संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय मंच पर 27 अक्टूबर को उस वक्त एक विचित्र कूटनीतिक स्थिति बन गई जब क्यूबा पर लगी पाबंदियों के मुद्दे पर बीजिंग ने वाशिंगटन पर तीखे प्रहार किए। संयुक्त राष्ट्र में बीजिंग के स्थायी प्रतिनिधि फू कोंग ने हवाना के विरुद्ध दशकों से लागू आर्थिक घेराबंदी को अविलंब समाप्त करने की पुरजोर मांग उठाई। उन्होंने वैश्विक समुदाय को संबोधित करते हुए तर्क दिया कि विश्व पटल पर प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र की संप्रभुता अक्षुण्ण है और किसी भी महाशक्ति को अपने से छोटे अथवा निर्बल मुल्कों पर दबाव नहीं बनाना चाहिए। हालांकि, संप्रभुता और समानता का यह पाठ ऐसे समय में सामने आया जब स्वयं बीजिंग के अपने क्षेत्रीय आचरण पर पड़ोसियों के गंभीर आरोप रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से बीजिंग का वक्तव्य
संयुक्त राष्ट्र महासभा के विशेष सत्र के दौरान क्यूबा के विरुद्ध वाशिंगटन द्वारा लागू वित्तीय, व्यापारिक और आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने के विषय पर आधिकारिक चर्चा आयोजित की गई थी। इस महत्वपूर्ण सत्र में भाग लेते हुए चीनी राजदूत फू कोंग ने वाशिंगटन की विदेश नीति की तीखी आलोचना की और अंतरराष्ट्रीय नियमों की दुहाई दी।
चीनी प्रतिनिधिमंडल ने अपनी बात रखते हुए यह रेखांकित किया कि पिछले 60 से अधिक वर्षों से क्यूबा के खिलाफ गैर-कानूनी आर्थिक पाबंदियां थोपी जा रही हैं। उन्होंने याद दिलाया कि संयुक्त राष्ट्र की बैठकों में अब तक कुल 34 बार इस जटिल विषय पर विचार-विमर्श हो चुका है, किंतु वाशिंगटन की नीतियों में तनिक भी लचीलापन देखने को नहीं मिला है।
फू कोंग ने अपने आधिकारिक संबोधन में संप्रभु समानता का पक्ष लेते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय में सभी देशों का दर्जा एक समान है, चाहे वे भौगोलिक दृष्टि से छोटे हों या बड़े अथवा आर्थिक रूप से संपन्न हों या निर्धन। उन्होंने बल दिया कि प्रत्येक संप्रभु भूभाग को अपने नागरिकों की इच्छा के अनुरूप अपनी शासन प्रणाली और प्रगति का मार्ग चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए।
चीनी दूत ने आगे यह तर्क पेश किया कि किसी भी देश पर सैन्य दबाव बनाकर अथवा कानूनी प्रक्रियाओं की आड़ लेकर बाहरी एजेंडा लागू नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, क्यूबा की राजनीतिक और सामाजिक दिशा का निर्धारण केवल वहां के स्थानीय नागरिक ही कर सकते हैं। इसके साथ ही उन्होंने दावा किया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्पष्ट मंजूरी के बिना अधिरोपित किए जाने वाले एकतरफा प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय नियमों और मानवीय मूल्यों के सर्वथा विपरीत हैं।
क्षेत्रीय संप्रभुता और पड़ोसी देशों के साथ बीजिंग का आचरण
वैश्विक मंच पर समानता और स्वायत्तता की वकालत करने वाले बीजिंग के इस रुख की तुलना जब उसके पड़ोसी देशों के साथ किए जाने वाले व्यवहार से की जाती है, तो एक गहरा विरोधाभास उभरता है। भारत, ताइवान, फिलीपींस और वियतनाम जैसे पड़ोसी मुल्कों की सीमाओं और जलक्षेत्रों के संदर्भ में बीजिंग की सैन्य कार्रवाइयों पर लगातार चिंताएं जताई जाती रही हैं।
भारत के संदर्भ में बीजिंग की नीतियां विवादों के केंद्र में रही हैं। अरुणाचल प्रदेश के भारतीय भूभाग पर बीजिंग अवांछित दावा जताते हुए उसे काल्पनिक रूप से दक्षिणी तिब्बत घोषित करने का प्रयास करता है। वर्ष 1914 में तय हुई मैकमोहन रेखा की ऐतिहासिक वैधता को अस्वीकार करने से लेकर लद्दाख की गलवान घाटी में सैन्य घुसपैठ की घटनाओं तक, सीमाओं पर यथास्थिति बिगाड़ने की निरंतर चेष्टाएं देखी गई हैं। इसके अतिरिक्त भारतीय क्षेत्रों के नामों को आधिकारिक नक्शों पर एकतरफा ढंग से परिवर्तित करने की रणनीतियां भी सामने आती रही हैं।
