भारतीय सिनेमा, बंगाली फिल्मों और रंगमंच की दुनिया को अपनी अनूठी अभिनय शैली से समृद्ध करने वाले महान कलाकार उत्पल दत्त की पुण्यतिथि पर पूरा कला जगत उन्हें याद कर रहा है। इस खास मौके पर बॉलीवुड के जाने-माने अभिनेता जैकी श्रॉफ ने सोशल मीडिया के जरिए उत्पल दत्त को भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी। जैकी श्रॉफ ने अपने इंस्टाग्राम स्टोरी सेक्शन में उत्पल दत्त की एक यादगार तस्वीर साझा की और लिखा कि उनकी पुण्यतिथि पर हर कोई उन्हें श्रद्धापूर्वक याद कर रहा है। उत्पल दत्त केवल एक बेमिसाल अभिनेता ही नहीं थे, बल्कि वह एक सशक्त निर्देशक, प्रतिभाशाली नाटककार और भारतीय रंगमंच के ऐसे स्तंभ थे जिनकी कला में सामाजिक चेतना और राजनीतिक विचारों की गहरी छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी।
शुरुआती जीवन और अंग्रेजी साहित्य से रंगमंच तक का सफर
उत्पल दत्त का जन्म 29 मार्च 1929 को ब्रिटिश भारत के अंतर्गत आने वाले बंगाल प्रेसिडेंसी के बारीसाल नामक स्थान पर हुआ था, जो वर्तमान समय में बांग्लादेश का हिस्सा है। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा कोलकाता के प्रतिष्ठित सेंट जेवियर कॉलेज से पूरी की, जहां उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में डिग्री हासिल की। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही उनका रुझान नाटक और अभिनय की दुनिया की तरफ गहरा होता चला गया था। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कला और रंगमंच को ही अपने जीवन का मुख्य लक्ष्य और करियर बनाने का फैसला किया।
'लिटिल थिएटर ग्रुप' का गठन और बंगाली रंगमंच का विस्तार
रंगमंच के प्रति अपने जुनून को एक ठोस दिशा देने के लिए उत्पल दत्त ने वर्ष 1949 में अपनी खुद की नाटक मंडली स्थापित की, जिसका नाम 'लिटिल थिएटर ग्रुप' रखा गया। शुरुआत के दिनों में यह नाट्य समूह मुख्य रूप से अंग्रेजी भाषा में नाटकों की प्रस्तुतियां दिया करता था और इसका दर्शक वर्ग मुख्य रूप से शहरों तक ही सीमित था। हालांकि, उत्पल दत्त रंगमंच को समाज के आम लोगों और मेहनतकश वर्ग तक पहुंचाना चाहते थे। इस उद्देश्य से उन्होंने बाद में बंगाली भाषा में नाटकों का निर्माण और मंचन करना शुरू किया। वह अपनी मंडली के नाटकों का बेहतरीन निर्देशन करने के साथ-साथ उनमें खुद मुख्य भूमिकाएं भी निभाते थे।
विश्व साहित्य का मंचन और राजनीतिक नाटकों के कारण जेल यात्रा
उत्पल दत्त के रंगमंच की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों पर सीधे सवाल खड़े किए जाते थे। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर के महान लेखकों जैसे विलियम शेक्सपियर, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, मैक्सिम गोर्की और हेनरिक इब्सन की कालजयी कृतियों को भारतीय मंच पर प्रस्तुत किया। इसके साथ ही उन्होंने बंगाली साहित्य के दिग्गजों जैसे रवींद्रनाथ टैगोर और माइकल मधुसूदन दत्त की रचनाओं को भी अपने नाटकों का हिस्सा बनाया। राजनीतिक व्यवस्था और सामाजिक कुरीतियों पर तीखी टिप्पणी करने वाले उनके क्रांतिकारी नाटकों के कारण उन्हें सरकारी तंत्र के विरोध का सामना भी करना पड़ा। इसी वजह से वर्ष 1965 में उन्हें कई महीनों तक जेल में बंद रहना पड़ा था। रंगमंच के क्षेत्र में उनके अप्रतिम और आजीवन योगदान को सम्मान देते हुए वर्ष 1990 में उन्हें प्रतिष्ठित संगीता नाटक अकादमी फैलोशिप से नवाजा गया।
राष्ट्रीय पुरस्कार से लेकर 'गोलमाल' के भवानी शंकर तक
थिएटर में परचम लहराने के बाद उत्पल दत्त ने भारतीय सिनेमा में भी अपनी एक अलग और अमिट पहचान बनाई। मशहूर निर्देशक मृणाल सेन की ऐतिहासिक फिल्म 'भुवन शोम' में उनके जीवंत और शानदार अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वहीं, हिंदी सिनेमा के दर्शकों के दिल में वह निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की क्लासिक कॉमेडी फिल्म 'गोलमाल' के किरदार भवानी शंकर के रूप में अमर हो गए। एक सख्त, अनुशासनप्रिय लेकिन बेहद हास्यस्पद बुजुर्ग के रूप में उनका यह किरदार आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे पसंदीदा हास्य किरदारों में गिना जाता है।



















