क्रिप्टो बाजार में जब आम निवेशक डरकर बिकवाली कर रहे थे, तभी सबसे बड़े XRP होल्डर्स चुपचाप अपनी थैली भर रहे थे। Santiment के आंकड़ों के मुताबिक, ऐसे वॉलेट्स जिनमें कम से कम 10 लाख कॉइन हैं, उन्होंने बीते छह महीनों में 1.53 अरब अतिरिक्त XRP अपने पास जोड़ लिए हैं। यानी मंदी के दौर में भी इन व्हेल्स की खरीदारी रुकी नहीं। नतीजा यह है कि अब कुल सप्लाई के 74.1% हिस्से पर इन्हीं बड़े वॉलेट्स का कब्जा है।
इस जमाखोरी का सीधा असर कीमत पर दिखा। सप्लाई कसने के साथ ही XRP की कीमत 15 जून को $1.13 से उछलकर 16 जून को $1.29 तक पहुंच गई। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या आम निवेशक को भी इन व्हेल्स की चाल का अनुसरण करना चाहिए।
साल भर की गिरावट और रिटेल का डर
बीते एक साल में XRP की कीमत बुरी तरह टूटी है। जुलाई 2025 में यह $3.65 के अपने सर्वकालिक उच्च स्तर तक चढ़ा था, लेकिन उसके बाद इसमें करीब 67% की भारी गिरावट आ चुकी है। बढ़ती आर्थिक अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनाव के माहौल में छोटे निवेशकों ने अपने XRP बेचना शुरू कर दिया। अमेरिका और ईरान के बीच टकराव ने रिटेल निवेशकों के भरोसे को खासा हिला दिया।
जहां एक तरफ आम निवेशक अपने कॉइन एक्सचेंजों पर भेजकर बेच रहे थे, वहीं दूसरी ओर व्हेल्स बिना शोर मचाए खरीदारी करते रहे। यही फर्क अब चर्चा का केंद्र बन गया है।
व्हेल्स की खरीदारी क्या इशारा करती है
बड़े होल्डर्स का XRP खरीदना अक्सर इस बात का संकेत माना जाता है कि उन्हें आगे कीमतों में तेजी की उम्मीद है। XRP करीब एक साल से गिरावट के दौर में है, और जानकारों का मानना है कि जल्द ही रुख पलट सकता है। इसके पीछे कुछ ठोस वजहें भी गिनाई जा रही हैं।
अमेरिका और ईरान इसी शुक्रवार को एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने से तेल की कीमतों में गिरावट आई है। ये दोनों घटनाएं मिलकर महंगाई के आंकड़ों को ठंडा कर सकती हैं। महंगाई घटने पर ब्याज दरों में कटौती का रास्ता खुल सकता है, और कम ब्याज दरें XRP जैसी ऊंचे जोखिम वाली संपत्तियों के लिए राहत लेकर आ सकती हैं।
कम सप्लाई का गणित और छिपा जोखिम
जब सप्लाई कम होती है, तो कीमत को ऊपर धकेलने के लिए अपेक्षाकृत कम नई पूंजी की जरूरत पड़ती है। इस हफ्ते XRP की मांग ऊंची थी जबकि सप्लाई सीमित रही, और इसी असंतुलन ने कीमत में सुधार ला दिया।
हालांकि सिक्के का दूसरा पहलू भी है। जब इतनी बड़ी मात्रा में कॉइन चंद हाथों में जमा हो जाएं, तो अपने साथ जोखिम भी लाते हैं। अगर ये बड़े वॉलेट्स अचानक बिकवाली पर उतर आएं, तो कीमत धड़ाम से गिर सकती है। इसलिए व्हेल्स के पीछे चलने से पहले इस केंद्रीकरण के खतरे को समझना भी जरूरी है।