ताइवान के मामले में बीजिंग की नीतियां पूरी तरह आक्रामक रुख को प्रदर्शित करती हैं। जहां ताइवान अपनी स्वतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवस्था संचालित करता है, वहीं बीजिंग उस पर अपने राजनीतिक नियंत्रण का दावा करता है। ताइवान के हवाई रक्षा क्षेत्र और समुद्री सीमाओं में लड़ाकू विमानों की निरंतर उड़ानें भेजकर सैन्य दबाव बनाने की कोशिशें जगजाहिर हैं, जो द्वीप की वास्तविक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक ढांचे के प्रति सीधे खतरे के रूप में देखी जाती हैं।
दक्षिण चीन सागर के सामरिक जलमार्ग पर भी ऐसा ही रुख देखा जा रहा है। फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया और ब्रुनेई जैसे तटवर्ती राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय समुद्री संधियों के अनुसार अपने वैध अधिकारों का उपयोग करना चाहते हैं। इसके विपरीत, बीजिंग ने समूचे जलक्षेत्र पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए कृत्रिम टापुओं का निर्माण किया है और वहां सामरिक मिसाइल प्रणालियां तैनात की हैं। फिलीपींस के स्थानीय मछुआरों की नौकाओं पर कोस्टगार्ड द्वारा वाटर कैनन चलाने और गोलीबारी करने की घटनाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दर्ज हुई हैं।
ऋण कूटनीति और बंदरगाहों पर नियंत्रण का तंत्र
छोटे और आर्थिक रूप से कमजोर देशों के प्रति बीजिंग की नीति अक्सर रणनीतिक ऋणजाल के रूप में सामने आई है। श्रीलंका, पाकिस्तान और अफ्रीकी महाद्वीप के कई विकासशील देशों को अत्यंत कठोर शर्तों और भारी ब्याज दरों पर वित्तीय ऋण उपलब्ध कराए गए।
जब ये विकासशील राष्ट्र विदेशी मुद्रा संकट अथवा आर्थिक मंदी के कारण ऋण की अदायगी में असमर्थ हुए, तो बीजिंग ने उनकी रणनीतिक परिसंपत्तियों को अपने नियंत्रण में ले लिया। श्रीलंका के महत्वपूर्ण हंबनटोटा बंदरगाह को 99 वर्षों के दीर्घकालिक पट्टे पर हासिल करना इस नीति का प्रमुख उदाहरण बना, जिसे कई विश्लेषक किसी संप्रभु राष्ट्र की आंतरिक स्वायत्तता पर गहरा आघात मानते हैं।
क्यूबा के समर्थन के पीछे छिपे रणनीतिक कारण
संयुक्त राष्ट्र में हवाना के प्रति बीजिंग द्वारा दिखाई जा रही इस अप्रत्याशित सहानुभूति के पीछे अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञ सोची-समझी कूटनीति देखते हैं। इसके पीछे कई ठोस भू-राजनीतिक कारक कार्य कर रहे हैं।
प्रथम कारण यह है कि बीजिंग स्वयं को विकासशील दुनिया और ग्लोबल साउथ के उन सभी देशों के स्वाभाविक नेता के रूप में पेश करना चाहता है जो वाशिंगटन की नीतियों से असंतुष्ट हैं। क्यूबा के पक्ष में आवाज उठाकर वह लातिन अमेरिका और अफ्रीका के देशों के बीच अपनी कूटनीतिक पैठ गहरी करना चाहता है।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू क्यूबा की भौगोलिक स्थिति से जुड़ा है। फ्लोरिडा के अमेरिकी तट से महज कुछ मील की दूरी पर स्थित होने के कारण क्यूबा का रणनीतिक महत्व असाधारण है। आर्थिक और मानवीय सहयोग की आड़ में बीजिंग क्यूबा में अपने खुफिया निगरानी और रणनीतिक अड्डों को सुदृढ़ करने के प्रयास में लगा हुआ है, ताकि अमेरिकी गतिविधियों पर सीधी निगरानी रखी जा सके।
तीसरा पहलू भविष्य की सुरक्षा से संबंधित है। बीजिंग इस वास्तविकता से भली-भांति अवगत है कि यदि उसने भविष्य में ताइवान के विरुद्ध कोई प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई की, तो पश्चिमी शक्तियां उस पर भी व्यापक व्यापारिक और वित्तीय नाकाबंदी लागू करेंगी। इसी कारण वह अभी से वैश्विक मंचों पर एकतरफा प्रतिबंधों को अवैध और अनैतिक सिद्ध करने के कूटनीतिक आधार तैयार कर रहा है।
दोहरे मानकों की अंतरराष्ट्रीय समीक्षा
संयुक्त राष्ट्र के सर्वोच्च मंच पर एक तरफ कमजोर देशों की संप्रभुता का पुरजोर समर्थन करना और दूसरी तरफ अपने ही सीमावर्ती पड़ोसियों पर सैन्य बल का प्रयोग करना, बीजिंग की विदेश नीति के स्पष्ट दोहरे चरित्र को उजागर करता है। कूटनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि यदि बीजिंग वास्तव में संप्रभु समानता और अंतरराष्ट्रीय कानून की रक्षा के प्रति गंभीर है, तो उसे सबसे पहले अपने पड़ोसियों की सीमाओं से सैन्य दबाव वापस लेना चाहिए और क्षेत्रीय जलक्षेत्रों में विस्तारवादी कदमों पर विराम लगाना चाहिए।



















