आज रसोई में बर्तन धोना मानो एक अलग ही बाज़ार बन चुका है। लोहे के स्क्रबर से लेकर फॉर्म वाले स्क्रबर तक, और कई कंपनियों के साबुन से लेकर लिक्विड डिटर्जेंट तक — सफ़ाई के लिए ढेरों प्रोडक्ट हमारे हाथ में हैं। लेकिन ज़रा सोचिए, आज से 30 साल पहले जब यही साबुन और डिटर्जेंट गांव के घरों तक पहुंच ही नहीं पाते थे, तब बर्तनों की कालिख आख़िर उतरती कैसे थी?
जब चूल्हे की आग बर्तनों को काला कर देती थी
उस दौर में गांवों में गैस चूल्हे की सुविधा नहीं थी। खाना मिट्टी के कच्चे चूल्हे पर लकड़ियों की आग पर पकता था। आंच और धुएं की वजह से बर्तन अक्सर जल जाते और उनकी तली काली पड़ जाती थी। ऐसे में इन्हें दोबारा चमकाना किसी चुनौती से कम नहीं था, और यहीं गांव की महिलाओं की देसी समझदारी काम आती थी। वे बिना किसी बाज़ारू सामान के, घर में मौजूद चीज़ों से ही बर्तनों को साफ़ कर लेती थीं।
धान की पराली बनी पहला स्क्रबर
ग्रामीण महिला ललिता देवी ने TrendKia से बातचीत में बताया कि उन दिनों बर्तन मांजने के लिए न साबुन था, न डिटर्जेंट। ऐसे में जले हुए बर्तनों पर वे धान की पराली आज़माती थीं। तरीका भी आसान था — दो-तीन पराली लेकर उन्हें तीन-चार राउंड में मोड़ लिया जाता ताकि वह हाथों में अच्छी तरह पकड़ में आ जाए। फिर इसी मुड़ी हुई पराली को बर्तन पर रगड़-रगड़कर मांजा जाता और देखते ही देखते कालापन उतर जाता।
चूल्हे की राख ने किया डिटर्जेंट का काम
सिर्फ़ पराली ही नहीं, सफ़ाई में राख की भी अहम भूमिका थी। यह वही राख होती थी जो चूल्हे में लकड़ियां जलने के बाद बचती थी। इसमें छोटे-छोटे कंकड़ जैसे कण मौजूद रहते थे, और बर्तन मांजते समय यही कण उसे अंदर तक साफ़ कर देते थे। यानी इस देसी जुगाड़ में धान की पराली स्क्रबर का काम करती थी और चूल्हे की राख डिटर्जेंट की भूमिका निभाती थी — दोनों मिलकर बाज़ारू प्रोडक्ट की कमी पूरी कर देते थे।
नारियल के छिलके का इस्तेमाल
ललिता देवी आगे बताती हैं कि नारियल के छिलके को भी कई कामों में लाया जाता था और उन्हीं में से एक था बर्तनों की सफ़ाई। चूंकि उस समय खाना चूल्हे पर ही बनता था, इसलिए बर्तन ज़्यादा जलते थे, और यह छिलका ऐसे जले हुए बर्तनों को भी अच्छी तरह साफ़ कर देता था। यही वे आसान देसी नुस्खे थे जिनकी मदद से गांव की महिलाएं बिना किसी आधुनिक प्रोडक्ट के अपने बर्तनों को चमका लेती थीं।













