ऊर्जा क्षेत्र में टिकाऊ विकल्पों की तलाश के बीच समुद्री जल के बहुआयामी उपयोग को लेकर एक नया तकनीकी ढांचा सामने आया है। इस नई प्रणाली के जरिए समुद्री पानी का प्रसंस्करण करके न सिर्फ उच्च शुद्धता वाली ग्रीन हाइड्रोजन और पीने योग्य मीठा पानी तैयार किया जा सकता है, बल्कि समुद्र में घुले यूरेनियम, ब्रोमीन और साधारण नमक जैसे मूल्यवान खनिजों को भी अलग करना संभव हो गया है। इस पूरी एकीकृत कार्यप्रणाली के माध्यम से पारंपरिक प्रणालियों की तुलना में बिजली की खपत दक्षता में लगभग 14.4 प्रतिशत का सुधार दर्ज किया गया है।
समुद्री जल से हाइड्रोजन उत्पादन की जटिलताएं
भविष्य की शून्य-उत्सर्जन ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए ग्रीन हाइड्रोजन को एक अहम विकल्प माना जाता रहा है, जिसे नवीकरणीय ऊर्जा की मदद से पानी के अणुओं को विभाजित करके तैयार किया जाता है। हालांकि सीधे समुद्री जल का उपयोग करना तकनीकी रूप से हमेशा बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है। समुद्री जल में मौजूद क्लोराइड आयन इलेक्ट्रोड को तेजी से संक्षारित कर देते हैं, जिससे उपकरण समय से पहले खराब होने लगते हैं। इसके अतिरिक्त पानी में मौजूद कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे भारी तत्व इलेक्ट्रोड की सतह पर ठोस परत जमा देते हैं, जिससे समग्र इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया की कार्यक्षमता बुरी तरह प्रभावित होती है।
इन बाधाओं से निपटने का पारंपरिक रास्ता यह था कि पहले समुद्री जल का विलवणीकरण करके उसे शुद्ध मीठे पानी में बदला जाए और फिर उसका इस्तेमाल हाइड्रोजन बनाने में किया जाए। लेकिन विलवणीकरण संयंत्रों की स्थापना के लिए अत्यधिक बिजली और अत्यंत महंगे उपकरणों की आवश्यकता होती थी, जिससे हाइड्रोजन उत्पादन की लागत काफी बढ़ जाती थी।
अपशिष्ट ताप के पुनर्चक्रण से खोजा गया समाधान
वैज्ञानिकों ने इस तकनीकी बाधा को दूर करने के लिए इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न होने वाली व्यर्थ गर्मी का अभिनव उपयोग किया है। सामान्य रूप से हाइड्रोजन उत्पादन के दौरान 80 से 90 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर उपयोग होने वाली लगभग 30 प्रतिशत विद्युत ऊर्जा कम तापमान वाली ताप ऊर्जा में तब्दील होकर नष्ट हो जाती है। नई विकसित व्यवस्था में इस अतिरिक्त ताप को बर्बाद होने देने के बजाय सीधे एक वैक्यूम डिस्टिलेशन सिस्टम की ओर मोड़ दिया जाता है।
इस वैक्यूम प्रणाली के भीतर समुद्री पानी को 40 से 50 डिग्री सेल्सियस के अपेक्षाकृत कम तापमान पर वाष्पीकृत किया जाता है। बाद में इस भाप को संघनित करके शुद्ध मीठा पानी हासिल किया जाता है, जबकि शेष बची सांद्रता से यूरेनियम, ब्रोमीन और नमक जैसे रासायनिक घटकों को अलग करने की राह आसान हो जाती है। आर्थिक विश्लेषणों के अनुसार यदि बिजली की दरें अनुकूल रहें, तो इस तकनीक के जरिए हाइड्रोजन उत्पादन की कुल लागत मौजूदा सभी तकनीकों के मुकाबले काफी कम हो जाएगी।
प्रायोगिक संयंत्र के परिणाम और भविष्य की योजनाएं
इस परियोजना की शुरुआत वैज्ञानिकों ने वर्ष 2023 में 25 किलोवाट क्षमता वाली एक छोटी प्रायोगिक इकाई स्थापित करके की थी। प्रारंभिक सफलता के बाद इस प्रणाली को विस्तारित करते हुए 250 किलोवाट क्षमता वाले बड़े पायलट प्लांट का रूप दिया गया। प्रायोगिक आंकड़ों के अनुसार यह संयंत्र प्रति वर्ष लगभग 3.8 लाख घन मीटर हाइड्रोजन उत्पादित करने में सक्षम है, जिसकी शुद्धता का स्तर 99.9999 प्रतिशत आंका गया है।
हाइड्रोजन उत्पादन के साथ-साथ यह संयंत्र सालाना लगभग 256 टन मीठा पानी भी उपलब्ध कराता है। परीक्षण अवधि के दौरान इस पूरी प्रणाली को लगातार 40 दिनों तक दैनिक आधार पर चालू और बंद किया गया, जिसके बावजूद संयंत्र की परिचालन स्थिरता और प्रदर्शन दक्षता में कोई गिरावट नहीं देखी गई। अनुसंधान दल का अगला कदम अधिक प्रभावी उत्प्रेरक विकसित करना, बची हुई ताप ऊर्जा का शत-प्रतिशत दोहन सुनिश्चित करना और एआई की मदद से पूरी परिचालन प्रक्रिया का डिजिटल अनुकूलन करना है।



















