अगर आप बोन कंडक्शन तकनीक की तरफ शिफ्ट हो चुके हैं तो जाहिर है आप शॉक्स के हेडफोन इस्तेमाल करते होंगे। कान खुले रहने से आसपास की आवाजें सुनाई देती हैं, पूरे दिन पहनने पर भी आराम बना रहता है और कान भी हल्के महसूस होते हैं, यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है। लेकिन कुछ हफ्तों के इस्तेमाल के बाद अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या आप इस तकनीक का पूरा फायदा उठा रहे हैं या नहीं। पिछले करीब एक साल से हर रन से पहले ओपनरन प्रो 2 पहनने वाले एक शॉक्स यूजर ने इस दौरान ऐसे कई तरीके खोजे जिनसे पूरा अनुभव और बेहतर हो जाता है। यहां पांच सबसे कारगर ट्रिक्स दी जा रही हैं।
शोर वाले जिम में शॉक्स के साथ इयरप्लग लगाएं
यह सुनने में उल्टा लग सकता है, आखिर बोन कंडक्शन हेडफोन का पूरा मकसद ही कान खुले रखना है तो फिर उन्हें बंद क्यों किया जाए। लेकिन शॉक्स की एक और बड़ी फैन बेथ स्क्वारेकी इस कॉम्बिनेशन की कसम खाती हैं। बेथ बताती हैं कि ओवर ईयर हेडफोन पहनकर गर्म और शोरगुल वाले जिम में पसीना और असहजता कहीं ज्यादा होती है, जबकि शॉक्स के साथ इयरप्लग लगाना उस मुकाबले काफी आरामदायक साबित होता है। उन्होंने यह तरीका तब अपनाना शुरू किया जब उन्हें एहसास हुआ कि उनकी वेटलिफ्टिंग वर्कआउट के दौरान वजन की खनक और बार गिरने की आवाज लंबे समय में कानों के लिए असुरक्षित हो सकती है, खासकर तब जब वे गैराज जैसी बंद जगह में वर्कआउट कर रही हों। उनकी एप्पल वॉच लगातार तेज आवाज के संपर्क में आने की चेतावनी देती रहती थी। इसके बाद उन्होंने जिम बैग में इयरप्लग रखना शुरू कर दिया और शॉक्स के साथ इनका इस्तेमाल करने लगीं। इस कॉम्बिनेशन से गाना भी बजता रहता है और कानों को नुकसान से बचाव भी होता है। इसके लिए वे खासतौर पर हाई फिडेलिटी इयरप्लग की सलाह देती हैं क्योंकि ये आवाज को पूरी तरह दबाने के बजाय सिर्फ उसकी तीव्रता कम करते हैं।
चश्मे की मदद से पाएं परफेक्ट फिट
अगर शॉक्स कभी ढीला महसूस हो या आवाज सही तरीके से नहीं पहुंच रही लगे, तो चश्मा इसका आसान हल हो सकता है, चाहे आपको वैसे चश्मे की जरूरत न भी हो। धूप का चश्मा भी उतना ही असरदार रहता है। तरीका यह है कि पहले शॉक्स पहनें और सुनिश्चित करें कि ये कान के ठीक सामने, त्वचा से सपाट होकर, गाल की हड्डी के लगभग बराबर लेवल पर टिके हों। यही वह जगह है जहां ट्रांसड्यूसर, यानी वे छोटे पैड जो कंपन के जरिए असल में आवाज पहुंचाते हैं, त्वचा से संपर्क बनाते हैं। इसके बाद चश्मा उसके ऊपर पहन लें। चश्मे की भुजाएं ट्रांसड्यूसर को गाल की हड्डी के थोड़ा और करीब दबा देती हैं, जिससे संपर्क मजबूत होता है और बिना किसी सेटिंग को छुए आवाज खुद ही थोड़ी तेज महसूस होने लगती है। यह महज दो सेकंड का एडजस्टमेंट है और खासतौर पर उन धावकों और साइकिल चालकों के लिए बेहद काम का है जो वर्कआउट के दौरान वैसे भी धूप का चश्मा पहनते हैं।
चिपचिपेपन से बचने के लिए डियोड्रेंट या पानी का इस्तेमाल करें
