एक छोटी सी चश्मा बनाने वाली कंपनी ने आज सुबह दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया कंपनी को सीधी चुनौती दे दी, और सवाल कोई मामूली नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि आपके चेहरे पर लगे कंप्यूटर पर क्या चलेगा, यह कौन तय करेगा। G2 सीरीज के डिस्प्ले वाले स्मार्ट ग्लासेज बनाने वाली ईवन रियलिटीज ने ईवन हब नाम से एक ऐप स्टोर खोला है, जिसमें शुरुआत में ही थर्ड-पार्टी डेवलपर्स के बनाए 50 से ज़्यादा ऐप्स मौजूद हैं। यह कदम सीधे तौर पर मेटा को निशाना बनाता है, जिसके अपने डिस्प्ले ग्लासेज पर सिर्फ वही चलता है जिसे मेटा खुद मंज़ूरी देती है।
छोटी कंपनी बनाम ट्रिलियन डॉलर की दिग्गज
कागज़ पर देखें तो यह मुकाबला बराबरी का नहीं दिखता। मेटा का मार्केट कैपिटलाइज़ेशन करीब 1.47 ट्रिलियन डॉलर है, और उसके रे-बैन और ओकले ब्रांड वाले स्मार्ट ग्लासेज पूरे स्मार्ट ग्लासेज बाज़ार के करीब 82% हिस्से पर कब्ज़ा जमाए हुए हैं। दूसरी तरफ ईवन रियलिटीज की वैल्यू प्रॉस्पेरो के अनुमान के मुताबिक सिर्फ करीब 10 मिलियन डॉलर आंकी गई है, हालांकि कंपनी के प्रवक्ता का कहना है कि असली आंकड़ा इससे कहीं ज़्यादा है, कम से कम 500 मिलियन डॉलर।
लेकिन जैसे ही बात सिर्फ डिस्प्ले वाले स्मार्ट ग्लासेज की आती है, दोनों कंपनियां लगभग बराबरी पर आ जाती हैं। 2025-2026 के अनुमानों के मुताबिक मेटा ने अपने प्रीमियम मेटा रे-बैन डिस्प्ले ग्लासेज की करीब 20,000 यूनिट्स बेची हैं। प्रॉस्पेरो के आंकड़े बताते हैं कि ईवन रियलिटीज ने अपने G2 ग्लासेज की 10,000 से 25,000 के बीच यूनिट्स बेची हैं, जबकि कंपनी के प्रवक्ता का दावा है कि असल बिक्री का आंकड़ा "हंड्रेड्स ऑफ थाउज़ेंड्स" यानी लाखों में पहुंच चुका है।
दोनों ग्लासेज की बनावट में ज़मीन-आसमान का फर्क
हार्डवेयर के मामले में दोनों कंपनियों की सोच बिल्कुल अलग है। मेटा के डिस्प्ले ग्लासेज की कीमत 799 डॉलर है, और इनमें कंपनी के मौजूदा कैमरा वाले ग्लासेज की सारी खूबियां तो हैं ही, साथ में फुल-कलर हाई-क्वालिटी वीडियो डिस्प्ले और रे-बैन का जाना-पहचाना लुक भी है। वहीं ईवन रियलिटीज के G2 ग्लासेज की कीमत 599 डॉलर है, इनमें कोई कैमरा या स्पीकर नहीं है, और इनका सिंगल-कलर डिस्प्ले एक ऐसे फ्रेम में छिपा है जिसे देखकर कोई कह ही नहीं सकता कि यह आम चश्मे से अलग है। इन्हें रोज़मर्रा पहनने लायक फैशनेबल चश्मे की तरह डिज़ाइन किया गया है, जो ज़रूरत पड़ने पर आंखों के सामने नक्शा दिखा दें या किसी पार्टी में सामने वाले का नाम याद दिला दें।
असली लड़ाई हार्डवेयर की नहीं, सॉफ्टवेयर की है
दोनों कंपनियों के बीच सबसे बड़ा फर्क शायद डिज़ाइन का नहीं, बल्कि सोच का है। हर टेक्नोलॉजी "ओपन" और "क्लोज्ड" के बीच किसी न किसी पायदान पर खड़ी होती है, और मेटा के स्मार्ट ग्लासेज अभी तक पूरी तरह बंद सिस्टम वाले छोर पर हैं। मेटा खुद तय करती है कि ग्लासेज पर कौन-कौन से "एक्सपीरियंस" मौजूद रहेंगे, और यूज़र सिर्फ उन्हें ऑन या ऑफ कर सकते हैं, कहीं से नया ऐप डाउनलोड नहीं कर सकते। मिसाल के तौर पर आप ग्लासेज में एप्पल म्यूज़िक को ऑन-ऑफ कर सकते हैं, लेकिन किसी और कंपनी के बनाए म्यूज़िक प्लेटफॉर्म को जोड़ ही नहीं सकते। कोर फीचर्स को डिलीट करने का विकल्प भी नहीं है, और सबसे बुनियादी चीज़, यानी एआई को जगाने वाला वेक-अप वर्ड तक बदला नहीं जा सकता। यह हमेशा "हे, मेटा" ही रहेगा, कुछ और नहीं।
