15 अगस्त का ऐतिहासिक दिन प्रत्येक भारतीय के हृदय में अपार राष्ट्रप्रेम, स्वाभिमान और गर्व की भावना का संचार करता है। इस पावन अवसर पर देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले अमर शहीदों को नमन करने और उनके अदम्य साहस को याद करने का बेहतरीन जरिया सिनेमा ही है। भारतीय फिल्म उद्योग ने समय-समय पर महात्मा गांधी, महान क्रांतिकारी भगत सिंह, रानी लक्ष्मीबाई और लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे कई वीर सेनानियों की जीवनगाथा को पर्दे पर उतारा है। यदि आप इस स्वतंत्रता दिवस को देशभक्ति के रंग में रंग कर मनाना चाहते हैं, तो इन 7 शानदार फिल्मों को अपनी देखने योग्य सूची में अवश्य शामिल करें।
मंगल पांडे: द राइजिंग (2005)
वर्ष 2005 में प्रदर्शित हुई फिल्म मंगल पांडे: द राइजिंग भारतीय स्वाधीनता संग्राम के पहले विद्रोह की नींव रखने वाले वीर सिपाही मंगल पांडे के जीवन पर आधारित है। इस फिल्म में मुख्य भूमिका सुप्रसिद्ध अभिनेता आमिर खान ने निभाई है। कहानी 1857 के उस ऐतिहासिक दौर को दर्शाती है जब ब्रिटिश हुकूमत ने सेना में गाय और सुअर की चर्बी वाले कारतूस अनिवार्य कर दिए थे। मंगल पांडे ने ईस्ट इंडिया कंपनी के इस दमनकारी कदम के खिलाफ सबसे पहले आवाज उठाई और बगावत का शंखनाद किया। उनकी इसी निडर आवाज ने आगे चलकर संपूर्ण भारत में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला भड़का दी थी।
द लीजेंड ऑफ भगत सिंह (2002)
राजकुमार संतोषी के कुशल निर्देशन में बनी वर्ष 2002 की ऐतिहासिक फिल्म द लीजेंड ऑफ भगत सिंह देशभक्ति पर आधारित फिल्मों की श्रेणी में एक मील का पत्थर मानी जाती है। इसमें बहुचर्चित अभिनेता अजय देवगन ने महान क्रांतिकारी भगत सिंह के चरित्र को इतनी जीवंतता और संवेदनशीलता से निभाया कि दर्शक भावुक हो उठे थे। यह बायोपिक भगत सिंह की क्रांतिकारी विचारधारा, देशप्रेम के प्रति उनकी निष्ठा और उनके साथी राजगुरु तथा सुखदेव के साथ हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमने की पूरी अमर दास्तान को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है।
मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झांसी (2019)
वर्ष 2019 में रिलीज हुई फिल्म मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झांसी 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की वीर नायिका रानी लक्ष्मीबाई के अदम्य साहस और शौर्य की गाथा है। अभिनेत्री कंगना रनौत के सशक्त अभिनय से सजी यह फिल्म दिखाती है कि किस प्रकार रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों की विशाल सेना के सामने घुटने टेकने से इनकार कर दिया और अकेले ही अपनी सेना का नेतृत्व किया। भव्य युद्ध दृश्यों और राष्ट्रप्रेम के जज्बे से भरपूर यह फिल्म झांसी के स्वाभिमान की रक्षा के लिए रानी के अद्वितीय रणकौशल और महान बलिदान को गर्व के साथ पर्दे पर लाती है।
डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर (2000)
निर्देशक जब्बार पटेल के मार्गदर्शन में बनी वर्ष 2000 की बायोपिक डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर भारतीय इतिहास के एक बेहद महत्वपूर्ण अध्याय को उजागर करती है। साउथ सिनेमा के दिग्गज अभिनेता ममूटी ने डॉ. आंबेडकर का मुख्य किरदार निभाया था, जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह फिल्म भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, असमानता और छुआछूत के खिलाफ बाबासाहेब के आजीवन संघर्ष, शोषित वर्ग के अधिकारों की लड़ाई तथा स्वतंत्र भारत का संविधान तैयार करने में उनके ऐतिहासिक और अतुलनीय योगदान को बहुत बारीकी से रेखांकित करती है।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस: द फॉरगॉटेन हीरो (2004)
दिग्गज फिल्मकार श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित वर्ष 2004 की ऐतिहासिक रचना नेताजी सुभाष चंद्र बोस: द फॉरगॉटेन हीरो नेताजी के जीवन के अंतिम वर्षों और उनके अविश्वसनीय प्रयासों पर प्रकाश डालती है। अभिनेता सचिन खेडेकर ने इसमें नेताजी का प्रभावशाली अभिनय किया है। फिल्म दर्शाती है कि किस तरह उन्होंने विदेशी धरती पर रहकर आजाद हिंद फौज का पुनर्गठन किया और ब्रिटिश साम्राज्य को भारत की पावन धारा से उखाड़ फेंकने के लिए एक सशक्त सशस्त्र क्रांति का बिगुल बजाया था।
सरदार (1993)
वर्ष 1993 में आई फिल्म सरदार का निर्देशन केतन मेहता ने किया था। इसमें अभिनेता परेश रावल ने भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल का अत्यंत गरिमापूर्ण और प्रभावी अभिनय किया। यह बायोपिक वर्ष 1947 में मिली आजादी के तुरंत बाद के सबसे चुनौतीपूर्ण राजनीतिक दौर की कहानी बयां करती है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे सरदार पटेल ने अपनी कूटनीतिक कुशलता, दृढ़ संकल्प और दूरदर्शिता के बल पर 500 से अधिक देशी रियासतों का भारत संघ में विलय कराया और एक अखंड तथा लोकतांत्रिक भारत की मजबूत नींव रखी।
गांधी (1982)
महान हॉलीवुड निर्देशक रिचर्ड एटनबरो द्वारा निर्मित और निर्देशित वर्ष 1982 की फिल्म गांधी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराही गई एक कालजयी बायोपिक है। इसमें ब्रिटिश अभिनेता बेन किंग्सले ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की भूमिका इस कदर शिद्दत से निभाई कि उन्हें प्रतिष्ठित ऑस्कर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। फिल्म दक्षिण अफ्रीका में उनके एक युवा वकील के रूप में काम करने से लेकर भारत आगमन, अहिंसा और सत्याग्रह जैसे अनूठे विचारों के माध्यम से बिना शस्त्र उठाए ब्रिटिश हुकूमत को झुकाने और भारत को आजादी दिलाने तक के संपूर्ण सफर को बहुत ही मार्मिक और भव्य रूप में प्रस्तुत करती है।



















