गंभीर दुर्घटनाओं के बाद हड्डियों का टूटना या रीढ़ की हड्डी में चोट लगने से अंगों का पक्षाघात होना चिकित्सा विज्ञान के लिए हमेशा से जटिल चुनौतियां रही हैं। पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में हड्डियों को सहारा देने के लिए सख्त धातु या प्लास्टिक की रॉड लगाई जाती हैं, जबकि तंत्रिका तंत्र से जुड़े विकारों के लिए दिमाग में कड़े सिलिकॉन चिप्स लगाने के प्रयोग किए जा रहे हैं। इन पारंपरिक तरीकों की सबसे बड़ी कमी यह रही है कि ये बेजान कृत्रिम संरचनाएं जीवित मानव ऊतकों की तरह समय के साथ विकसित या रूपांतरित नहीं हो पाती हैं। इस गतिरोध को तोड़ने की दिशा में चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के विशेषज्ञों ने तरल धातु यानी लिक्विड मेटल से युक्त एक खास लाइफलाइक हाइड्रोजेल तैयार किया है। यह सामग्री जीवित जैविक संरचनाओं की तरह खुद-ब-खुद अपने स्वरूप को ढालने में सक्षम पाई गई है।
जीवित कोशिकाओं की नकल करता नया हाइड्रोजेल और इसकी तकनीक
सामान्य तौर पर इस्तेमाल होने वाले सिंथेटिक पॉलीमर, प्लास्टिक या मेटल बिना बाहरी दबाव, अत्यधिक तापमान या यांत्रिक बल के अपना आकार नहीं बदल सकते। इसके विपरीत प्राकृतिक मानव शरीर में विकास की गति अत्यंत सहज और क्रमिक होती है। चोट लगने पर घाव का भरना अथवा भ्रूण के विकास के दौरान अंगों का निर्माण बहुत धीमी और स्वतः स्फूर्त जैविक प्रक्रिया के तहत होता है। वैज्ञानिकों ने शरीर की इसी प्राकृतिक प्रक्रिया का अनुकरण करते हुए एक नई प्रणाली तैयार की है जिसे स्पैटियोटेंपोरली इवॉल्विंग रिएक्टिव स्पीशीज यानी STERS नाम दिया गया है।
इस पूरे तकनीकी विकास के मूल में गैलियम धातु के अत्यंत सूक्ष्म तरल कण मौजूद हैं। शोधकर्ताओं ने इस हाइड्रोजेल के आंतरिक ढांचे में गैलियम आधारित लिक्विड मेटल कणों का समावेश किया है। इन कणों को सक्रिय करने के लिए नियर-इन्फ्रारेड प्रकाश की किरणों का इस्तेमाल किया जाता है। जैसे ही प्रकाश इस संरचना पर पड़ता है, लिक्विड मेटल के भीतर एक विशेष रासायनिक अभिक्रिया आरंभ हो जाती है।
लगातार चार हफ्तों तक चलने वाली रासायनिक प्रक्रिया
इस नई सामग्री की सबसे अनूठी विशेषता इसकी दीर्घकालिक स्वतः-सक्रियता है। परीक्षणों में यह देखा गया कि इस हाइड्रोजेल को कार्यशील रखने के लिए लगातार प्रकाश डालते रहने की आवश्यकता नहीं होती। एक बार नियर-इन्फ्रारेड प्रकाश से सक्रिय होने के पश्चात यह अभिक्रिया लगभग 28 दिनों यानी पूरे चार हफ्तों तक निरंतर चलती रहती है।
इस समयावधि के दौरान लिक्विड मेटल की बाहरी सतह क्रमिक रूप से ऑक्सीडाइज होती है। जैसे ही पुरानी सतह की परत हटती है, उसके नीचे की नई धातु उजागर होती जाती है। यह चक्र बिना किसी बाहरी मानवीय हस्तक्षेप या अतिरिक्त यांत्रिक बल के चलता रहता है, जिससे हाइड्रोजेल की आंतरिक संरचना और बाहरी आकार धीरे-धीरे स्वयं बदलता रहता है। इस खोज का विस्तृत विवरण अंतरराष्ट्रीय विज्ञान पत्रिका मैटर में प्रकाशित किया गया है।
हड्डियों के पुनर्निर्माण और कोशिकाओं के विकास में उपयोग
गंभीर चोटों में जब बड़ी हड्डियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, तो लगाई जाने वाली कृत्रिम धातु की रॉड शरीर के स्वाभाविक विकास के साथ खुद को नहीं ढाल पाती। प्रयोगशाला परीक्षणों के दौरान जब इस नए हाइड्रोजेल पर स्टेम सेल्स को रखा गया, तो बेहद उत्साहजनक परिणाम सामने आए। यह हाइड्रोजेल केवल एक निष्क्रिय आधार ढांचा प्रदान करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने स्टेम कोशिकाओं को नई हड्डियों और नर्व सेल्स के रूप में विकसित होने के लिए एक अनुकूल मार्गदर्शक वातावरण भी उपलब्ध कराया।
