फिल्म जगत में जब कोई मूवी इतिहास रचती है, तो आम तौर पर उसमें काम करने वाले हर कलाकार के सितारे बुलंदियों पर पहुंच जाते हैं। हालांकि, हर बार ऐसा सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आता है। कुछ खास कलाकारों के लिए एक बड़ी सफलता ही उनके आगे के सफर की सबसे बड़ी रुकावट बन जाती है। कुछ ऐसा ही अनुभव अभिनेता अमीन हाजी के साथ भी हुआ था, जिन्हें साल 2001 की ब्लॉकबस्टर फिल्म में निभाए गए एक मूक ड्रमर के किरदार से जबरदस्त पहचान मिली थी। इस क्लासिक सिनेमा की भारी सफलता के बाद उन्हें अपने एक्टिंग करियर में काम हासिल करने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा था। दर्शक उन्हें आज भी आशुतोष गोवारिकर के निर्देशन में बनी उस ऐतिहासिक फिल्म के बाघा के रूप में भली-भांति याद करते हैं, जबकि उन्होंने मंगल पांडे, माई फ्रेंड पिंटो, अनकही और एक खिलाड़ी एक हसीना जैसी अन्य फिल्मों में भी अपनी कला का प्रदर्शन किया था।
लगान के बाद क्यों ठुकराने लगे थे ऑफर
अमीन हाजी ने खुलकर इस बात पर चर्चा की कि कैसे उस ऐतिहासिक ब्लॉकबस्टर के बाद उनके लिए नए प्रोजेक्ट्स को स्वीकार करना लगभग नामुमकिन हो गया था। उन्हें मिलने वाली नई पटकथाएं उस क्लासिक फिल्म के स्तर के सामने बेहद साधारण महसूस होती थीं। उनके मुताबिक वह प्रोजेक्ट उनके जीवन का एक ऐसा अनमोल अवसर था जो दोबारा नहीं मिल सकता था। इस कारण से उनके पास आने वाले तमाम प्रस्ताव उन्हें अपनी तरफ आकर्षित नहीं कर पाते थे और वह उन्हें लगातार खारिज करते चले गए।
पत्नी की नाराजगी और काम का दबाव
काम के प्रति इस रवैये की वजह से उनके घर में भी तनाव पैदा होने लगा था। अमीन हाजी ने बताया कि उनकी पत्नी इस बात पर बेहद खफा थीं कि उन्होंने लगान के बाद नई फिल्में साइन करना पूरी तरह बंद कर दिया था। उन्हें जो भी किरदार ऑफर किए जाते थे, वे या तो पूरी तरह मूक होते थे या फिर कहानी में उनका कोई खास वजन नहीं होता था। उनकी पत्नी ने उनसे साफ शब्दों में कहा था कि लगान के बाद जब भी कोई नया प्रस्ताव आता है, तो वह उसे बेकार बताकर ठुकरा देते हैं। उन्होंने अपने पति को समझाया था कि घर चलाने के लिए उन्हें कोई न कोई काम तो चुनना ही होगा और इस तरह हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा जा सकता है।
स्वदेश और जोधा अकबर से जुड़ाव
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए अभिनेता ने यह भी स्वीकार किया कि उस ब्लॉकबस्टर फिल्म के बाद उनके लिए आगे बढ़ना इसलिए भी मुश्किल था क्योंकि निर्देशक ने उन्हें जीवनभर की अमूल्य सौगातें दी थीं। उन्होंने कहा कि आशुतोष गोवारिकर ने उन्हें ताजमहल जैसी महान फिल्म का हिस्सा बनाया, स्वदेश जैसी फिल्म की पटकथा लिखने का बेहतरीन मौका दिया और आमिर खान जैसा सच्चा दोस्त भी प्रदान किया। इसके बाद उनके पास करने के लिए और कुछ खास बचा ही नहीं था। लगान के बाद उनका मुख्य धारा का अभिनय सफर लगभग थम सा गया था क्योंकि उस स्तर के संवाद और किरदार दोबारा मिलना असंभव हो गया था।
निर्देशन के क्षेत्र में रखा नया कदम
अभिनय के मोर्चे पर आ रही दिक्कतों के बाद अमीन हाजी ने फिल्म निर्माण और निर्देशन की दुनिया का रुख किया। उन्होंने कोई जाने ना नामक साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म के साथ निर्देशक के तौर पर अपनी पारी की शुरुआत की, जिसमें कुणाल कपूर और अमायरा दस्तूर मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे। अपने इस लंबे सफर में उन्होंने केवल अभिनय तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि एक प्रतिभाशाली स्क्रीनराइटर और सहायक निर्देशक के रूप में भी अपनी मजबूत पहचान बनाई। उन्होंने स्वदेश और जोधा अकबर जैसी नामी फिल्मों में भी निर्देशक के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। भले ही बाघा का वह आइकॉनिक किरदार उनके करियर का सबसे चमकीला और यादगार हिस्सा बन गया, लेकिन वही सफलता उनके लिए आगे के नए रास्ते तलाशने में सबसे बड़ी चुनौती भी साबित हुई।



















