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सागर के एक गांव में खंभे और तार दोनों मौजूद, फिर भी नहीं आता करंट, फोन चार्ज कराने रोज जाना पड़ता है शहरमध्य प्रदेश
7 जुल॰ 2026, 6:54 pm (45 दिन पहले)· 2

सागर के एक गांव में खंभे और तार दोनों मौजूद, फिर भी नहीं आता करंट, फोन चार्ज कराने रोज जाना पड़ता है शहर

सागर जिला मुख्यालय से 5 किलोमीटर दूर बसे एक गांव में बिजली के खंभे और तार होने के बावजूद बिजली नहीं आती, जिससे ग्रामीणों को फोन चार्ज करने के लिए रोज शहर जाना पड़ता है।

मध्यप्रदेश के सागर जिले से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां जिला मुख्यालय से केवल 5 किलोमीटर दूर बसे एक गांव में आज भी बिजली नहीं पहुंची है। गांव में बिजली के खंभे भी लग चुके हैं और तार भी बिछ चुके हैं, लेकिन इन तारों में करंट नहीं दौड़ता। नतीजा यह है कि ग्रामीण आज भी रात के अंधेरे में दीपक, ढिबरी और टॉर्च के सहारे अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं, वो भी उस दौर में जब देशभर में हर घर बिजली पहुंचाने के दावे किए जा रहे हैं।

फोन चार्ज करने के लिए रोज तय करना पड़ता है सफर

गांव की सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि यहां के लोगों को मोबाइल फोन चार्ज करवाने जैसे मामूली काम के लिए भी सागर शहर का रुख करना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि इस काम के लिए उन्हें हर रोज करीब 5 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है। सोचने वाली बात यह है कि जिस दौर में स्मार्टफोन हर किसी की जरूरत बन चुका है, वहां सिर्फ फोन चार्ज करने के लिए इतनी दूर जाना पड़े, यह बिजली विभाग और प्रशासन दोनों की लापरवाही को उजागर करता है। बिजली न होने का असर सिर्फ चार्जिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने गांव के बच्चों की पढ़ाई, युवाओं के रोजगार और आम जनजीवन को भी बुरी तरह प्रभावित किया है।

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ढिबरी और मोबाइल की टॉर्च में हो रही बच्चों की पढ़ाई

यह गांव नरयावली विधानसभा क्षेत्र में आता है और आदिवासी बहुल है, जहां करीब एक हजार मतदाता रहते हैं। ग्रामीणों के मुताबिक बिजली की सुविधा नहीं होने का सबसे बुरा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। सूरज ढलते ही पूरे गांव में अंधेरा छा जाता है और बच्चों को किताबें खोलने के लिए ढिबरी, लालटेन या मोबाइल की टॉर्च का सहारा लेना पड़ता है। कई बार तो मोबाइल की बैटरी खत्म हो जाने पर बच्चों की पढ़ाई बीच में ही रुक जाती है। गर्मी के मौसम में बिना पंखे के रात काटना ग्रामीणों के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है, वहीं बारिश के दिनों में अंधेरे के चलते कीड़े-मकौड़ों का खतरा भी बना रहता है।

बिजली न होने से रोजगार के रास्ते भी बंद

गांव के युवाओं का कहना है कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में कभी नियमित बिजली आपूर्ति देखी ही नहीं। बीच-बीच में कुछ घंटों के लिए बिजली आ भी जाती है, लेकिन उससे कोई खास फायदा नहीं होता। ग्रामीणों का मानना है कि अगर गांव में स्थायी तौर पर बिजली की व्यवस्था हो जाए तो यहां आटा चक्की, वेल्डिंग की दुकान, सिलाई-कढ़ाई जैसे छोटे-छोटे कामकाज शुरू किए जा सकते हैं। इससे न सिर्फ गांव के युवाओं को रोजगार मिलेगा, बल्कि रोजी-रोटी के लिए बाहर पलायन करने की मजबूरी भी कम होगी।