इसका सीधा अर्थ यह है कि शरीर के क्षतिग्रस्त भाग में इस जेल के संपर्क में आते ही कोशिकाएं एक प्राकृतिक परिवेश पाती हैं, जिससे वे नई हड्डियों और तंत्रिकाओं का निर्माण शुरू कर सकती हैं। जैसे-जैसे वास्तविक हड्डी का ढांचा बनता जाता है, यह लचीला जेल अपने स्वरूप को उसी के अनुरूप व्यवस्थित करता चला जाता है, जिससे उपचार प्रक्रिया अधिक स्वाभाविक हो जाती है।
लकवा के उपचार में तंत्रिका तालमेल और कड़े चिप्स का विकल्प
तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों और लकवा के आधुनिक उपचार में ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस यानी BCI का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है। हालांकि, दिमाग के नाजुक हिस्सों में कड़े और कठोर सिलिकॉन इलेक्ट्रोड स्थापित करने से कई तरह के जोखिम जुड़े होते हैं। ये कठोर उपकरण कोमल मस्तिष्क ऊतकों को चोट पहुंचा सकते हैं, सूजन पैदा कर सकते हैं या फिर शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा अस्वीकार किए जा सकते हैं। इस नए लचीले हाइड्रोजेल ने इस क्षेत्र में एक सौम्य और सुरक्षित विकल्प पेश किया है।
अनुसंधान दल का नेतृत्व कर रहे प्रोफेसर दू शुएमिन के अनुसार, शोध दल ने इस लचीले हाइड्रोजेल की मदद से इलेक्ट्रोड की ऊपरी सतह तैयार की। चूहों के भ्रूण के मस्तिष्क पर किए गए परीक्षणों में पाया गया कि जैसे-जैसे मस्तिष्क का आकार और जटिलता बढ़ती गई, यह जेल भी मस्तिष्क की विकास गति के साथ-साथ अपने आकार को ढालता चला गया।
चूंकि यह जेल मस्तिष्क के ऊतकों की भांति ही बेहद मुलायम और लचीला है, इसलिए इसने बिना किसी सूजन, ऊतक क्षति या घाव के मस्तिष्क से निकलने वाली सूक्ष्म विद्युत तरंगों को पूरी सटीकता के साथ दर्ज किया। रीढ़ की हड्डी में गंभीर आघात लगने पर दिमाग और शारीरिक अंगों का सीधा संपर्क टूट जाता है। ऐसी स्थिति में यह जेल एक अनुकूल पुल की तरह कार्य कर सकता है, जो टूटी हुई तंत्रिकाओं के बीच संकेतों का आदान-प्रदान सुगम बनाकर पक्षाघात के मरीजों को बिना किसी कठोर ब्रेन-चिप के गतिशीलता हासिल करने में मदद कर सकता है।
सॉफ्ट रोबोटिक्स और कृत्रिम त्वचा का नया स्वरूप
चिकित्सीय उपयोगों के अतिरिक्त इस तकनीकी खोज के अनुप्रयोग सॉफ्ट रोबोटिक्स के क्षेत्र में भी व्यापक हैं। वर्तमान समय में विकसित किए जा रहे ह्यूमनॉइड रोबोट्स में कठोर प्लास्टिक या धातु की बाहरी सतह का उपयोग होता है, जिससे उनकी गतिशीलता और बनावट अस्वाभाविक दिखाई देती है। आकार बदलने में सक्षम इस हाइड्रोजेल की सहायता से रोबोट्स के लिए ऐसी बाहरी त्वचा बनाई जा सकती है जो मानवीय मांसपेशियों की भांति लचीली और संवेदनशील हो।
यह सामग्री बाहरी वातावरण की परिस्थितियों के अनुसार रंग, तापमान और स्वरूप में बदलाव लाने में समर्थ है। वैज्ञानिकों ने ऐसा विशेष हाइड्रोजेल भी तैयार किया है जो पूरे एक महीने के भीतर धीरे-धीरे अपना रंग बदलता है। इस तरह के गुण दीर्घकालिक पर्यावरणीय सेंसर्स और अत्यधिक अनुकूलनीय रोबोटिक अंगों के विकास में महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकते हैं।
सुरक्षा के लिए सैंडविच संरचना का निर्माण
मानव शरीर के भीतर किसी भी प्रकार की धातु के प्रयोग में विषाक्तता और संक्रमण का खतरा सबसे बड़ा बिंदु होता है। यदि तरल धातु सीधे रक्त प्रवाह या जैविक ऊतकों के संपर्क में आ जाए तो उससे शारीरिक नुकसान की आशंका बढ़ जाती है।
इस सुरक्षा चिंता को दूर करने के लिए शोधकर्ताओं ने एक सुरक्षित सैंडविच स्ट्रक्चर तैयार किया है। इस विशेष त्रिस्तरीय बनावट में रासायनिक रूप से सक्रिय लिक्विड मेटल वाले हिस्से को दो सुरक्षित और वाटरप्रूफ सुरक्षात्मक परतों के बीच सुरक्षित रखा गया है, ताकि धातु सीधे जैविक संपर्क में न आए और सामग्री की अनुकूलन क्षमता भी बिना किसी खतरे के कार्य करती रहे।



















