सिनेमा के पर्दे पर लंबे समय तक अपनी मजबूत पहचान बनाने वाले अभिनेता संजय दत्त का जीवन कई बड़े उतार-चढ़ावों और अप्रत्याशित संकटों से भरा रहा है. शोहरत के शीर्ष पर पहुंचने के बाद जब उन्हें जेल की सलाखों के पीछे एक आम बंदी की तरह दिन गुजारने पड़े, तो उस कठिन इम्तिहान ने उनके धैर्य की कड़ी परीक्षा ली. हाथों में बेड़ियां पड़ने से लेकर पिता को गहरी पीड़ा में देखने तक, कई ऐसे लम्हे आए जिन्होंने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया था. इसके बावजूद उन्होंने खुद का हौसला पस्त नहीं होने दिया और वहां मौजूद व्यवस्था के तानों का सामना भी पूरी सहजता से किया. हाल ही में अभिनेता ने अपने उस मुश्किल दौर की कई अनदेखी परतों और व्यक्तिगत अनुभवों को खुलकर सामने रखा है.
शेखर सुमन के शो में पुराने दिनों की यादें
शेखर सुमन के चर्चित चैट शो 'शेखर टुनाइट' में पहुंचे संजय दत्त ने अपनी जिंदगी के सबसे अंधियारे दिनों को विस्तार से याद किया. इस बातचीत में जब उनके अतीत की भारी चुनौतियों और जेल के तजुर्बों पर बात शुरू हुई, तो अभिनेता ने बताया कि उनके जीवन का सबसे अधिक भावुक और पीड़ादायी क्षण वह था जब पुलिस ने पहली बार उनके हाथों में हथकड़ी डाली थी और उनके पिता सुनील दत्त वहीं उनके सामने खड़े थे. उस एक दृश्य ने उनके पूरे परिवार को स्तब्ध कर दिया था.
बातचीत के दौरान यह भी सामने आया कि कैद के दौरान संजय दत्त को सुरक्षा कारणों से जेल की सबसे सख्त और एकांत मानी जाने वाली 'अंडा सेल' में रखा गया था. इसके बावजूद उन्होंने अपने मानसिक संतुलन को बिगड़ने नहीं दिया. जब उनसे सवाल किया गया कि क्या उन अत्यंत विषम परिस्थितियों और मानसिक दबाव के बीच कभी उनके मन में अपनी जीवनलीला समाप्त करने का विचार आया था, तो संजय दत्त ने बिना किसी संकोच के स्पष्ट किया कि ऐसा ख्याल उनके दिमाग में कभी नहीं आया.
मुसीबतों की लंबी फेहरिस्त और आंतरिक मजबूती
चैट शो के दौरान जब संजय दत्त के सामने उनके निजी जीवन में आई त्रासदियों का जिक्र किया गया, जिसमें कम उम्र में मां नरगिस को खोना, पहली पत्नी ऋचा शर्मा का असमय निधन, पिता सुनील दत्त का साया सिर से उठना, नशे की गंभीर लत से उबरने के लिए पुनर्वास केंद्र जाना और बाद में स्टेज-4 कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को हराना शामिल था, तब यह सवाल उठा कि आखिर वह किस आंतरिक शक्ति के सहारे इतने आघात सहते चले गए. इसके जवाब में अभिनेता ने कहा कि अपने पिता और पूरे परिवार को गहरे दर्द में देखकर उन्हें बेहद दुख होता था, लेकिन उस विपरीत माहौल में भी उन्होंने खुद को कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया.
संजय दत्त ने उस झकझोर देने वाले पल का जिक्र किया जब पहली बार पुलिस उनके घर पहुंची थी. उनके पिता और जाने-माने अभिनेता सुनील दत्त के सामने ही पुलिस अधिकारियों ने उन्हें हथकड़ियां पहनाई थीं. अभिनेता ने उस समय के घटनाक्रम को बयां करते हुए बताया कि जब पुलिस ने पहली बार आकर उनके हाथों में बेड़ियां कसीं, तो उनके पिता गहरे सदमे में चले गए थे. सुनील दत्त की आंखों में आंसू बह रहे थे और उन्होंने पुलिसकर्मियों से पूछा था कि वे उनके बेटे के साथ क्या कर रहे हैं. उस नाजुक मोड़ पर संजय दत्त ने अपने पिता को मजबूती से गले लगाया और ढांढस बंधाते हुए कहा कि वे इन हथकड़ियों को देखकर परेशान न हों क्योंकि यह केवल एक औपचारिक कानूनी प्रक्रिया है और उन्हें दुखी होने की जरूरत नहीं है.
