फ्रांस की संसद के निचले सदन नेशनल असेंबली ने बुधवार को इच्छामृत्यु को कानूनी दर्जा देने के प्रस्ताव के पक्ष में वोट डाला है। यह प्रस्ताव 291 वोटों के पक्ष में और 241 वोटों के विरोध में पास हुआ। संसद के ऊपरी सदन सीनेट ने इस विधेयक को तीन बार खारिज किया था, लेकिन नेशनल असेंबली में यह चौथी बार पास हुआ है। हालांकि यह अभी कानून नहीं बना है, प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू इसके कुछ हिस्सों को संवैधानिक परिषद के पास भेजने वाले हैं, जहां इसकी सांविधानिक वैधता की जांच होगी।
किन मरीजों को मिलेगा यह अधिकार
इस विधेयक के तहत इच्छामृत्यु का अधिकार सिर्फ उन वयस्क फ्रांसीसी नागरिकों को मिलेगा जो किसी "गंभीर और लाइलाज" बीमारी से जूझ रहे हों और जिनकी बीमारी "एडवांस्ड या टर्मिनल स्टेज" में पहुंच चुकी हो। सिर्फ बीमारी गंभीर होना काफी नहीं होगा, कानून में साफ लिखा है कि मरीज को लगातार शारीरिक या मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ रही हो, जो या तो असहनीय हो या इलाज का असर न हो रहा हो। इतनी सख्त शर्तें इसलिए रखी गई हैं ताकि यह किसी सामान्य "मरने के अधिकार" जैसा न लगे। इस कानून के विरोधियों का कहना रहा है कि ऐसे नियम बीमार और दिव्यांग लोगों को "बोझ" जैसा महसूस करा सकते हैं, और कई प्रदर्शनों में यह चिंता खुलकर सामने भी आई है।
कैसे मिलेगी यह अनुमति, पूरी प्रक्रिया
शर्तें पूरी करने वाले मरीज के लिए भी यह फैसला जल्दबाजी में नहीं होगा। सबसे पहले मरीज को खुद डॉक्टर के सामने अपनी इच्छा जाहिर करनी होगी। इसके बाद डॉक्टर के पास सलाह मशविरे के लिए 15 दिन तक का समय होगा, जिसके बाद वह फैसला लेगा। अगर आवेदन मंजूर हो जाता है, तो मरीज को दो दिन और रुकना होगा, यह एक तरह का सोच विचार का समय है। इसके बाद ही जानलेवा दवा दी जा सकेगी। ज्यादातर मामलों में मरीज को यह दवा खुद ही लेनी होगी। अगर मरीज शारीरिक रूप से ऐसा करने में असमर्थ है, तभी डॉक्टर या नर्स उसकी मदद कर सकेंगे। इतना ही नहीं, आखिरी दिन डॉक्टर को यह भी पुख्ता करना होगा कि मरीज अब भी अपने फैसले पर कायम है, कहीं उसने अपना मन तो नहीं बदल लिया।
अभी कानून नहीं बना, संवैधानिक परिषद की परीक्षा बाकी
बुधवार की वोटिंग के बाद भी यह विधेयक तुरंत कानून नहीं बन जाएगा। प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू इसके कुछ प्रावधानों को नौ सदस्यीय संवैधानिक परिषद के पास भेजेंगे, जो यह जांचती है कि कोई नया कानून संविधान के मुताबिक है या नहीं। लेकोर्नू ने वोटिंग से एक दिन पहले ही यह साफ कर दिया था कि वे ऐसा करने वाले हैं। उनके कार्यालय ने कहा कि नेशनल असेंबली में इस विधेयक पर विस्तार से बहस हुई, लेकिन सीनेट में उतनी गहराई से चर्चा नहीं हो सकी, जो इसके समर्थकों की उम्मीदों और इसे लागू करने से जुड़ी आशंकाओं, दोनों को संतुष्ट कर सके।
वर्षों तक क्यों अटका रहा यह कानून