बोन कंडक्शन हेडफोन को सही तरीके से काम करने के लिए सामान्य इयरबड्स के मुकाबले त्वचा से ज्यादा संपर्क की जरूरत होती है। यह आवाज की गुणवत्ता के लिए तो अच्छा है, लेकिन पसीना आने पर यही संपर्क असहज महसूस होने लगता है। इसका एक आसान हल है, वर्कआउट से पहले जबड़े और कान के सामने वाले उन हिस्सों पर एंटीपर्सपिरेंट स्टिक की बेहद पतली परत लगा लें जहां शॉक्स टिकता है। इससे उस जगह पसीना जमा होना कम हो जाता है, जिससे हेडफोन फिसलता भी कम है और सेशन खत्म होने तक चिपचिपापन भी कम महसूस होता है। अगर डियोड्रेंट लगाने के बाद भी शॉक्स फिसल रहा है, तो इसका उल्टा तरीका आजमाया जा सकता है, यानी उन्हीं जगहों को पानी के छींटे से हल्का गीला कर लें या वार्मअप के दौरान हल्का पसीना आने दें। सही मात्रा में नमी दरअसल पकड़ को बेहतर बनाती है और हेडफोन को टिके रहने में मदद करती है। बस इतना ध्यान रखें कि वर्कआउट के बाद त्वचा को पोंछ लें ताकि हेडफोन ज्यादा देर तक गीली त्वचा पर टिका न रहे।
फोन की वॉल्यूम लिमिट बंद करें
शॉक्स जैसे ओपन ईयर हेडफोन को जानबूझकर इस तरह डिजाइन किया जाता है कि आसपास की आवाजें भी सुनाई देती रहें, जो सुरक्षा के लिहाज से बड़ा फायदा है। लेकिन इसका नतीजा यह भी होता है कि सड़क के शोर, जिम की खनक या हवा की आवाज के बीच गाना या पॉडकास्ट साफ सुनने के लिए कई बार थोड़ी ज्यादा वॉल्यूम चाहिए होती है। जब शॉक्स की आवाज पर्याप्त तेज नहीं लगती, तो अक्सर इसकी वजह हेडफोन नहीं बल्कि फोन की वह सेटिंग होती है जो कानों की सुरक्षा के लिए ब्लूटूथ ऑडियो की तेज आवाज को चुपचाप सीमित कर देती है। आईफोन में इसके लिए सेटिंग्स में जाकर साउंड्स एंड हैप्टिक्स, फिर हेडफोन सेफ्टी में जाना होता है और वहां रिड्यूस लाउड ऑडियो को बंद करना होता है। सैमसंग फोन में यह सेटिंग्स, फिर साउंड्स एंड वाइब्रेशन, फिर वॉल्यूम, फिर मोर में मिलती है, जहां मीडिया वॉल्यूम लिमिट को बंद किया जा सकता है। दूसरे एंड्रॉयड फोन में शॉक्स डिवाइस की ब्लूटूथ सेटिंग्स के भीतर एब्सोल्यूट वॉल्यूम नाम का विकल्प खोजकर उसे ऑन करना होता है। इन लिमिट को बंद करते ही खासकर बाहर की जगहों पर वॉल्यूम में तुरंत फर्क महसूस होता है। हालांकि इसके साथ यह सावधानी भी जरूरी है कि लंबे समय तक हेडफोन को बहुत तेज आवाज पर चलाने से कानों को नुकसान हो सकता है, इसलिए इस अतिरिक्त वॉल्यूम का इस्तेमाल सोच समझकर करना चाहिए।
जरूरत पड़ने पर शॉक्स को वायर्ड हेडफोन बना लें
शॉक्स के कुछ मॉडल में 3.5mm ऑक्स कनेक्शन भी दिया गया है, यानी इनके लिए ब्लूटूथ ही एकमात्र रास्ता नहीं है। अगर कभी कनेक्शन गड़बड़ा जाए या ऐन मौके पर बैटरी खत्म हो जाए, तो एक कम्पैटिबल ऑक्स एडाप्टर की मदद से इन्हें वायर्ड हेडफोन की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। यह ट्रैवल के दौरान या ब्लूटूथ के साथ किसी भी तरह की दिक्कत होने पर एक भरोसेमंद बैकअप विकल्प साबित होता है।













