकड़ा था. इस घटना के कुछ ही घंटों बाद छात्र ने यह अप्रत्याशित और खौफनाक कदम उठा लिया था.
मृतक छात्र साहिल के परिजनों ने संस्थान के माहौल और व्यवस्था पर अत्यंत गंभीर आरोप लगाए. परिवार का कहना था कि साहिल लंबे समय से जातिगत भेदभाव, लगातार मानसिक दबाव और अपमानजनक टिप्पणियों से जूझ रहा था. परिजनों की औपचारिक शिकायत के आधार पर पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए प्रोफेसर सूर्यनारायण डुल्ला के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज की. परिसर में बढ़ते तनाव और प्रदर्शनों को देखते हुए आईआईटी बॉम्बे प्रशासन ने आरोपी प्रोफेसर को जांच पूरी होने तक अवकाश पर भेज दिया और घटना की तह तक जाने के लिए एक उच्च स्तरीय जांच समिति गठित कर दी.
फैकल्टी फोरम का रुख और मतभेद
मामले में नया मोड़ तब आया जब संस्थान का फैकल्टी फोरम खुलकर अपने सहयोगी प्रोफेसर सूर्यनारायण डुल्ला के समर्थन में सामने आ गया. फोरम का तर्क था कि शिक्षक केवल परीक्षा नियमों का पालन करवा रहे थे और अपनी आधिकारिक ड्यूटी कर रहे थे, जबकि सोशल मीडिया पर उन्हें बिना जांच के दोषी ठहराया जा रहा है. इस रुख का समर्थन आईआईटी दिल्ली और आईआईटी मद्रास जैसे अन्य प्रमुख तकनीकी संस्थानों के भी कुछ शिक्षकों ने किया.
हालांकि, प्रोफेसर सूर्यकांत वाघमोरे ने अपने ही सहयोगियों के इस संगठित कदम का पुरजोर विरोध किया. उन्होंने स्पष्ट राय रखी कि फैकल्टी फोरम कोई न्यायिक संस्था या अदालत नहीं है, जिसे किसी भी जांच को प्रभावित करने या आरोपी को क्लीन चिट देने का अधिकार हो. उन्होंने जोर देकर कहा कि इस प्रकार का सार्वजनिक समर्थन गठित जांच समिति पर अनावश्यक दबाव बनाने की कोशिश है और यह पूरे संस्थान के सभी शिक्षकों का साझा मत नहीं हो सकता. अपने इसी कड़े और स्पष्ट रुख के बाद वह सोशल मीडिया पर एक वर्ग के निशाने पर आ गए थे.



