फ्रांस में इच्छामृत्यु को कानूनी रूप देने की मांग सालों पुरानी है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों लंबे समय से जीवन के अंतिम चरण से जुड़े इस कानून के समर्थक रहे हैं। लेकिन दो साल पहले जब मैक्रों ने अचानक मध्यावधि चुनाव कराने का फैसला किया, तो इस विधेयक की प्रक्रिया में बड़ी देरी हो गई। 2024 से फ्रांस के प्रधानमंत्रियों में इस विधेयक को आगे बढ़ाने को लेकर एक तरह की झिझक भी देखी गई है। खुद लेकोर्नू को भी इसकी कुछ शर्तों को लेकर अपनी आपत्तियां हैं, फिर भी उनकी सरकार ने बुधवार को यह वोटिंग होने दी।
चर्च और डॉक्टरों का विरोध, फिर भी जनता का साथ
फ्रांस की राजनीति में इच्छामृत्यु का मुद्दा हमेशा से विवादों में घिरा रहा है। कैथोलिक चर्च और चिकित्सा जगत के एक हिस्से ने लगातार इसका विरोध किया है। इनका कहना है कि डॉक्टरों और नर्सों को किसी मरीज की जान लेने में मदद करने की इजाजत देना नैतिक और व्यावहारिक, दोनों नजरियों से मुश्किल भरा फैसला है। यही वजह है कि दक्षिणपंथी दलों के दबदबे वाली सीनेट ने इस विधेयक को तीन बार ठुकराया, जबकि नेशनल असेंबली अब तक इसे चार बार मंजूरी दे चुकी है। लेकिन जनमत सर्वेक्षणों की तस्वीर कुछ और ही कहती है। इनके मुताबिक फ्रांस के ज्यादातर लोग चाहते हैं कि लाइलाज बीमारी से जूझ रहे मरीजों के पास पैलिएटिव केयर यानी उपशामक देखभाल के अलावा इच्छामृत्यु का विकल्प भी हो, न कि सिर्फ एक ही रास्ता बचे।
यूरोप के बाकी देशों से तुलना
अगर यह कानून आखिरकार लागू होता है, तो फ्रांस भी उन यूरोपीय देशों की सूची में शामिल हो जाएगा जिन्होंने किसी न किसी रूप में इच्छामृत्यु को अपराध की श्रेणी से बाहर रखा है। नीदरलैंड और बेल्जियम ने 2002 में ही ऐसे मरीजों के लिए इच्छामृत्यु को वैध कर दिया था, जो लाइलाज बीमारी से असहनीय पीड़ा झेल रहे थे, और वहां यह प्रक्रिया डॉक्टर की निगरानी में पूरी होती है। इसके बाद यूरोप के कई और देशों ने भी इससे जुड़े कानून बनाए। वहीं स्विट्जरलैंड में लंबे समय से सहायता प्राप्त आत्महत्या की इजाजत है, बशर्ते मदद करने वाला व्यक्ति किसी स्वार्थ से ऐसा न कर रहा हो।
लेकोर्नू ने संवैधानिक परिषद से किन तीन बिंदुओं की जांच मांगी
लेकोर्नू ने साफ तौर पर संवैधानिक परिषद से विधेयक के तीन हिस्सों पर खासतौर से ध्यान देने को कहा है। पहला, डॉक्टर की मंजूरी के बाद मरीज को अपने फैसले की पुष्टि के लिए मिलने वाला दो दिन का सोच विचार का समय, जिसे विरोधी बहुत कम बताते हैं, क्योंकि यह एक ऐसा फैसला है जिसे बदला नहीं जा सकता। दूसरा, ऐसे मरीज जो पहले से ही मानसिक क्षमता में कमी की वजह से कानूनी संरक्षण में हैं, क्या वे वाकई स्वतंत्र और सोच समझकर सहमति दे पाएंगे। तीसरा, स्वास्थ्य और सामाजिक देखभाल केंद्रों की भूमिका, खासकर उन संस्थानों की जिनका मकसद ही लाइलाज बीमारी से जूझ रहे मरीजों को उपशामक देखभाल देना है। सवाल यह है कि क्या उन्हीं केंद्रों में इच्छामृत्यु की सुविधा देना उनके मूल मकसद से मेल खाता है।











