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जब हैदराबाद के फुटबॉल सितारे दुनिया पर राज करते थे: 1950 के एक फैसले ने भारत को विश्व कप के सपने से कैसे महरूम कियाफुटबॉल
13 जून 2026, 1:53 pm (136 दिन पहले)· 1

जब हैदराबाद के फुटबॉल सितारे दुनिया पर राज करते थे: 1950 के एक फैसले ने भारत को विश्व कप के सपने से कैसे महरूम किया

1950 में भारत इकलौती एशियाई टीम के रूप में फीफा विश्व कप के लिए न्योता पाकर भी नहीं गया, और इस फैसले की सबसे भारी कीमत हैदराबाद के उन दिग्गज खिलाड़ियों ने चुकाई जो उस दौर में देश की फुटबॉल की धुरी थे।

आज जब फुटबॉल भारत में एक हाशिए का खेल लगता है, तब यकीन करना मुश्किल है कि कभी देश के पास विश्व मंच पर छा जाने का सुनहरा मौका था। बात 1950 की है। द्वितीय विश्व युद्ध की राख ठंडी ही हुई थी कि ब्राजील में फीफा विश्व कप का आयोजन तय हुआ, और इस आयोजन के लिए पूरे एशिया से इकलौती टीम के रूप में भारत को आमंत्रित किया गया। ड्रॉ में भारत को ग्रुप-3 में स्वीडन, इटली और पैराग्वे के साथ रखा गया था। यानी रास्ता खुला था, सीट तैयार थी — बस जाना भर था।

लेकिन अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ ने जो फैसला लिया, उसने पूरी कहानी पलट दी। महासंघ ने यह निमंत्रण ठुकरा दिया, और इसके साथ ही भारत इस महाआयोजन से बाहर हो गया। इस एक फैसले की सबसे भारी कीमत किसी और ने नहीं, बल्कि हैदराबाद के उन फुटबॉलरों ने चुकाई, जिन्हें उस दौर में भारतीय फुटबॉल की रीढ़ कहा जाता था।

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हैदराबाद — भारतीय फुटबॉल का गढ़

1950 के दशक में हैदराबाद देश की फुटबॉल का दिल था। यहाँ की टीम को किसी और ने नहीं, बल्कि महान कोच Syed Abdul Rahim ने अपने हाथों से तराशा था। यही वजह थी कि इस शहर ने एक के बाद एक ऐसे खिलाड़ी दिए, जिनका नाम राष्ट्रीय टीम की पहचान बन गया।

विश्व कप के निमंत्रण को ठुकराने का सीधा मतलब था — K.P. Dhanraj, Syed Khwaja Azizuddin, Noor Mohammad, GS Layak और Abdul Latif जैसे हैदराबादी दिग्गजों से वह मौका हमेशा के लिए छिन जाना, जिसमें वे दुनिया के सबसे बड़े मंच पर अपना हुनर दिखा सकते थे। यह मौका दोबारा कभी लौटकर नहीं आया।

नंगे पैर खेलने वाली कहानी का सच

सालों से एक तर्क दोहराया जाता रहा है कि भारत इसलिए नहीं गया क्योंकि फीफा ने नंगे पैर खेलने पर रोक लगा दी थी। मगर यह पूरी सच्चाई नहीं है। उस वक्त के कप्तान Sailen Manna का साफ कहना था कि खिलाड़ी जूते पहनकर खेलने के लिए पूरी तरह तैयार थे। यानी जो बहाना इतिहास में दर्ज किया गया, वह असल वजह थी ही नहीं। यही एक ऐतिहासिक चूक थी, जिसने हैदराबाद के बेहतरीन खिलाड़ियों को इतिहास रचने से रोक दिया।

वे सितारे, जिनका लोहा दुनिया मानती थी

इन खिलाड़ियों की प्रतिभा महज़ देश तक सीमित नहीं थी। K.P. Dhanraj 1948 के London Olympics में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके थे। Noor Mohammad एक शानदार मिडफील्डर थे और कोच Rahim की हर रणनीति इन्हीं के इर्द-गिर्द बुनी जाती थी।

वहीं बेहतरीन फुल बैक खिलाड़ी Aziz-ud-din उस टीम के अहम स्तंभ थे, जिसने 1951 के एशियाई खेलों में फाइनल में ईरान को हराकर स्वर्ण पदक जीता। इतना ही नहीं, Aziz ने 1956 के ओलंपिक में भी अहम भूमिका निभाई, जब भारतीय टीम चौथे स्थान पर रही — यह आज भी ओलंपिक फुटबॉल में भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन माना जाता है।

2026 की तस्वीर और एक अधूरा सपना

अब 2026 का फीफा विश्व कप शुरू होने जा रहा है, जिसे दुनिया भर के करीब 6 अरब दर्शक देखेंगे। इस बार रिकॉर्ड 48 टीमें मैदान में उतर रही हैं, और इनमें Curaçao तथा Cape Verde जैसे छोटे-छोटे द्वीप देश तक शामिल हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि ईरान और जापान जैसी जिन टीमों को भारत ने 1950 के दशक में धूल चटाई थी, वे आज विश्व कप का हिस्सा हैं।

लेकिन हैदराबाद की फुटबॉल का वह स्वर्णिम युग और उसके जांबाज़ खिलाड़ी, महासंघ के एक गलत फैसले की भेंट चढ़कर, इतिहास के पन्नों में कहीं गुम हो गए। और भारत? वह आज भी इस सबसे बड़े मंच से गायब है।

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