आधुनिक जीवनशैली में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मौजूदगी दिनचर्या की सामान्य गतिविधियों से लेकर जटिल तकनीकी प्रोजेक्ट्स तक बहुत गहरी हो चुकी है. आज की नई पीढ़ी भी इस डिजिटल बदलाव का सीधा हिस्सा बन चुकी है, जहां किसी भी शंका या सवाल का समाधान पलक झपकते ही ऑनलाइन टूल्स के जरिए मिल जाता है. चाहे स्कूली विषयों का अध्ययन हो या कोडिंग की जटिलताएं, एआई आधारित टूल्स बच्चों की उंगलियों के इशारे पर उपलब्ध रहते हैं. इस स्थिति ने अभिभावकों के सामने एक नया विचार खड़ा किया है कि क्या तेजी से सुलभ होती तकनीक बच्चों को एक संवेदनशील और बेहतर इंसान बनाने में भी सक्षम है. क्या डिजिटल स्क्रीन और स्वचालित प्रणालियां कभी उस स्वाभाविक माहौल की बराबरी कर सकती हैं, जो बच्चे अपने सहपाठियों के बीच क्लासरूम में रहकर हासिल करते हैं.
डिजिटल साधनों के विस्तार के चलते कुछ अभिभावकों के मन में यह असमंजस पैदा होने लगा है कि जब घर पर ही उन्नत सॉफ्टवेयर की मदद से पढ़ाई संभव है, तो बच्चों को नियमित स्कूल भेजने की क्या आवश्यकता है. हालांकि शिक्षाविदों के अनुसार, सीखने की प्रक्रिया महज पाठ्यपुस्तकों को पढ़कर परीक्षा में अंक हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का सलीका सीखने का माध्यम है. संस्कृति ग्रुप ऑफ स्कूल्स के ट्रस्टी प्रणीत मुंगाली का दृष्टिकोण है कि आधुनिक तकनीक काम को आसान बना सकती है, लेकिन सहानुभूति, नैतिकता और मानवीय संवेदनाएं जगाने का कार्य केवल स्कूल का परिसर और शिक्षक ही कर सकते हैं. यही कारण है कि उन्नत तकनीक के दौर में भी विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण के लिए स्कूल का वातावरण अनिवार्य माना जाता है.
स्क्रीन पर नहीं मिल सकते जीवन के व्यावहारिक सबक
स्कूल की कक्षाओं में विद्यार्थी केवल किताबों के पन्ने नहीं पलटते, बल्कि सामाजिक जीवन के व्यावहारिक नियम सीखते हैं. भारत की प्राचीन परंपरा यह बताती रही है कि वास्तविक ज्ञान केवल जानकारियों का संचय नहीं है, बल्कि उस ज्ञान को आचरण में ढालना ही असली सीख है. आधुनिक एल्गोरिदम और एआई के पास दुनिया भर का डाटा भंडार हो सकता है, परंतु उनमें इंसानी भावनाओं और अनुभूतियों का पूरी तरह अभाव होता है. क्लासरूम के अंदर एक शिक्षक अपने छात्रों के साथ व्यक्तिगत और भावनात्मक जुड़ाव स्थापित करता है. शिक्षक बच्चों को सिखाते हैं कि समाज में किस तरह पेश आना चाहिए, अपने से बड़ों का सम्मान कैसे करना है और अपने से छोटों के प्रति स्नेह का भाव कैसे रखना है. यह व्यावहारिक सामाजिक बोध किसी डिजिटल डिवाइस या सॉफ्टवेयर में डाउनलोड नहीं किया जा सकता, बल्कि यह स्कूल के स्वाभाविक परिवेश और साथियों के बीच रहकर ही विकसित होता है.
सामूहिक सहयोग, नेतृत्व और वास्तविक दुनिया के रिश्ते
अत्यधिक समय तक डिजिटल उपकरणों और एआई प्लेटफॉर्म्स में व्यस्त रहने से बच्चों में अकेलेपन और शारीरिक रूप से निष्क्रिय रहने की आशंका बढ़ जाती है. इसके विपरीत, स्कूल का परिवेश बच्चों को साथ मिलकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है. खेल के मैदान में दौड़ते समय, वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी के दौरान अथवा किसी सामूहिक प्रोजेक्ट पर साथ काम करते हुए बच्चों के भीतर स्वाभाविक नेतृत्व क्षमता निखरती है. वे अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना सीखते हैं, सहपाठियों की भावनाओं का आदर करते हैं और सामूहिक तालमेल की अहमियत समझते हैं. यह आत्मबल और प्रतिकूल परिस्थितियों में धैर्य रखने की क्षमता किसी कोडिंग या एल्गोरिदम से नहीं आती, बल्कि वास्तविक जीवन की रोजमर्रा की चुनौतियों का सामना करने से उपजती है.
नई शिक्षा नीति 2020 और तकनीक का संतुलित उपयोग
शिक्षा में मानवीय तत्वों की महत्ता रेखांकित करने का अर्थ यह कतई नहीं है कि आधुनिक तकनीक से दूरी बना ली जाए. नई शिक्षा नीति 2020 भी यह मार्गदर्शन देती है कि एआई और आधुनिक डिजिटल माध्यमों का उपयोग शिक्षा को अधिक सुलभ बनाने के लिए किया जाए, ताकि देश के दूरदराज इलाकों में रहने वाले बच्चों अथवा दिव्यांग विद्यार्थियों तक गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री पहुंच सके. तकनीक एक अत्यंत उपयोगी साधन की भूमिका निभा सकती है, परंतु उसे मार्गदर्शक या अंतिम स्वामी नहीं माना जा सकता. यदि मनुष्य सोचने और निर्णय लेने के लिए पूरी तरह डिजिटल साधनों पर निर्भर हो गया, तो मौलिक चिंतन और रचनात्मक क्षमता धीरे-धीरे क्षीण हो सकती है. इसलिए आवश्यक है कि तकनीक को एक मददगार साधन के रूप में अपनाया जाए, लेकिन बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए स्कूली माहौल और मानवीय मूल्यों की अहमियत को सर्वोपरि रखा जाए.



















