हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसे कलमकार हुए हैं जिनके रचे गीत आज भी लोगों की जुबान पर आसानी से मिल जाते हैं। ऐसे ही नामचीन रचनाकारों में अंजान का जिक्र खास तौर पर किया जाता है, जिन्होंने अपनी बेहतरीन शायरी और गीतों से संगीत प्रेमियों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी। ‘खइके पान बनारस वाला’ और ‘ओ साथी रे’ जैसे अमर गीत रचने वाले इस गीतकार का फिल्मी सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। एक दौर ऐसा भी आया था जब उन्हें अपनी आजीविका चलाने के लिए छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना पड़ा था, लेकिन उनकी कड़ी मेहनत रंग लाई और उन्होंने हिंदी सिनेमा में एक कभी न मिटने वाली पहचान बना ली।
उनका मूल नाम लालजी पांडेय था और उनका जन्म 28 अक्टूबर 1930 को उत्तर प्रदेश के बनारस शहर में हुआ था। बचपन के दिनों से ही उन्हें कविताएं लिखने और शायरी करने का बेहद शौक था। शब्दों के साथ खेलना और अपनी भावनाओं को कविताओं के माध्यम से बयां करना उनकी फितरत में शुमार था। बनारस में रहते हुए ही उनकी रचनाएं स्थानीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। इसके अलावा वह विभिन्न कवि सम्मेलनों और काव्य गोष्ठियों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया करते थे, जिससे उनकी कला को आगे बढ़ाने में काफी मदद मिली।
अपनी कला को बड़ा फलक देने के इरादे से उन्होंने मुंबई का रुख किया था। हालांकि महानगर की चकाचौंध में उन्हें शुरुआती दौर में काफी संघर्ष करना पड़ा और मनमुताबिक काम आसानी से नहीं मिला। फिल्मी दुनिया में खुद को स्थापित करने के लिए उन्हें कई साल तक पापड़ बेलने पड़े। इस कड़े संघर्ष के दौरान घर चलाना भी बड़ी चुनौती था, जिससे निपटने के लिए वह बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया करते थे। एक तरफ रोजी-रोटी का गंभीर संकट था तो दूसरी तरफ फिल्मों में गीतकार बनने का बड़ा सपना पल रहा था। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने कभी अपना हौसला नहीं खोया और लगातार लिखते रहे।
वर्ष 1953 में उनकी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया जब उन्हें प्रेमनाथ की फिल्म ‘प्रिजनर ऑफ गोलकोंडा’ में गीत लिखने का बड़ा अवसर मिला। उनके फिल्मी करियर की आधिकारिक शुरुआत इसी फिल्म से मानी जाती है जिसके लिए उन्होंने ‘लहर ये डोले कोयल बोले’ जैसे खूबसूरत बोल लिखे। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार छोटे-बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए काम करते रहे। उनके सफर में साल 1963 में आई फिल्म ‘गोदान’ एक बहुत बड़ा मील का पत्थर साबित हुई। पंडित रविशंकर के बेहतरीन संगीत से सजी इस फिल्म में उन्होंने ‘हियरा जरत जरत’ और ‘पिपरा के पतवा’ जैसे बेहतरीन गीत लिखे जिन्होंने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
दिग्गज संगीतकारों के साथ किया काम
इस सफलता के बाद उनके लिए इंडस्ट्री के दरवाजे पूरी तरह खुल गए। उन्होंने अपने दौर के लगभग सभी नामचीन संगीतकारों के साथ मिलकर काम किया जिनमें कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन और बप्पी लाहिड़ी जैसे बड़े नाम शामिल हैं। फिल्म ‘बंधन’ का प्रसिद्ध गाना ‘बिना बदरा के बिजुरिया’ भी उन्हीं की कलम का कमाल था।
अमिताभ बच्चन की फिल्मों के लिए लिखे गए गानों ने उन्हें शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया। फिल्म ‘डॉन’ का ‘खइके पान बनारस वाला’ आज भी लोगों की जुबान पर रहता है। इसके अलावा ‘मुकद्दर का सिकंदर’ फिल्म के ‘ओ साथी रे’ और ‘रोते हुए आते हैं सब’ ने दर्शकों को भावुक कर दिया। फिल्म ‘याराना’ का गाना ‘तेरे जैसा यार कहां’ और ‘नमक हलाल’ का ‘पग घुंघरू बांध’ उनके सबसे यादगार कामों में गिने जाते हैं।
300 से अधिक फिल्मों में बिखेरा जादू
अपने पूरे करियर के दौरान उन्होंने 300 से अधिक फिल्मों के लिए कुल 1500 से ज्यादा गाने लिखे। हिंदी सिनेमा के अलावा उन्होंने भोजपुरी फिल्म जगत में भी अपनी कला का लोहा मनवाया और ‘बलम परदेसिया’ जैसी फिल्म के गानों से खूब वाहवाही लूटी। जीवन के अंतिम दिनों तक उनका साहित्य और लेखन से गहरा नाता बना रहा। उनकी कविताओं का एक संकलन ‘गंगा तट का बंजारा’ नाम से 1997 में प्रकाशित हुआ था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस पुस्तक का विमोचन खुद अमिताभ बच्चन ने किया था। 3 सितंबर 1997 को मुंबई में उनका निधन हो गया और उस वक्त उनकी आयु 66 वर्ष थी।


















