सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसी कहानियां होती हैं जो वक्त बीतने के साथ पुरानी होने के बजाय और भी ज्यादा वास्तविक लगने लगती हैं। अल्फोंसो कुआरोन द्वारा निर्देशित डायस्टोपियन ड्रामा चिल्ड्रन ऑफ मेन आज अपने निर्माण के दो दशक पूरे कर चुका है। दिलचस्प बात यह है कि इस कहानी की पृष्ठभूमि वर्ष 2027 में रखी गई थी, जिसका अर्थ है कि पर्दे पर दिखाई गई काल्पनिक दुनिया अब हमारे वर्तमान के बेहद करीब पहुंच चुकी है। पी डी जेम्स के प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित यह फिल्म एक ऐसे दौर को दिखाती है जहां मानव जाति रहस्यमय ढंग से बांझपन का शिकार हो जाती है और पूरी दुनिया तबाही के रास्ते पर चल पड़ती है। इस निराशा भरे माहौल में क्लाइव ओवेन द्वारा निभाया गया आम नागरिक थियो का किरदार किसी तरह गर्भवती हुई युवती की (क्लेयर-होप एशिटे) को सुरक्षित ठिकाने तक पहुंचाने का बीड़ा उठाता है।
बॉक्स ऑफिस की सुस्ती से क्लासिक के दर्जे तक का सफर
शुरुआती दौर में जब यह फिल्म थिएटर्स में आई थी, तब इसे टिकट खिड़की पर खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। बॉक्स ऑफिस पर संघर्ष करने के बावजूद अपनी लंबी सिंगल-टेक सिनेमैटोग्राफी, रोंगटे खड़े कर देने वाले दृश्यों और माइकल केन जैसे दिग्गजों के शानदार अभिनय की बदौलत इसने 2000 के दशक के सिनेमा में मील के पत्थर जैसा दर्जा हासिल किया। फिल्म के बीस वर्ष पूरे होने के मौके पर कुआरोन ने इस बात पर चर्चा की कि आखिर समय के साथ इस कृति का कद इतना ऊंचा क्यों होता चला गया। उनका मानना है कि वैचारिक धरातल पर यह फिल्म आज पहले से कहीं अधिक मौजूद और प्रासंगिक महसूस होती है।
विश्वास, संयोग और मानवीय असमंजस की जंग
अल्फोंसो कुआरोन ने अपने काम पर बात करते हुए बताया कि उनके लिए सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं की पड़ताल के साथ सबसे अहम इंसानी असमंजस था। फिल्म का एक संवाद इस द्वंद्व को बयां करता है कि सब कुछ विश्वास और संयोग के बीच एक पौराणिक संघर्ष है। इंसान लगातार इस कशमकश में रहता है कि उसे परिस्थितियों को बदलने के लिए क्या कदम उठाना चाहिए या फिर चुपचाप किनारे खड़े रहना चाहिए। रोजमर्रा की जिंदगी में लोग इस तरह के सवालों से जूझते रहते हैं, खासकर जब कोई गंभीर संकट सामने आ खड़ा हो।
सूचनाओं का अंतहीन सैलाब और चिंतन की कमी
फिल्म में दिखाए गए वैश्विक बांझपन के संकट से वास्तविक दुनिया भले ही बची हुई है, लेकिन बीते दो दशकों में मानवता ने वैश्विक महामारी, भीषण युद्ध और प्राकृतिक आपदाओं के दौर को झेला है। स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के जरिए यह सब चौबीसों घंटे हमारी आंखों के सामने रहता है। आज के समाज पर बात करते हुए कुआरोन ने रेखांकित किया कि लोगों के पास जानकारी तो बहुत है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह समझ या ज्ञान में बदले। इंटरनेट पर लोग किसी घटना को देखकर तुरंत लंबी प्रतिक्रियाएं लिखते हैं, फिर पलक झपकते ही जूते खरीदने की ओर बढ़ जाते हैं। यह सब इतनी तेज रफ्तार में घटता है कि बीच में सोचने और आत्ममंथन करने का कोई मौका ही नहीं बचता।



