घरेलू फीडर न होने से अटकी बिजली आपूर्ति

बिजली विभाग के अभियंता दीपक अहिरवार ने इस पूरे मामले पर सफाई देते हुए बताया कि गांव में अलग से घरेलू फीडर उपलब्ध नहीं होने की वजह से नियमित बिजली आपूर्ति संभव नहीं हो पा रही है। फिलहाल इस गांव को उस लाइन से बिजली दी जाती है, जो खेती-किसानी के कामों के लिए इस्तेमाल होती है, इसलिए घरेलू कनेक्शनों को लगातार सप्लाई देना मुमकिन नहीं है। दीपक अहिरवार के अनुसार समस्या के स्थायी हल के लिए नया घरेलू फीडर बनाने का प्रस्ताव शासन के पास भेजा जा चुका है। उनका कहना है कि मंजूरी मिलने और बजट आने के बाद ही फीडर का निर्माण कार्य शुरू हो सकेगा।

अब भी सरकारी मंजूरी की बाट जोह रहे ग्रामीण

बिजली के खंभे और तार होने के बावजूद अंधेरे में जिंदगी बिताने को मजबूर इस गांव के हालात प्रशासनिक व्यवस्था पर सीधा सवाल खड़ा करते हैं। ग्रामीण कई बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के सामने यह समस्या रख चुके हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि सरकार जल्द ही घरेलू फीडर के प्रस्ताव को मंजूरी देगी, ताकि वर्षों से खड़े इन बिजली के खंभों में आखिरकार करंट दौड़ सके। अगर ऐसा हो जाता है तो ग्रामीणों को छोटी-छोटी जरूरतों के लिए बार-बार शहर का रुख नहीं करना पड़ेगा और यह गांव भी विकास की रोशनी से जगमगा उठेगा।

सवाल-जवाब

यह गांव कहां स्थित है?
यह गांव मध्यप्रदेश के सागर जिले में जिला मुख्यालय से करीब 5 किलोमीटर दूर, नरयावली विधानसभा क्षेत्र में स्थित है।
गांव में बिजली की क्या स्थिति है?
गांव में बिजली के खंभे और तार तो लगे हैं, लेकिन नियमित बिजली आपूर्ति नहीं होती, जिससे रातें अंधेरे में गुजरती हैं।
लोग मोबाइल फोन कैसे चार्ज करते हैं?
ग्रामीणों को मोबाइल फोन चार्ज कराने के लिए हर दिन करीब 5 किलोमीटर दूर सागर शहर जाना पड़ता है।
गांव में कितने मतदाता हैं?
इस आदिवासी बहुल गांव में करीब एक हजार मतदाता रहते हैं।
बिजली न होने से बच्चों पर क्या असर पड़ रहा है?
सूरज ढलते ही अंधेरा छा जाने से बच्चों को ढिबरी, लालटेन या मोबाइल की टॉर्च की रोशनी में पढ़ाई करनी पड़ती है, और मोबाइल की बैटरी खत्म होने पर पढ़ाई भी रुक जाती है।
बिजली न होने की मुख्य वजह क्या है?
बिजली विभाग के अभियंता दीपक अहिरवार के अनुसार गांव में अलग से घरेलू फीडर न होने के कारण यह समस्या बनी हुई है, फिलहाल गांव को कृषि लाइन से बिजली मिलती है।
समस्या के समाधान के लिए क्या किया गया है?
स्थायी समाधान के लिए नया घरेलू फीडर बनाने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है, मंजूरी और बजट मिलने पर निर्माण शुरू होगा।
स्थायी बिजली मिलने से गांव को क्या फायदा होगा?
ग्रामीणों के मुताबिक इससे आटा चक्की, वेल्डिंग और सिलाई-कढ़ाई जैसे छोटे व्यवसाय शुरू हो सकेंगे, जिससे रोजगार मिलेगा और पलायन कम होगा।
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