अभिनेता ने आगे स्वीकार किया कि उस वक्त भीतर ही भीतर यह दृश्य उन्हें बुरी तरह तोड़ रहा था, लेकिन पिता को संबल देने के लिए उन्हें बाहर से अडिग दिखना जरूरी था. संजय दत्त ने साझा किया कि उनकी यह पूरी कानूनी लड़ाई लगभग 24 वर्षों तक खिंचती रही. इस पूरे लंबे दौर में भगवान शिव के निरंतर जाप 'हर हर महादेव' ने उन्हें विपरीत से विपरीत हालात से मुकाबला करने की आंतरिक ऊर्जा और शक्ति प्रदान की.
जेल के अफसरों का रवैया और सिगरेट वाला वाकया
जेल के भीतर पुलिसकर्मियों और प्रशासनिक अधिकारियों के बर्ताव को याद करते हुए संजय दत्त ने बताया कि वहां के कर्मचारियों को लगता था कि एक बड़े फिल्मी सितारे की तमाम सुख-सुविधाएं और ऐशो-आराम छीन लेने के बाद वह मानसिक तौर पर बिखर जाएगा. अधिकारियों को उम्मीद थी कि इस तरह का सख्त अलगाव उन्हें भीतर से तोड़ देगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. जब वे टूटे नहीं, तो वहां तैनात अधिकारी हैरान रह गए. इस वजह से कुछ लोग उनका उपहास भी उड़ाते थे.
इसी संदर्भ में एक दिलचस्प वाकया बताते हुए संजय दत्त ने कहा कि एक दिन एक पुलिस अफसर उनके पास आया और तंज कसते हुए बोला कि अब यहां उन्हें सिगरेट नहीं मिलने वाली है, ऐसे में वे क्या करेंगे. इस ताने को सुनकर अभिनेता विचलित नहीं हुए बल्कि उन्होंने शांत मुस्कान के साथ जवाब दिया कि यदि सिगरेट नहीं मिलेगी, तो कोई बात नहीं, यहां बीड़ी तो मिल ही जाएगी. उनका यह बेफिक्र और सहज अंदाज देखकर जेल अधिकारी सोच में पड़ जाते थे और तनाव में आ जाते थे कि तमाम दबावों के बाद भी यह शख्स इतना शांत और अविचलित कैसे रह सकता है.
परवरिश और सादगी का असर
अपने स्वभाव की इस सहजता का श्रेय संजय दत्त ने अपने माता-पिता के संस्कारों और द लॉरेंस स्कूल, सनावर में मिली शुरुआती शिक्षा को दिया. उन्होंने स्पष्ट किया कि बचपन से मिले इसी माहौल ने उन्हें हमेशा जमीन से जुड़ा रहना सिखाया. यही कारण रहा कि फिल्म जगत में एक बड़ा स्टार बनने के बाद भी उन्हें सेट पर साधारण काम करने वाले सहयोगियों के साथ बैठकर भोजन करने में कभी कोई झिझक महसूस नहीं हुई. स्टारडम उनके लिए कभी ऐसी चीज नहीं रहा जिसके आधार पर वे खुद को किसी अन्य इंसान से श्रेष्ठ या बड़ा समझें. इसी जमीनी सोच ने उन्हें जेल में अचानक एक आम कैदी की तरह दिन काटने की नौबत आने पर भी बिखरने से बचाए रखा.
1993 के मामले की कानूनी समयसीमा
संजय दत्त की कानूनी मुश्किलें 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों से जुड़े हथियार बरामदगी मामले से शुरू हुई थीं, जब 19 अप्रैल 1993 को पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया था. उन पर टाडा और आर्म्स एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई की गई थी. इस मामले में वे लगभग 18 महीने तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में बंद रहे, जिसके बाद अक्टूबर 1995 में देश की सर्वोच्च अदालत से उन्हें जमानत मिली थी.
जमानत मिलने के बाद भी यह मामला विभिन्न कानूनी प्रक्रियाओं के तहत वर्षों तक चलता रहा. साल 2007 में विशेष टाडा अदालत ने फैसला सुनाते हुए संजय दत्त को आतंकवाद से संबंधित सभी गंभीर आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया, हालांकि अवैध हथियार अपने पास रखने के अपराध में उन्हें आर्म्स एक्ट के तहत दोषी माना गया और छह वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई. इसके बाद वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा की अवधि को छह साल से घटाकर पांच साल कर दिया.
अदालत के आदेश के बाद संजय दत्त ने मई 2013 में कानूनी प्रक्रिया के तहत आत्मसमर्पण किया. इसके बाद उन्हें अपनी शेष सजा काटने के लिए पुणे की ऐतिहासिक यरवदा जेल भेजा गया. जेल में अपने अच्छे आचरण और व्यवहार के आधार पर मिली छूट के बाद वे 25 फरवरी 2016 को अपनी सजा पूरी करके रिहा हुए.


