ईवन रियलिटीज ने इसका बीच का रास्ता चुना है, जो पूरी तरह ओपन लिनक्स जैसे सिस्टम से अलग है और एप्पल के ऐप स्टोर मॉडल के ज़्यादा करीब है। यूज़र मंज़ूरी पा चुके ऐप्स की लिस्ट देख सकते हैं और खुद तय कर सकते हैं कि उन्हें ग्लासेज में ईपब रीडर चाहिए, शतरंज का गेम चाहिए, या फिर अपनी टेस्ला कार का चार्ज इंडिकेटर। मेटा से अलग, ईवन रियलिटीज यूज़र्स को उन कोर फीचर्स को भी हटाने की छूट देती है जिनका वे इस्तेमाल नहीं करते।
मेटा का रुख आगे बदल भी सकता है
इसका मतलब यह नहीं कि मेटा हमेशा के लिए थर्ड-पार्टी डेवलपर्स के खिलाफ ही रहेगी। कंपनी का मेटा होराइज़न स्टोर, जो क्वेस्ट वीआर हेडसेट्स के लिए बना है, पहले से ही एक बड़ा और सक्रिय मार्केटप्लेस है, जहां बड़े बजट के गेम्स से लेकर छोटे-मोटे प्रयोगात्मक टूल्स तक सब कुछ मौजूद है। मेटा ने अपनी खुद की वीआर गेम डेवलपमेंट का बड़ा हिस्सा बंद भी कर दिया है, और साथ ही इंडिपेंडेंट डेवलपर्स को समर्थन जारी रखने का भरोसा दिया है। इससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि मेटा शायद अपने ग्लासेज के हार्डवेयर के परिपक्व होने का इंतज़ार कर रही है, उसके बाद वह अलग से ग्लासेज स्टोर खोल सकती है या मौजूदा होराइज़न स्टोर में एक "डिस्प्ले" सेक्शन जोड़ सकती है।
इतिहास बताता है, ओपन सिस्टम हमेशा नहीं जीतता
यह सोचना आसान है कि ज़्यादा विकल्प देना हमेशा फायदेमंद होता है, लेकिन टेक इंडस्ट्री का इतिहास इसकी पूरी तरह पुष्टि नहीं करता। निंटेंडो ने 1980 के दशक में वीडियो गेम इंडस्ट्री पर इसलिए राज किया क्योंकि उसने NES पर चलने वाले गेम्स पर सख्त क्वालिटी कंट्रोल रखा, और उस दौर के ज़्यादा "ओपन" कंसोल पीछे छूट गए। एडोबी फ्लैश ने 2000 के दशक की शुरुआत में पूरे ओपन वेब पर राज किया, लेकिन जब एप्पल के ज़्यादा बंद सिस्टम वाले आईफोन ने इसे सपोर्ट करने से इनकार कर दिया, तो यह पूरी तरह खत्म हो गया। आज भी एप्पल का बंद सिस्टम, आईओएस, अमेरिकी स्मार्टफोन बाज़ार के करीब 63% हिस्से पर कब्ज़ा जमाए है, जबकि ज़्यादा ओपन एंड्रॉयड हमेशा दूसरे नंबर पर रहता है।
यह लड़ाई सिर्फ दो कंपनियों की नहीं है
अभी डिस्प्ले वाले स्मार्ट ग्लासेज का बाज़ार सीमित है और ज़्यादातर टेक के शौकीन और शुरुआती अपनाने वाले लोग ही इन्हें खरीद रहे हैं। लेकिन अगर आने वाले समय में ये HUD स्टाइल ग्लासेज आम लोगों तक पहुंचते हैं, और दोनों कंपनियां अपनी मौजूदा रणनीति पर टिकी रहती हैं, तो जो भी जीतेगा वही तय करेगा कि आपके डिजिटल भविष्य पर आपका कितना कंट्रोल रहेगा। यूज़र एक तय किया हुआ अनुभव चाहते हैं, एक खुला और बदला जा सकने वाला अनुभव चाहते हैं, या फिर आंखों के सामने डिस्प्ले वाले ग्लासेज चाहते ही नहीं, यह सवाल अभी खुला हुआ है।


















